Sunday, February 8, 2026
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ममता सरकार का जनहितैषी बजट

चुनावी साल में पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने राज्य का जो अंतरिम बजट पेश किया है, उसमें आर्थिक विकास के बीच संतुलन साधने का प्रयास करते हर वर्ग का ख्याल रखा गया है। खासतौर पर युवाओं और महिलाओं के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गई है, जो उनकी उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करेंगे। साथ ही बजट में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया गया है। वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने इस बजट के माध्यम से कर्मचारियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को राहत देने के उद्देश्य से कई अहम घोषणाएं की है। साथ ही महिलाओं, कर्मचारियों, युवाओं और किसानों चारों वर्गों को साधने का प्रयास साफ दिखाई देता है। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार चुनावी वर्ष में किसी भी बड़े सामाजिक समूह को नजरअंदाज नहीं करना चाहती। दरअसल चुनावी वर्ष में पेश किया गया बजट कभी केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि वह सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं, सामाजिक सोच और भविष्य की रणनीति का स्पष्ट संकेत भी देता है। पश्चिम बंगाल में वित्त वर्ष 2026-27 का बजट भी इसी कसौटी पर खरा उतरता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह एक साथ सामाजिक सुरक्षा और विकास दोनों को साधना चाहती है। बजट का सबसे प्रमुख चेहरा महिला-केंद्रित योजनाएं हैं। लक्ष्मी भंडार योजना की राशि में बढ़ोतरी केवल एक वित्तीय निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है। राज्य सरकार का दावा है कि इस कदम से महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह मजबूत होगा। 2021 के विधानसभा चुनाव में लक्ष्मी भंडार योजना ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय यह योजना महिलाओं के लिए आर्थिक संबल और राजनीतिक रूप से सत्ता पक्ष के लिए मजबूत हथियार बनकर उभरी थी। अब 2026 के चुनाव से ठीक पहले इस योजना की राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी कर देना कोई साधारण फैसला नहीं है। पहले जहां महिलाओं को 1000 रुपये प्रतिमाह मिलते थे, वहीं अब फरवरी 2026 से उन्हें 1500 रुपये मिलेंगे। यह बढ़ोतरी सीधे-सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी महिलाओं को राहत देने का दावा करती है। महंगाई, रसोई का खर्च और बच्चों की पढ़ाई, इन सबके बीच यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव काफी बड़ा है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह महिला सशक्तिकरण को केवल नारे तक सीमित नहीं रखती, बल्कि जेब में सीधा पैसा पहुंचाती है। बजट की एक और बड़ी घोषणा बेरोजगार युवाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की है। पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा रहा है। सरकारी नौकरियों की कमी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और विभिन्न नियुक्ति विवादों के कारण युवा वर्ग में असंतोष पनपता रहा है। ऐसे में यह भत्ता सरकार की ओर से यह स्वीकारोक्ति भी है कि बेरोजगारी की समस्या गंभीर है। हालांकि आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या 1500 रुपये प्रतिमाह से वास्तव में बेरोजगारी की समस्या हल होगी? या यह केवल तब तक का सहारा है, जब तक चुनावी मौसम गुजर न जाए? फिर भी, राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह कदम युवाओं के बीच नाराजगी को कम करने और संवाद बनाए रखने का प्रयास जरूर है। बजट में गिग वर्कर्स को स्वास्थ्य साथी जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में शामिल करने की घोषणा एक आधुनिक और समयानुकूल कदम मानी जा सकती है। ऐप-आधारित डिलीवरी कर्मी, फ्रीलांसर और असंगठित क्षेत्र के नए स्वरूप में काम कर रहे युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन्हें औपचारिक सामाजिक सुरक्षा दायरे में लाना सरकार के लिए एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, इस योजना के क्रियान्वयन पर कई सवाल बाकी हैं कि पंजीकरण कैसे होगा, लाभ कैसे मिलेगा और राज्य पर इसका दीर्घकालिक वित्तीय बोझ कितना पड़ेगा। फिर भी, नीति के स्तर पर यह स्वीकार करना कि श्रम बाजार बदल रहा है, एक अहम कदम है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के भत्ते में 1000 रुपये की बढ़ोतरी तथा उनकी मृत्यु पर 5 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा सरकार की सामाजिक संवेदनशीलता को रेखांकित करती है। ये वही कार्यकर्ता हैं, जो पोषण, टीकाकरण और महिला-बाल कल्याण योजनाओं की रीढ़ माने जाते हैं, लेकिन अक्सर सबसे कम वेतन और सबसे ज्यादा काम के बोझ का सामना करते हैं। इसी तरह सिविक वॉलंटियर्स और ग्रीन पुलिस कर्मियों के लिए 1000 रुपये की मासिक वेतन वृद्धि भी उन वर्गों को संतुष्ट करने का प्रयास है, जो कानून-व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन लंबे समय से स्थायी मान्यता और बेहतर वेतन की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा महंगाई भत्ते में चार प्रतिशत की बढ़ोतरी लंबे समय से चली आ रही मांग थी। डीए को लेकर असंतोष झेल रही सरकार ने इस कदम से एक बड़े और संगठित वर्ग को साधने की कोशिश की है। हालांकि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करने का भरोसा पहले भी दिया जा चुका है। ऐसे में कर्मचारियों की नजर अब केवल घोषणा पर नहीं, बल्कि समयबद्ध अमल पर टिकी रहेगी। बजट में युवाओं के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड और भविष्यत क्रेडिट कार्ड योजनाओं के विस्तार का ऐलान किया गया है। इसके साथ-साथ स्टार्ट-अप और एमएसएमई के लिए विशेष फंड तथा ‘उत्कर्ष बांग्ला’ के तहत नए कौशल विकास केंद्र खोलने की बात कही गई है। इन घोषणाओं से सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह केवल भत्ता-आधारित राजनीति नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल पर भी ध्यान दे रही है। कृषक बंधु और फसल बीमा योजनाओं को मजबूत करने का दावा ग्रामीण वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा है। बंगाल की अर्थव्यवस्था में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र की भूमिका आज भी अहम है। सडक़, पुल, पेयजल और संपर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं में निवेश की घोषणाएं ग्रामीण-शहरी अंतर को पाटने की दिशा में सकारात्मक संकेत देती हैं। विपक्ष ने बजट को ‘चुनावी लोकलुभावन’ करार दिया है। यह आरोप नया नहीं है कि चुनावी वर्ष में पेश होने वाले लगभग हर बजट पर यही टिप्पणी होती रही है। मगर हकिकत यह है कि राज्य की सîाा में आने के बाद से ही ममता सरकार का बजट हमेशा ही जनहितैषी ही होता है। चूंकि ममता जमीन से जुड़ी नेता है, इसलिए वह आम लोगों के दु:ख और दर्द को अच्छी तरह से समझती है। यही कारण है कि पिछले 14 वर्षों में उनकी सरकार के द्वारा जितने भी बजट पेश किया गया है, उसमें जनता पर कभी भी अतिरिक्त बोझ डालने की कोशिश नहीं की गयी है। अंतरिम बजट में भी लोकप्रिय सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और विकास के वादों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की गयी है। चुनावी संदर्भ में इसे पूरी तरह अलग करके देखना संभव नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि कई घोषणाएं यदि ईमानदारी और गति से लागू हुईं, तो वे राज्य की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर सकारात्मक असर डाल सकती हैं। कुल मिलाकर देख जाए तो ममता सरकार द्वारा जो बजट पेश किया गया है, इससे बंगाल के विकास का रोडमैप प्रस्तुत किया गया है, जो नि:संदेह प्रदेश की जनता के विकास में सहयोगी साबित होगा और उनका जीवन आसान बनायेगा।

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