Sunday, February 8, 2026
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‘महाडील’ और भारत का हित

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर फ्रेमवर्क का ऐलान सिर्फ दोनों देशों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक रणनीति का बड़ा पड़ाव माना जा रहा है। यह समझौता मार्च 2026 तक प्रस्तावित व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की नींव रखता है। टैरिफ में कटौती, सप्लाई चेन का पुनर्गठन और रणनीतिक साझेदारी, इन तीन स्तंभों पर यह व्यापार समझौता आधारित है। सरकार इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक अवसर बता रही है, वहीं विपक्ष और कई विशेषज्ञ इसे सावधानी से देखने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि क्या यह डील वास्तव में भारत के हितों को मजबूत करेगी, या फिर यह अमेरिकी लाभ की ओर झुका हुआ एक असंतुलित समझौता साबित हो सकती है? सरकार के अनुसार, यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार को और अधिक सुलभ बनाता है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर का बाजार भारतीय उत्पादों के लिए खोलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। खासकर फार्मास्युटिकल्स, रत्न-जवाहरात, हीरे, विमान पुर्जे, मशीनरी पार्ट्स, स्मार्टफोन और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में जीरो या कम टैरिफ का लाभ भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बढ़त दे सकता है। सरकार का यह भी दावा है कि यह समझौता छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई), किसानों और मछुआरों के लिए गेम-चेंजर साबित होगा। मसाले, चाय, कॉफी, नारियल तेल, फल-सब्जियां और प्रोसेस्ड फूड जैसे कृषि उत्पादों पर टैरिफ हटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिल सकता है। निर्यात बढऩे से रोजगार सृजन की संभावना भी सरकार का एक मजबूत तर्क है, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए। दूसरी ओर, भारत ने अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कई कृषि उत्पादों पर टैरिफ घटाने/हटाने पर सहमति दी है। इसमें सूखे अनाज, पशु-आहार के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे फल, सोयाबीन तेल, शराब-स्पिरिट शामिल हैं। इसके अलावा, मेडिकल डिवाइस, आईटी और कृषि उत्पादों पर लाइसेंस, सर्टिफिकेट और टेस्टिंग जैसी गैर-टैरिफ बाधाओं को सरल करने का वादा भी अहम है। किसानों को लेकर सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि कृषकों के हित से कोई समझौता नहीं किया गया है। मक्का, गेहूं, चावल, सोया, दूध-पनीर, मांस, मुर्गी-पालन, इथेनॉल, तंबाकू और कुछ सब्जियों पर टैरिफ रियायतें नहीं दी गईं हैं। यह निर्णय घरेलू कृषि और डेयरी इकोसिस्टम की आजीविका बचाने के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ इस समझौते को वैश्विक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है। अमेरिका ने चीन, बांग्लादेश जैसे देशों पर भारत की तुलना में अधिक टैरिफ लगाए हैं। ऐसे में अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक वैकल्पिक और भरोसेमंद सप्लाई-चेन पार्टनर के रूप में उभर सकता है। ‘चीन+1’ रणनीति के दौर में यह भारत के लिए एक सुनहरा मौका है, बशर्ते हम इसका सही उपयोग कर सकें। यदि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर गुणवत्ता, समयबद्ध डिलीवरी और लागत-प्रभावशीलता के मोर्चे पर खुद को साबित कर पाता है, तो यह समझौता दीर्घकाल में भारत को वैश्विक वैल्यू चेन में ऊपर ले जा सकता है। हालांकि, विपक्ष की आपत्तियां पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकतीं। कांग्रेस और अन्य आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि भारत ने बदले में अमेरिका को क्या रियायतें दी हैं। अंतरिम ढांचे में अभी सभी शर्तें सार्वजनिक नहीं हैं, और यही पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ी चिंता है। अतीत का अनुभव बताता है कि कई बार व्यापार समझौतों में विकसित अर्थव्यवस्थाएं विकासशील देशों पर दबाव बनाकर अपने कृषि, डेयरी या टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए विशेष रियायतें हासिल कर लेती हैं। आशंका यह है कि भविष्य की बातचीत में अमेरिका भारत के कृषि बाजार, डेयरी सेक्टर या डिजिटल नियमों पर दबाव बढ़ा सकता है। यदि ऐसा हुआ, तो इसका असर छोटे किसानों और घरेलू उद्योगों पर पड़ सकता है। सरकार भले ही किसानों और एमएसएमई के फायदे गिना रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी सरल नहीं है। भारतीय किसान पहले से ही कीमतों की अनिश्चितता, जलवायु संकट और लागत बढऩे की मार झेल रहे हैं। निर्यात के अवसर तब ही वास्तविक लाभ में बदलेंगे जब किसानों को लॉजिस्टिक्स, कोल्ड-चेन, गुणवत्ता प्रमाणन और वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन में सरकारी समर्थन मिले। एमएसएमई के मामले में भी यही बात लागू होती है। अमेरिकी बाजार में प्रवेश आसान नहीं है, क्योंकि कड़े मानक, कानूनी प्रक्रियाएं और ब्रांडिंग की चुनौती छोटे उद्यमों के लिए बड़ी बाधा बन सकती हैं। यदि सरकार केवल समझौते की घोषणा तक सीमित रह गई और जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण नहीं हुआ, तो लाभ कुछ बड़ी कंपनियों तक ही सिमट सकता है। निर्यात बढ़ने से रोजगार सृजन की संभावना जरूर बनती है, लेकिन यह अपने आप नहीं होता। ऑटोमेशन, तकनीकी अपग्रेड और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में रोजगार का स्वरूप भी बदल रहा है। नई नौकरियां तभी आएंगी जब कौशल विकास, तकनीकी प्रशिक्षण और श्रम सुधारों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जाएगा। वरना लाखों नौकरियों का दावा केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह सकता है। यह भी याद रखना जरूरी है कि यह एक अंतरिम फ्रेमवर्क है, न कि पूर्ण मुक्त व्यापार समझौता। असली परीक्षा आगे की बातचीत में होगी, जहां बारीक शर्तें तय होंगी। भारत को इस प्रक्रिया में आत्मविश्वास के साथ-साथ सतर्कता भी दिखानी होगी। किसी भी दबाव में घरेलू हितों खासकर कृषि, स्वास्थ्य और डिजिटल संप्रभुता से समझौता नहीं होना चाहिए। इसलिए भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को न तो आंख मूंदकर सराहा जाना चाहिए और न ही पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए। यह एक बड़ा अवसर, लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शिता बनाए रखे, संसद और जनता को भरोसे में ले, और यह सुनिश्चित करे कि लाभ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहें, बल्कि किसान, मजदूर और छोटे उद्यमी तक पहुंचे। अगर भारत इस समझौते को रणनीतिक समझदारी, घरेलू सुधारों और संतुलित कूटनीति के साथ आगे बढ़ाता है, तो यह डील देश को वैश्विक आर्थिक मंच पर एक मजबूत खिलाड़ी बना सकती है। लेकिन यदि जल्दबाजी या राजनीतिक प्रचार में संतुलन खोया गया, तो यही समझौता भविष्य में विवाद और असंतोष का कारण भी बन सकता है। हालांकि कुल मिलाकर देखा जाए तो अमेरिका में हुआ महाडील भारत की आर्थिक कूटनीति की परिपञ्चवता दिखाता है। यह समझौता व्यापार, तकनीक और रणनीति तीनों स्तरों पर भारत को आगे बढ़ाता है। सही नीतिगत क्रियान्वयन, उद्योग-सहयोग और बुनियादी ढांचे के सुधार के साथ यह ‘महाडील’ भारत को वैश्विक शक्ति-संतुलन में निर्णायक स्थान दिला सकती है। यदि भारत ने इस अवसर को पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ भुनाया, तो यह केवल निर्यात वृद्धि नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में एक ठोस कदम साबित होगा। मगर असली जीत तब होगी, जब व्यापार बढ़े और साथ-साथ भारतीय हित भी सुरक्षित रहें।

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