-डॉ. शैलेश शुक्ला
डिजिटल युग ने मानव जीवन को जितना सुविधाजनक, तेज़ और वैश्विक बनाया है, उतना ही जटिल और तनावपूर्ण भी कर दिया है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल एप्लिकेशन अब हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन देखना, रात को उसी स्क्रीन के साथ सोना, दिनभर नोटिफिकेशन के पीछे भागना—यह आज की सामान्य जीवनशैली बन गई है। लेकिन इस “सामान्य” दिखने वाली आदत के पीछे एक गंभीर खतरा छिपा है—डिजिटल लत। यह लत धीरे-धीरे हमारे मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक संतुलन को भीतर से खोखला कर रही है।
आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारी पहचान, आत्मसम्मान और सामाजिक स्थिति का पैमाना बन गया है। लाइक्स, शेयर, कमेंट और फॉलोअर्स की संख्या हमारे मनोभावों को नियंत्रित करने लगी है। जब पोस्ट पर अधिक प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम खुश होते हैं; कम मिलती है, तो निराश। यह भावनात्मक उतार-चढ़ाव धीरे-धीरे मानसिक अस्थिरता में बदलने लगता है। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह स्पष्ट किया गया है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग अवसाद, चिंता और अकेलेपन की भावना को बढ़ाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म इस लत को बढ़ाने में स्वयं भूमिका निभाते हैं। उनके एल्गोरिदम इस प्रकार बनाए जाते हैं कि उपयोगकर्ता अधिक से अधिक समय स्क्रीन पर बिताए। अंतहीन स्क्रॉल, ऑटो-प्ले वीडियो, लगातार नोटिफिकेशन और “रील संस्कृति” व्यक्ति को बिना एहसास के घंटों बाँधे रखते हैं। यह प्रक्रिया हमारे मस्तिष्क में उसी तरह के रासायनिक परिवर्तन उत्पन्न करती है, जैसे नशे की लत में होते हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति वास्तविक दुनिया से कटकर आभासी दुनिया में अधिक सहज महसूस करने लगता है।
युवा पीढ़ी इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित है। किशोर और युवा आज अपने आत्ममूल्य को सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया से जोड़ने लगे हैं। सुंदरता के आभासी मानक, सफलता के दिखावटी उदाहरण और बनावटी जीवनशैली उन्हें निरंतर तुलना की स्थिति में रखती है। इससे आत्मविश्वास में कमी, हीन भावना और असंतोष जन्म लेता है। कई मामलों में यह स्थिति आत्मघाती विचारों तक पहुँच जाती है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
बच्चों पर डिजिटल लत का प्रभाव और भी गंभीर है। कम उम्र में मोबाइल और टैबलेट की आदत उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर रही है। खेलकूद, संवाद, कल्पनाशीलता और पढ़ने की रुचि कम होती जा रही है। स्क्रीन आधारित जीवनशैली मोटापा, दृष्टि दोष और नींद की समस्या को बढ़ावा दे रही है। भविष्य की पीढ़ी यदि इसी दिशा में बढ़ती रही, तो समाज को दीर्घकालिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पारिवारिक संबंधों पर भी डिजिटल लत का गहरा प्रभाव पड़ा है। आज एक ही कमरे में बैठे परिवार के सदस्य अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। संवाद, संवेदना और समय की साझेदारी कम होती जा रही है। माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी बढ़ रही है। दांपत्य जीवन में भी संवाद की कमी देखी जा रही है। यह स्थिति सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है।
कार्यस्थलों पर भी डिजिटल निर्भरता नई समस्याएँ पैदा कर रही है। लगातार ईमेल, मैसेज और ऑनलाइन मीटिंग्स के कारण कार्य और निजी जीवन की सीमा धुंधली हो गई है। कर्मचारी मानसिक थकान, तनाव और “डिजिटल बर्नआउट” का शिकार हो रहे हैं। इससे उत्पादकता और संतोष दोनों प्रभावित होते हैं।
हालाँकि यह भी सत्य है कि डिजिटल माध्यमों ने मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ाने में सकारात्मक भूमिका निभाई है। ऑनलाइन काउंसलिंग, सहायता समूह, जागरूकता अभियान और मनोवैज्ञानिक संसाधन पहले से अधिक सुलभ हुए हैं। अनेक लोग डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी समस्याओं पर खुलकर बात कर पा रहे हैं। इसलिए समस्या तकनीक में नहीं, उसके असंतुलित उपयोग में है।
समाधान के लिए सबसे पहले आत्म-जागरूकता आवश्यक है। व्यक्ति को यह समझना होगा कि वह स्क्रीन पर कितना समय व्यतीत कर रहा है और उसका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। “डिजिटल डिटॉक्स”, समय सीमा निर्धारण और नोटिफिकेशन नियंत्रण जैसे उपाय मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।
शिक्षा संस्थानों में डिजिटल संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों और युवाओं को यह सिखाया जाना चाहिए कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक द्वारा नियंत्रित कैसे हुआ जाए। अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
मीडिया और डिजिटल कंपनियों को भी सामाजिक उत्तरदायित्व समझना होगा। केवल मुनाफे के लिए लत बढ़ाने वाले फीचर्स विकसित करना नैतिक नहीं है। उपयोगकर्ता के स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता देना उनकी जिम्मेदारी है।
सरकार को भी मानसिक स्वास्थ्य नीति में डिजिटल लत को शामिल करना चाहिए। परामर्श केंद्र, हेल्पलाइन और जागरूकता कार्यक्रम इस दिशा में प्रभावी हो सकते हैं।
अंततः यह समझना होगा कि तकनीक हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए है, न कि उसे नियंत्रित करने के लिए। यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं बनाया, तो हम आभासी दुनिया में जीते हुए वास्तविक जीवन खो देंगे। मानसिक स्वास्थ्य कोई व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्क्रीन से बाहर निकलकर जीवन की सच्ची खुशियों से जुड़ें—परिवार, मित्र, प्रकृति और स्वयं से। तभी डिजिटल युग में भी हम मानसिक रूप से स्वस्थ और सामाजिक रूप से मजबूत रह सकेंगे।
(लेखक सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक हैं )
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