वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो आम बजट पेश किया है, उसमें लोकलुभावन योजनाओं से परहेज करते एक संतुलित, यथार्थवादी और सुधारोन्मुख दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। नि:संदेह वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट एक संतुलित, दूरदर्शी तथा भविष्य उन्मुख बजट है, इसमें युवा सशक्तिकरण, प्रौद्योगिकी आधारित विकास, राजकोषीय अनुशासन तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि पर स्पष्ट और सशक्त फोकस देखने को मिलता है। ऐसे समय में जब चुनावी दबावों के चलते सरकारों से लोकलुभावन घोषणाओं की अपेक्षा की जाती है, यह बजट उन आशंकाओं को दरकिनार करता हुआ दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों, पूंजीगत निवेश और संरचनात्मक मजबूती पर केंंद्रित दिखाई देता है। लगातार नौवां बजट पेश कर इतिहास रचने वाली सीतारमण ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सरकार ‘तुरंत लाभ’ की राजनीति के बजाय ‘स्थायी विकास’ के रास्ते पर आगे बढ़ाना चाहती है। सरकार ने इस बजट के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया है कि उसका फोकस तात्कालिक राजनीतिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती, युवाओं के सशक्तिकरण और भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पर टिका हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे वर्तमान के सपनों को साकार करने वाला और उज्ज्वल भविष्य की नींव रखने वाला बजट बताना इसी दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। हालांकि विपक्षी दलों ने इस बजट को महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विफल करार दिया है। उनका तक है कि आम आदमी की जेब में सीधे राहत नहीं पहुंची। शेयर बाजार की तीखी प्रतिक्रिया भी यह दिखाती है कि अल्पकाल में निवेशक सरकार के सख्त रुख से असहज हैं। लेकिन यह भी सच है कि बाजार की तात्कालिक प्रतिक्रिया और अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक सेहत, दोनों हमेशा एक दिशा में नहीं चलतीं। इसके अलावा इस बजट में आम करदाताओं को बड़ी दरों में राहत न मिलने से कुछ निराशा जरूर दिखी, लेकिन कर प्रणाली को सरल और मानवीय बनाने की दिशा में कई अहम कदम उठाए गए हैं। विदेश में छोटी-मोटी गैर-अचल संपत्ति (20 लाख रुपये तक) का अनजाने में खुलासा न होने पर कार्रवाई से छूट देना और आयकर कानून को अपराध की श्रेणी से बाहर करना, ईमानदार करदाताओं के लिए बड़ी राहत है। नए इनकम टैक्स एक्ट के तहत अब कर संबंधी गड़बड़ियों में जेल की जगह केवल जुर्माने का प्रावधान होगा, जिससे करदाताओं का डर कम होगा और अनुपालन बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही, विदेश यात्रा, शिक्षा और चिकित्सा के लिए भेजे जाने वाले धन पर टीसीएस को घटाकर 2 प्रतिशत करना मध्यम वर्ग के लिए महत्वपूर्ण राहत है। ‘रिवाइज्ड रिटर्न’ दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च करना भी कर प्रणाली को अधिक लचीला बनाता है। इस बजट की बुनियाद तीन कर्तव्यों पर रखी गई है उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता के जरिए आर्थिक वृद्धि को गति देना, लोगों की क्षमताओं और आकांक्षाओं का निर्माण करना, तथा ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना के अनुरूप समावेशी विकास सुनिश्चित करना। ये तीनों स्तंभ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मिलकर उस विकसित भारत की कल्पना को साकार करने का प्रयास करते हैं, जिसकी बात सरकार लगातार करती रही है। देखने से पता चलता है कि बजट में विकास, निवेश, बुनियादी ढांचा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को एक साझा सूत्र में पिरोने का प्रयास किया गया है। लेकिन सवाल वही पुराना है कि क्या यह सोच कागजों से निकलकर आम आदमी के जीवन में वास्तविक बदलाव ला पाएगी? क्या महंगाई से परेशान रसोई को राहत मिलेगी, युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा और मध्यम वर्ग की बचत सुरक्षित रह पाएगी? बजट का ‘एजुकेशन-टू-एम्प्लॉयमेंट’ मॉडल सरकार की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटने का दावा किया गया है। पहली नौकरी पाने वाले युवाओं के लिए 15,000 रुपये का डीबीटी बोनस न केवल मनोबल बढ़ाने वाला कदम है, बल्कि इससे युवाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में मदद मिलेगी। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन जैसी संस्थाओं के दायरे में युवाओं का आना सामाजिक सुरक्षा की दिशा में सकारात्मक संकेत है। हालांकि, इस पहल की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये नौकरियां कितनी स्थायी और गुणवत्तापूर्ण होती हैं। शीर्ष कंपनियों में 1 करोड़ इंटर्नशिप का प्रस्ताव भी दूरदर्शी कहा जा सकता है। 5,000 रुपये का मासिक भत्ता और वास्तविक कार्यानुभव डिग्री और नौकरी के बीच की दूरी को कम कर सकता है। लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती क्रियान्वयन की है। निजी क्षेत्र की वास्तविक भागीदारी, प्रशिक्षण की गुणवत्ता और शोषण से बचाव के लिए सक्चत निगरानी जरूरी होगी, वरना यह योजना ‘सस्ते श्रम’ के आरोपों में घिर सकती है। ‘स्किल इंडिया 2.0’ के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग जैसी उभरती तकनीकी स्किल्स को क्षेत्रीय भाषाओं में सिखाने का लक्ष्य डिजिटल डिवाइड को कम करने की दिशा में अहम कदम है। यदि प्रशिक्षक, पाठ्यक्रम और उद्योग-सहयोग मजबूत रहा, तो यह पहल ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं को तकनीकी दौड़ में शामिल कर सकती है। शिक्षा मंत्रालय के बजट में निरंतर वृद्धि यह संकेत देती है कि सरकार मानव पूंजी को भविष्य की सबसे बड़ी ताकत मान रही है। दिशा सही दिखती है, लेकिन परिणाम फिर से क्रियान्वयन की कसौटी पर ही तय होंगे। साथ ही महंगाई के मोर्चे पर सरकार ने चयनात्मक राहत दी है। कैंसर और डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं का सस्ता होना स्वास्थ्य खर्च के बोझ को कम करेगा। मोबाइल फोन, ईवी बैटरी और सौर पैनलों पर रियायतें ‘ग्रीन एनर्जी’ और ‘डिजिटल इंडिया’ को गति देने के साथ तकनीक को सुलभ बनाएंगी। हालांकि, शराब, खनिज और स्क्रैप पर बढ़े शुल्क से कुछ उद्योगों की लागत बढ़ेगी, जिसका असर अंतत: उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। बजट में पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये करना यह स्पष्ट करता है कि सरकार ‘सप्लाई-साइड’ अर्थव्यवस्था को विकास का इंजन मान रही है। सडकों, रेल और शहरी बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश का उद्देश्य भविष्य की आर्थिक क्षमता को अभी से तैयार करना है। सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर भारत की परिवहन व्यवस्था में गुणात्मक बदलाव ला सकते हैं। इससे न केवल यात्रा समय घटेगा, बल्कि उद्योग, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और रियल एस्टेट से जुड़े नए आर्थिक क्लस्टर विकसित होंगे। टियर-2 और टियर-3 शहरों पर केंद्रित नीति शहरीकरण के असंतुलन को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि, बुनियादी ढांचे में निवेश का लाभ आम आदमी तक पहुंचने में समय लगता है और अल्पकाल में निर्माण सामग्री की कीमतों में उछाल महंगाई का दबाव बढ़ा सकता है। एमएसएमई के लिए 10,000 करोड़ रुपये का एसएमई ग्रोथ फंड छोटे उद्यमों को विस्तार और नवाचार के लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध करा सकता है। महिलाओं के लिए मुद्र लोन की सीमा बढ़ाकर 20 लाख रुपये करना महिला उद्यमिता को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने की दिशा में बड़ा कदम है। टेक्निकल टेक्सटाइल और ‘मेक इन इंडिया’ पर फोकस भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर सकता है। ‘बायो-फार्मा 2.0’ और सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 भारत को स्वास्थ्य सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाले कदम हैं। क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क और सेमीकंडक्टर निर्माण में निवेश भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थान दिला सकता है। कुल मिलाकर यह भविष्योन्मुखी और विकासोन्मुखी बजट हैए जो भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करने का खाका प्रस्तुत करता है। बजट 2026 को एक दिशा-निर्देशक और संरचनात्मक बजट कहा जा सकता है, जो तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर 2047 के विकसित भारत के सपने को आर्थिक यथार्थ में बदलने की कोशिश करता है।



