Sunday, February 8, 2026
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उच्च शिक्षा में समानता बिल : चिंताएँ और वास्तविकता

– महेन्द्र तिवारी
​विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए समानता को बढ़ावा देने वाले “उच्च शिक्षा में समानता बिल” ने उच्च शिक्षा के परिसरों को एक बार फिर उस बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है, जिसे भारत बार-बार टालता आया है। समानता की कीमत क्या होनी चाहिए और उसका बोझ किस पर पड़े – कागज़ पर यह नियम जातिगत भेदभाव के विरुद्ध एक सख्त और समयबद्ध ढांचा प्रस्तुत करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन्होंने भय, अविश्वास और प्रतिरोध की एक नई राजनीति को जन्म दिया है। यह टकराव केवल सवर्ण बनाम आरक्षित वर्ग या समर्थन बनाम विरोध का नहीं है, बल्कि यह उस असहज प्रश्न से जुड़ा है कि क्या न्याय की जल्दी में न्याय की प्रक्रिया कुचली जा सकती है।
UGC का तर्क अपने आप में असंगत नहीं है। देश के विश्वविद्यालय दशकों से सामाजिक असमानताओं के बोझ को ढोते रहे हैं। दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के छात्रों द्वारा भेदभाव, उपेक्षा और मानसिक उत्पीड़न की शिकायतें बार-बार सामने आती रही हैं। कई मामलों में संस्थागत चुप्पी और उदासीनता ने हालात को और भयावह बनाया। ऐसे में समान अवसर केंद्र, इक्विटी समिति, 24×7 हेल्पलाइन और मोबाइल इक्विटी स्क्वॉड जैसी व्यवस्थाएँ कागज़ी सुधार नहीं, बल्कि एक जवाबदेह तंत्र स्थापित करने की कोशिश प्रतीत होती हैं। शिकायत पर 24 घंटे में जांच शुरू करने और सीमित समय में कार्रवाई का प्रावधान उस धीमे न्याय के विरुद्ध प्रतिक्रिया है, जिसने पहले कई पीड़ितों को निराश किया।
लेकिन नीति केवल अपने उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने प्रभाव से आँकी जाती है। उत्तर भारत के कई राज्यों में सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक जिस तरह सड़कों पर उतर आए हैं, वह बताता है कि इन नियमों ने समाज के एक बड़े हिस्से में असुरक्षा की भावना पैदा की है। करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा, वैश्य संघ और सवर्ण समाज समन्वय समिति जैसे संगठनों का विरोध केवल राजनीतिक शोर नहीं है; उसमें एक डर छिपा है—कि कहीं समानता की आड़ में एक नया असंतुलन न पैदा हो जाए।
विरोधियों की सबसे बड़ी आशंका दुरुपयोग की है। शिकायत मिलते ही जांच शुरू करने और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान को वे “पहले सज़ा, बाद में सुनवाई” के रूप में देख रहे हैं। यह डर निराधार नहीं माना जा सकता, क्योंकि कानूनों के दुरुपयोग की बहस भारत में नई नहीं है। SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े सामाजिक अनुभवों—चाहे वे वास्तविक हों या धारणा-आधारित—ने इस भय को और गहरा किया है। जब प्रक्रिया इतनी कठोर हो कि प्रारंभिक छंटनी या सुनवाई का स्पष्ट ढांचा न दिखे, तो अविश्वास पनपना स्वाभाविक है।
इक्विटी समिति की संरचना ने भी सवाल खड़े किए हैं। SC/ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय के लिहाज़ से ज़रूरी हो सकता है, लेकिन सामान्य वर्ग का कोई औपचारिक प्रतिनिधि न होना निर्णय प्रक्रिया पर संदेह को जन्म देता है। यह बहस इस बात की नहीं है कि हाशिये के समूहों को क्यों जगह दी गई, बल्कि इस बात की है कि जब एक पूरा सामाजिक वर्ग निर्णय की मेज़ से अनुपस्थित हो, तो निष्पक्षता का भरोसा कैसे बने। समानता का दावा तभी मजबूत होता है, जब वह सभी को सुनने की इच्छा भी दिखाए।
इन नियमों पर उठ रहे संवैधानिक सवाल इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, लेकिन समानता का अर्थ समान प्रक्रिया भी है। यदि किसी विशेष समूह के लिए अलग और अधिक दंडात्मक व्यवस्था खड़ी की जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत—विशेषकर सुनवाई का अधिकार—पूरी तरह सुरक्षित हैं। सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित जनहित याचिकाएँ इसी चिंता का प्रतिबिंब हैं।
सोशल मीडिया और राजनीति ने इस मुद्दे को और तीखा बना दिया है। #RollbackUGC जैसे हैशटैग नीति-आलोचना से ज़्यादा पहचान की राजनीति का औज़ार बन गए हैं। कुछ धार्मिक और राजनीतिक नेता इस विवाद को अपने समर्थक आधार को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा यह है कि एक जटिल नीति बहस भावनात्मक ध्रुवीकरण में बदलती जा रही है, जहाँ तर्क की जगह नारे और भय ले रहे हैं।
फिर भी, इस पूरे विवाद में एक सच्चाई अनदेखी नहीं की जा सकती—भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव वास्तविक है और उसे नज़र अंदाज़ करना किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं होगा। सवाल यह नहीं है कि भेदभाव से सुरक्षा दी जाए या नहीं, बल्कि यह है कि वह सुरक्षा कैसी हो। क्या ऐसा ढांचा बनाया जा सकता है, जो पीड़ित को त्वरित राहत दे, लेकिन साथ ही किसी निर्दोष को असहाय न छोड़े? क्या समानता स्थापित करने के लिए ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाई जा सकती हैं, जो नए डर और नए विभाजन न पैदा करें?
यहीं पर नीति-निर्माताओं की असली परीक्षा शुरू होती है। यदि सरकार और UGC इन नियमों को वास्तव में प्रभावी बनाना चाहते हैं, तो उन्हें विरोध को केवल प्रतिगामी मानसिकता कहकर खारिज नहीं करना चाहिए। प्रारंभिक शिकायतों की छंटनी के लिए एक स्पष्ट स्क्रीनिंग तंत्र, दंडात्मक कार्रवाई से पहले अनिवार्य सुनवाई, इक्विटी समिति में एक स्वतंत्र या सर्वमान्य पर्यवेक्षक और वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्टिंग जैसे कदम इस अविश्वास को कम कर सकते हैं। सामाजिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण भी केवल एक वर्ग तक सीमित न होकर सभी छात्रों और शिक्षकों के लिए होना चाहिए, ताकि समानता का संदेश साझा अनुभव बने, न कि थोपे गए आदेश का।
अंततः, “समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम 2026” भारतीय लोकतंत्र के सामने एक कठिन लेकिन ज़रूरी सवाल रखते हैं। क्या हम समानता को केवल दंडात्मक शक्ति के सहारे लागू करना चाहते हैं, या उसे भरोसे और संवाद के साथ स्थापित करना चाहते हैं? इतिहास बताता है कि कानून बिना सामाजिक सहमति के टिकाऊ नहीं होते। यदि ये नियम न्याय के साथ भरोसा भी पैदा कर पाए, तो वे उच्च शिक्षा को सचमुच अधिक समावेशी बना सकते हैं। लेकिन यदि वे केवल भय और अविश्वास छोड़ गए, तो वे उस विभाजन को और गहरा करेंगे, जिसे मिटाने का दावा वे करते हैं।
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