Thursday, February 12, 2026
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राष्ट्रगीत का सम्मान

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ केगायन को लेकर जारी किए गए नए प्रोटोकॉल केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक मर्यादा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी हैं। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके राष्ट्रीय प्रतीकों से होती है, जैसे राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रचिह्न और राष्ट्रगीत। ये प्रतीक केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और एकता के जीवंत प्रतीक होते हैं। ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना एक गंभीर और दूरगामी कदम माना जा सकता है। भारत में राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के सम्मान को लेकर पहले से विधिक प्रावधान मौजूद हैं। 1976 में संविधान के अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सक्वमान को शामिल किया गया। यह स्पष्ट संदेश था कि राष्ट्र की गरिमा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों से भी सुरक्षित रहती है। ‘वंदे मातरम्’ को संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया था। यद्यपि इसे राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के समकक्ष आधिकारिक मान्यता प्राप्त है, व्यवहारिक स्तर पर इसे वैसी प्रतिष्ठा लंबे समय तक नहीं मिल सकी। ‘वंदे मातरम्’ का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत उनके उपन्यास आनंद मठ का हिस्सा था। ऐतिहासिक दृष्टि से यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को इसे लिखा था और 1882 में ‘आनंदमठ’ उपन्यास में प्रकाशित किया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक मंच से गाया। इसके बाद यह स्वतंत्रता सेनानियों का प्रेरक नारा बन गया। ‘हे मां, मैं तुहें नमन करता हूं’, यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि मातृभूमि के प्रति समर्पण का उद्घोष था। इसके बाद 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का नारा बन गया। हजारों क्रांतिकारियों ने ‘वंदे मातरम्’ को मंत्र की तरह अपनाया। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं था, बल्कि मातृभूमि के प्रति समर्पण और बलिदान की भावना का प्रतीक था। फिर भी, स्वतंत्रता के बाद यह गीत विवादों के घेरे में आ गया। संविधान सभा में इसे राष्ट्रगान का दर्जा देने पर मतभेद उभरे। अंतत: डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगीत घोषित किया। यह समाधान उस समय की परिस्थितियों में संतुलनकारी कदम था। लेकिन उसके बाद भी समय-समय पर इस गीत को लेकर राजनीतिक बहसें होती रहीं। वर्ष 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना अहमद अली द्वारा व्यक्त आपत्ति को यदि तत्कालीन नेतृत्व ने सीमित महत्व दिया होता, तो शायद आगे चलकर यह विवाद इतना गहरा न होता। इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों ने ‘वंदे मातरम्’ के स्वर को बुलंद किया। यह गीत किसी संप्रदाय विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि विदेशी दासता के विरुद्ध था। इसके शब्दों में मातृभूमि को शक्ति, विद्या और समृद्धि के प्रतीक रूप में चित्रित किया गया है। अब गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों में आधिकारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों के गायन या वादन को अनिवार्य किया गया है, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड निर्धारित की गई है। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का राष्ट्रीय स्तर पर उत्सव मनाया जा रहा है। राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रपति के आगमन, उनके संबोधन या सरकारी आयोजनों जैसे औपचारिक अवसरों पर ‘वंदे मातरम्’ का पूरा आधिकारिक संस्करण प्रस्तुत करने की व्यवस्था, राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा को अधिक स्पष्ट और औपचारिक रूप देने का प्रयास है। साथ ही शैक्षणिक संस्थानों को इसे दैनिक प्रार्थना या शैक्षणिक कार्यक्रमों में बढ़ावा देने की सलाह देना आने वाली पीढ़ी में राष्ट्रभावना को सुदृढ़ करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सकता है। राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम संबोधन, राष्ट्रीय ध्वज फहराने जैसे औपचारिक अवसरों पर इसे राष्ट्रगान से पहले गाया जाएगा। साथ ही सभी उपस्थित व्यक्तियों के सम्मान में खड़े होने का प्रावधान किया गया है। शैक्षणिक संस्थानों में भी इसे प्रार्थना अथवा विशेष कार्यक्रमों में प्रोत्साहित करने की बात कही गई है। यह निर्णय राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति जागरूकता और सम्मान बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक माना जा सकता है। विशेषकर नई पीढ़ी के बीच राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व को समझाने की आवश्यकता है। जब छात्र ‘वंदे मातरम्’ के भावार्थ को समझेंगे ‘सुजलां, सुफलां, शस्यश्यामलां मातृभूमि की कल्पना को आत्मसात करेंगे’ तब उनके मन में राष्ट्र के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा उत्पन्न होगी। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस विषय को राजनीतिक रंग न दिया जाए। किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान स्वाभाविक और हृदय से होना चाहिए, न कि केवल बाध्यता के कारण। यदि इसे किसी समुदाय या विचारधारा के विरुद्ध हथियार की तरह प्रस्तुत किया जाएगा, तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। राष्ट्रगीत का सक्वमान एक साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में होना चाहिए, न कि विभाजनकारी विमर्श का माध्यम बनकर। यह भी उल्लेखनीय है कि सिनेमा हॉल को इस अनिवार्यता से बाहर रखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार औपचारिक और संवैधानिक आयोजनों तक ही इसे सीमित रखना चाहती है। यह संतुलन आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय सक्वमान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच सामंजस्य बना रहे। ‘वंदे मातरक्वा्’ के छह पदों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के प्रतीक रूप में चित्रित किया गया है। कुछ समूहों ने इन्हीं प्रतीकों के आधार पर आपत्ति जताई है। परंतु इसे सांस्कृतिक रूपक के रूप में समझा जाना चाहिए। भारतीय परंपरा में भूमि को ‘मां’ कहना कोई धार्मिक आग्रह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भाव है। जिस प्रकार ‘भारत माता’ की संकल्पना भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, उसी प्रकार ‘वंदे मातरम्’ भी राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रगीत को सम्मान देने की प्रक्रिया संवाद और समझ के साथ आगे बढ़े। इतिहास की गलतफहमियों को दूर कर, इसे स्वतंत्रता संग्राम की धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया जाए। जब हम इसके ऐतिहासिक योगदान को याद करेंगे,क्रांतिकारियों के बलिदान, आंदोलनों की गूंज और राष्ट्रीय एकता के स्वर तब इसका समान स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। अंतत:, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल विधिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व है। ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी नए दिशानिर्देश यदि राष्ट्रभावना को सशक्त करने, सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्मरण कराने और संवैधानिक मर्यादाओं को स्थापित करने में सफल होते हैं, तो यह कदम स्वागतयोग्य कहा जाएगा। इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह आदेश राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के संबंध में स्पष्टता और अनुशासन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का प्रयास है। परंतु इस प्रक्रिया में संतुलन, संवेदनशीलता और समावेशिता का ध्यान रखना अनिवार्य है। राष्ट्रप्रेम को आदेश से नहीं, बल्कि जागरूकता, संवाद और सहभागिता से मजबूत किया जा सकता है। यदि यह आदेश इन मूल्यों के साथ लागू होता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने का अवसर सिद्ध हो सकता है।

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