Wednesday, March 11, 2026
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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी


  • -राजेश माहेश्वरी

देश के शहर और ग्रामीण इलाकों में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। यूपी के संतकबीरनगर जिले में जनवरी 2026 के शुरुआती 13 दिनों में ही जिले के विभिन्न अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर कुत्तों के हमले के कारण 1050 से अधिक घायल लोग इलाज के लिए पहुंच चुके हैं। बीती 8 जनवरी को राजधानी दिल्ली के द्वारका सेक्टर-19 में आवारा कुत्तों के झुंड ने एक 65 वर्षीय बुजुर्ग पर जानलेवा हमला किया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। 14 जनवरी को हरियाणा के करनाल में एक बच्चे पर कुत्तों के झुंड ने हमला कर दिया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। दिसंबर 2025 में हरियाणा के नूंह जिले के तावडू क्षेत्र में तीन दिनों में ही 58 लोग अवारा कुत्तों के काटने का शिकार हुए। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रतिदिन औसतन 30 से 50 डॉग बाइट के मामले सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं देश में कुत्तों के बढ़ते आतंक और प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करती है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है।
केंद्रीय मछली पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ऊर्फ ललन सिंह ने कुत्ता काटने की समस्या को लेकर बीते साल चार फरवरी को लोकसभा में जानकारी दी थी। उन्होंने डीएमके के अरुण नेहरू के सवाल के जवाब में बताया था कि जनवरी 2024 से दिसंबर 2024 तक देश के ग्रामीण इलाकों में कुत्ता काटने की कुल 21 लाख 95 हजार 122 घटनाएं दर्ज की गई थीं। उन्होंने बताया था कि देश के ग्रामीण इलाकों में कुत्तों के काटने से 37 इंसानों की मौत के मामले दर्ज किए गए हैंं। वहीं दूसरे जानवरों के काटने की पांच लाख चार हजार 728 मामले दर्ज किए गए थे। इन जानवरों के काटने से 11 लोगों की मौत होने की जानकारी सरकार ने लोकसभा में दी थी। सरकार ने बताया था कि इस दौरान आवारा कुत्तों ने 15 साल से कम आयु के पांच लाख 19 हजार 704 बच्चों को काटा था।
बीती 13 जनवरी को आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को कड़ी चेतावनी दी है। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने प्रशासन की निष्क्रियता पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अधिकारियों की लापरवाही की वजह से यह समस्या “हजार गुना” बढ़ चुकी है। कोर्ट के मुताबिक, अगर समय रहते ठोस कदम उठाए जाते, तो हालात इतने गंभीर नहीं होते। जस्टिस नाथ ने कहा कि हर उस मामले में, जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों को चोट लगती है या उनकी जान जाती है, वहां राज्य सरकार को जवाबदेह ठहराया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो लोग सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाते हैं, उनकी भूमिका और जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणी यहीं नहीं रुकी। जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर किसी को कुत्तों से इतना लगाव है, तो उन्हें अपने घर में रखें। सड़कों पर छोड़कर आम लोगों को डराने या काटने की स्थिति पैदा करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने माना कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा यह मसला भावनाओं से नहीं, ठोस नीति और प्रशासनिक कार्रवाई से सुलझाया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी उस समय आई जब वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी दो पशु-कल्याण ट्रस्टों की ओर से दलीलें रख रही थीं। उन्होंने इस मुद्दे को भावनात्मक बताते हुए कहा कि समाधान मानवीय होना चाहिए। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की कि अब तक भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए ही दिख रही हैं। जवाब में गुरुस्वामी ने कहा कि वह इंसानों की सुरक्षा को लेकर भी उतनी ही चिंतित हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी साफ किया कि वह लंबी बहस नहीं, बल्कि ठोस आदेश देना चाहती है। जस्टिस नाथ ने कहा कि हर कोई एक ही बात दोहरा रहा है, जबकि अब प्रशासन को जवाबदेह ठहराने की जरूरत है ताकि कोई प्रक्रिया शुरू हो सके। जस्टिस मेहता ने यहां तक कहा कि कोर्टरूम को सार्वजनिक मंच बना दिया गया है, जबकि यह न्यायिक कार्यवाही का स्थान है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि उन्होंने एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी नियमों को लागू करने में पूरी तरह नाकामी दिखाई है। पीठ ने कहा कि यह समस्या दशकों से चली आ रही है और केंद्र व राज्यों की विफलता के कारण यह कई गुना बढ़ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि हर उस पुरुष, महिला और बच्चे की मौत के लिए, जिसकी जान कुत्ते के काटने से गई है, जिम्मेदार सरकार पर भारी मुआवजा लगाया जाए। इससे पहले 8 जनवरी की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने एबीसी नियमों के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई थी और डॉग लवर्स को ‘हकीकत से दूर’ बताया था।
इस मामले पर पिछले 7 महीनों में छह बार सुनवाई हो चुकी है। पिछले साल 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और रेलवे स्टेशनों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा था कि इन जानवरों को तय शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए। वहीं, कोर्ट ने सरकारी और सार्वजनिक स्थानों में कुत्तों को प्रवेश न देने के लिए कहा था। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश का कई लोगों ने विरोध किया था। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्कूल, अस्पताल, खेल परिसर, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। और कहा कि यह प्रशासन की उदासीनता और सिस्टम की नाकामी को दर्शाती हैं। इससे लोगों की सुरक्षा, पर्यटन और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी बुरा असर पड़ रहा है। कोर्ट ने कहा कि साल दर साल आवारा कुत्तों की लोगों को काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। सरकारी डेटा के मुताबिक 2023 में देश भर में 30 लाख के करीब ऐसी घटनाएं हुई, और 2024 में क़रीब 37 लाख ऐसी घटनाएं।
बीते नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के सामने 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने एक एफिडेविट दायर की है, जिसमें उन्होंने बताया है कि उनके यहां कितने शेल्टर होम हैं और उन्होंने कितने आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण की है। दिल्ली में 20 जानवरों के लिए ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर’ हैं। ये ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ नियम के तहत बनाए जाते हैं। पिछले छह महीनों में हर सेंटर पर रोज़ाना 15 आवारा कुत्तों की नसबंदी और उनका टीकाकरण हुआ है। महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा ऐसे एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर है। पूरे राज्य में 236 ऐसे सेंटर हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के 17 शहरों में ऐसे सेंटर हैं और बिहार में एक भी ऐसा सेंटर नहीं है, लेकिन कुत्तों के लिए 16 जगहों पर व्यवस्था है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह साफ है कि अदालत इस गंभीर सामाजिक समस्या पर केवल बहस नहीं, बल्कि ठोस दिशा-निर्देश देना चाहती है। सड़कों पर बढ़ते कुत्तों के हमले, प्रशासन की सुस्ती और आम लोगों की सुरक्षा, इन सभी पहलुओं को संतुलित करते हुए कोर्ट का अगला आदेश अहम माना जा रहा है। अब यह देखना होगा कि राज्य सरकारें इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती हैं और जमीनी स्तर पर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

–लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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