Sunday, February 8, 2026
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अमेरिका पर भारत की बड़ी कूटनीति जीत

भारत और अमेरिका के 18 प्रतिशत पर लाने का ऐलान किया है। यह व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक कबीच व्यापार समझौते पर सहमति बनना नि:संदेह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगने वाले टैरिफ को 50 प्रतिशत से भारी कटौती करते हुए सीधेरार नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती ताकत और आत्मविश्वास का प्रतीक है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ को 18 प्रतिशत करने की घोषणा ने न सिर्फ बाजारों में उत्साह पैदा किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि भारत अब वैश्विक व्यापार वार्ताओं में रक्षात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब दुनिया संरक्षणवाद, व्यापार युद्ध और आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत-अमेरिका ट्रेड डील दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है, अमेरिका को भारत जैसे विशाल और तेजी से बढ़ते बाजार तक बेहतर पहुंच मिलती है, वहीं भारत को अपने निर्यात के लिए एक स्थिर और बड़ा मंच मिलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम के राजनीतिक और वैचारिक पक्ष को भी उजागर करती है कि ‘आत्मविश्वास वह शक्ति है, जिसके बल पर सब कुछ संभव है’, यह कथन केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में भारत की विदेश और व्यापार नीति का सार है। संस्कृत श्लोक के माध्यम से साहस, कौशल और संयम की बात करके प्रधानमंत्री ने यह संकेत दिया कि भारत अब जल्दबाजी में नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच के साथ वैश्विक फैसले ले रहा है। दरअसल अमेरिकी राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब भारत पर ट्रैफिक लगाया था, तो ऐसा लगा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका काफी व्यापक प्रभाव पड़ेगा और हमें काफी नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने काफी दूरदर्शी तरीके से धैर्य के साथ इस पूरे मामले को कूटनीतिक तरीके से हैंडल किया। ट्रैरिफ लगने के बाद भारत का जवाब बेहद शांत और गरिमापूर्ण रहा। भारत ने शोर-शराबे को नजर अंदाज किया और सिर्फ अपने मतलब की ‘ट्रेड डील’ पर ध्यान दिया। हमने अपने देश की गरिमा पर आंच नहीं आने दी और पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आया है। पिछले एक साल, खासतौर से पिछले छह महीने से भारत ने जो ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ काम किया है, उससे वह परेशान है। पिछले साल की शुरुआत में ईएफटीए के साथ हमने ट्रेड डील की। इसके बाद ब्रिटेन, फिर जर्मनी और फिर ईयू के साथ एफटीए किया। इस सबका परिणाम ये है कि ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ और अतिरिक्त शुल्क के खिलाफ हमने अच्छी मोर्चेबंदी कर ली और अपने एक्सपोर्ट को हमने डायवर्सिफाई कर लिया। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह से समझ गया कि भारत किसी के सामने झुकने वाला है और मजबूरी में ट्रंप को टैरिफ कम करना पड़ा है। इसमे कोई दोमत नहीं है कि भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को पूर्व डिप्लोमैट और विशेषज्ञ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। हालांकि, हर बड़े फैसले की तरह इस समझौते पर भी सवाल उठे रहे हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों का कहना है कि भारत के कृषि बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलना देश की 70 फीसदी आबादी के साथ धोखा है, जो खेती पर निर्भर है। इससे विदेशी सामान आने से बिचौलियों और मुनाफाखोरों का एक नया वर्ग तैयार होगा, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। ट्रंप की ट्रूथ पोस्ट को एक्स पर शेयर करते हुए लिखा है कि रूसी तेल की खरीद बंद, अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ नहीं, भारत के निर्यात पर 18 फीसदी टैरिफ। भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर की कीमत की ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद और कोयले का आयात करेगा। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता कहां गई? हालांकि इसका जवाब केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि इस समझौते में भारत के हित का पूरा ध्यान रखा गया है। गोयल ने कहा कि पहले भी आरसीईपी जैसे समझौते से भारत को दूर रखकर भाजपा सरकार ने देशहित बचाया था। इस बार भी कृषि और डेयरी हितों से समझौता नहीं किया गया। उनके अनुसार यह समझौता प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले भारत को बेहतर स्थिति देता है और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। इसमें कोई दोम नहीं हैकि टैरिफ कटौती एक बड़ा कदम है, लेकिन गैर-टैरिफ बाधाएं, मानक, नियम और बाजार पहुंच जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इन पहलुओं पर संतुलित और भारत-हितैषी समाधान निकलते हैं, तो यह डील वास्तव में ऐतिहासिक साबित होगी। भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक सवाल सबसे ज्यादा गूंजता रहा कि क्या इस बढ़ती अमेरिकी नजदीकी की कीमत भारत को अपने पुराने और भरोसेमंद साझेदार रूस से दूरी बनाकर चुकानी पड़ेगी? खास तौर पर अटकलें इस बात को लेकर तेज थीं कि क्या भारत अब सस्ता रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा। लेकिन रूस की तरफ से आई पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया ने इन तमाम कयासों पर विराम लगा दिया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव का बयान सिर्फ एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति की दिशा और मजबूती का संकेत है। पेस्कोव ने साफ कहा कि भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद रोकने को लेकर उन्हें कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है और दोनों देशों के रिश्ते मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं। यह बयान पश्चिमी मीडिया में चल रहे उस नरेटिव को सीधे चुनौती देता है, जिसमें दावा किया जा रहा था कि अमेरिका के साथ डील करने के लिए भारत रूस को ‘कुर्बान’ करने जा रहा है। दरअसल, भारत की विदेश नीति का मूल आधार हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज के बहुध्रुवीय विश्व तक, भारत ने किसी एक ध्रुव में खुद को बांधने के बजाय संतुलन की राह चुनी है। अमेरिका के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाना भारत की विकास जरूरतों से जुड़ा है, तो वहीं रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा और स्थिरता से। इन दोनों में से किसी एक को चुनने का दबाव भारत स्वीकार नहीं करता और रूस का यह बयान उसी सच्चाई की पुष्टि करता है। वैश्विक मंच पर यह करार भारत की उस छवि को मजबूत करता है, जो अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक जिक्वमेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में देखी जा रही है। ‘पांच ट्रिलियन डॉलर’ इकोनॉमी का लक्ष्य तभी संभव है, जब भारत अपने निर्यात को बढ़ाए, निवेश आकर्षित करे और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अहम भूमिका निभाए। भारत-अमेरिका ट्रेड डील इस दिशा में एक मजबूत कदम है। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत-अमेरिका ट्रेड डील केवल टैरिफ का खेल नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संतुलन की कहानी है। ईयू की बढ़ती भूमिका, रूस तेल की राजनीति और अमेरिका-भारत के साझा हितों ने ट्रंप को नरमी दिखाने पर मजबूर किया। भारत ने इस प्रक्रिा में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बचाए रखा न खुला इनकार, न खुली हामी। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि रूस से तेल आयात में वास्तव में कितना बदलाव आता है और अमेरिकी बाजार भारतीय उद्योग के लिए कितना खुलता है। लेकिन इतना तय है कि यह डील भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत और बहुध्रुवीय दुनिया में उसके महत्व का प्रमाण है। कूटनीति में कभी-कभी सबसे बड़ी जीत वही होती है, जिसमें बिना शोर मचाए अपने हित साध लिए जाएं और भारत ने यह अमेरिका पर हासिल कर लिया है।

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