Sunday, February 8, 2026
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नई ऊंचाई पर भारत-मलेशिया रिश्ते

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आठ वर्षों बाद मलेशिया का दो दिवसीय दौरा कई मायनो में खास कहा जा सकता है, ञ्चयोंकि इनके इस दौरे ने दोनों देशों के संबंधों में नई दिशा और ठोस आधार देने का काम किया। अगर यह कहा जाए कि भारतीय प्रधानमंत्री का यह दौरा देशों के संबंधों में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दिया है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि भारत-मलेशिया संबंधों की बुनियाद सदियों पुरानी है। समुद्री व्यापार मार्गों के सहारे विकसित यह रिश्ता चोल साम्राज्य के दौर से ही दक्षिण भारत और मलय प्रायद्वीप को जोड़ता रहा। राजराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम के समय में समुद्री संपर्कों ने केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि भाषा, धर्म, कला और परंपराओं का भी आदान-प्रदान संभव किया। यही कारण है कि आज मलेशिया जैसे मुस्लिम बहुल देश में भी रामायण की परंपरा जीवित है और ‘हिकायत सेरी राम’ जैसी कथाएं सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बनी हुई हैं। 1947 में भारत की आजादी और 1957 में मलेशिया के स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए। बीते दशकों में ये संबंध व्यापारिक साझेदारी से आगे बढ़कर रणनीतिक सहयोग में तब्दील हुए हैं। आज भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ में मलेशिया एक प्रमुख स्तंभ है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की सक्रिय भूमिका को मजबूती देता है। लेकिन मोदी के इस दौरे ने संबंधों में बढ़ते विश्वास और आत्मीयता को और बढ़ा दिया है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच जो समझौते हुए है, उसने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई दी है। दोनों देशों के बीच अनेक समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया है। कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, डिजिटल इकॉनमी और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिली है। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत-मलेशिया संबंध अब बहुआयामी साझेदारी के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में भारत का झुकाव क्षेत्रीय सहयोग की ओर बढ़ा है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन आसियान इस रणनीति का केंद्र है। वित्त वर्ष 2016 में भारत-आसियान व्यापार जहां 65 अरब डॉलर के आसपास था, वहीं 2025 तक यह 123 अरब डॉलर को पार कर चुका है। इस समूह में मलेशिया भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान रुपये और रिंगिट में लेन-देन को बढ़ावा देने पर सहमति बनी है, जिससे व्यापारिक लेन-देन अधिक सरल और स्थिर होगा। कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन को मजबूत करने तथा टिकाऊ पाम ऑयल की निरंतर आपूर्ति पर भी भरोसा जताया गया। ये कदम दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच परस्पर निर्भरता को और गहरा करते हैं। इसके साथ ही डिजिटल युग में भारत-मलेशिया साझेदारी ने भी नया रूप लिया है। मलेशिया-इंडिया डिजिटल काउंसिल की शुरुआत और यूपीआई व पेननेट को जोडऩे की दिशा में उठाए गए कदम भविष्य के डिजिटल सहयोग की नींव रखते हैं। इससे न केवल भुगतान प्रणाली आसान होगी, बल्कि फिनटेक, स्टार्टअप और डिजिटल सेवाओं में भी नई संभावनाएं खुलेंगी। सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन को मजबूत करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उभरती तकनीकों में निवेश बढ़ाने पर दोनों देशों की सहमति यह दर्शाती है कि साझेदारी केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर गढ़ी जा रही है। भारत और मलेशिया ने रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और सोलर प्रोजेक्ट्स में सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया है। जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों के संदर्भ में यह साझेदारी बेहद प्रासंगिक है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन और ‘बिग कैट कंजर्वेशन’ जैसी पहलों में साझा प्रशिक्षण और सहयोग पर सहमति बनी, जो सतत विकास के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। मलेशिया की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित यह देश हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोडऩे वाले प्रमुख समुद्री मार्ग की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। भारत के कुल समुद्री व्यापार का 55 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। दक्षिण चीन सागर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत-मलेशिया समुद्री सहयोग का महत्व और बढ़ जाता है। यात्रा के दौरान रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने, संयुक्त नौसैनिक अभ्यासोंऔर समुन्द्र निगरानी पर चर्चा हुई है। आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति दोहराते हुए सीमा पार आतंकवाद और आतंकी फंडिंग पर रोक लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समन्वय बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर जोर यह दिखाता है कि भारत अब दक्षिण-पूर्व एशिया को सिर्फ व्यापारिक बाजार नहीं मानता, बल्कि साझा सुरक्षा हितों वाला क्षेत्र मानकर आगे बढ़ रहा है। काउंटर-टेररिज्म, इंटेलिजेंस शेयरिंग और मैरीटाइम सिक्योरिटी जैसे मुद्दे आज किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। मलक्का जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्र्गोंकी सुरक्षा में मलेशिया की भूमिका निर्णायक है, और भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता इस साझेदारी को वास्तविक ताकत दे सकती है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि सुरक्षा सहयोग को पारदर्शिता और आपसी विश्वास के साथ आगे बढ़ाया जाए, ताकि यह किसी तीसरे देश के खिलाफ गठबंधन की तरह न दिखे। डिजास्टर मैनेजमेंट, स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में हुए समझौते यह संकेत देते हैं कि दोनों देश सहयोग को ‘ह्यूमन सिक्योरिटी’ के नजरिए से भी देख रहे हैं। खासकर मलेशिया में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा सहयोग एक ठोस और व्यावहारिक कदम है, जो सीधे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करेगा। यह कूटनीति का वह रूप है, जो सिर्फ शिखर बैठकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जमीनी हकीकत से जुड़ता है। मलेशिया में लगभग 29 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो इसे दुनिया के शीर्ष प्रवासी भारतीय केंद्रों में शामिल करता है। यह समुदाय केवल सांस्कृतिक पहचान को जीवित नहीं रखता, बल्कि व्यापार, निवेश और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देने में भी निर्णायक भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए भारत को ‘विश्व का भरोसेमंद विकास साझेदार’ बताना इसी विश्वास और साझेदारी का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशिया यात्रा यह स्पष्ट करती है कि भारत-मलेशिया संबंध अब पारंपरिक कूटनीति से आगे बढक़र रणनीतिक, आर्थिक और लोगों पर केंद्रित साझेदारी का रूप ले चुके हैं। इतिहास और संस्कृति की साझा विरासत पर खड़ी यह साझेदारी अब तकनीक, सुरक्षा और सतत विकास के नए स्तंभों पर आगे बढ़ रही है। दोनों देश ऐतिहासिक संबंधों को नई ऊर्जा और नए दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं। संस्कृति, व्यापार, सुरक्षा और तकनीक के क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग इस साझेदारी को आने वाले वर्षों में और गहरा बना सकता है। भारत के लिए मलेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया का एक भरोसेमंद द्वार है और मलेशिया के लिए भारत एक उभरती वैश्विक शक्ति, यही आपसी महत्व और विश्वास भारत-मलेशिया संबंधों को भविष्य में नई ऊंचाइयों तक ले जाने की सबसे बड़ी ताकत है। यह यात्रा दिखाती है कि भारत अपनी विदेश नीति में सांस्कृतिक आत्मविश्वास, आर्थिक यथार्थवाद और रणनीतिक स्पष्टता को साथ लेकर चल रहा है। पूरी उम्मीद की जानी चाहिए कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में मलेशिया के साथ गहराता सहयोग आने वाले वर्षों में दोनों देशों के लिए स्थिरता, समृद्धि और रणनीतिक संतुलन का आधार बनेगा।

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