– महेन्द्र तिवारी
भारत आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका युवा वर्ग है। करोड़ों सपनों, संभावनाओं और ऊर्जा से भरी यह पीढ़ी यदि सही दिशा पाए, तो देश को आने वाले दशकों में नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है। हाल ही में प्रस्तुत बजट ने इसी युवा शक्ति को केंद्र में रखकर भविष्य की नींव रखने का प्रयास किया है। यह बजट केवल आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतिबिंब है जो भारत को केवल रोज़गार खोजने वाला देश नहीं, बल्कि रोज़गार देने वाला समाज बनाना चाहती है। आज जब बेरोज़गारी, तकनीकी परिवर्तन और शिक्षा की प्रासंगिकता जैसे प्रश्न सामने खड़े हैं, तब यह आवश्यक हो गया था कि शिक्षा और कौशल को नई दृष्टि से देखा जाए।
अब तक की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा दोष यह रहा है कि वह ज्ञान तो देती रही, परंतु जीवन और रोज़गार से उसका सीधा संबंध कमजोर होता गया। डिग्रियाँ बढ़ती गईं, पर हाथों में काम कम होता गया। इसी असंतुलन को सुधारने की दिशा में इस बजट ने एक ठोस पहल की है। शिक्षा और कौशल से जुड़े प्रावधानों में उल्लेखनीय वृद्धि यह संकेत देती है कि सरकार अब केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि व्यावहारिक क्षमता, रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना चाहती है। यह बदलाव उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब दुनिया तेज़ी से तकनीकी बदलावों की ओर बढ़ रही है और पारंपरिक नौकरियाँ लगातार सिमटती जा रही हैं।
बचपन से ही बच्चों को रचनात्मक सोच और तकनीकी समझ से जोड़ने का विचार इस बजट की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। विद्यालयों में नई प्रकार की प्रयोगशालाओं की स्थापना का प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि अब शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं रहेगी, बल्कि सृजन और निर्माण की प्रक्रिया बनेगी। जिन बच्चों को अब तक केवल उपभोक्ता के रूप में देखा जाता था, वे अब निर्माता बनने की ओर अग्रसर होंगे। जो बच्चे खेल खेलते हुए समय बिताते थे, वे अब अपने विचारों और कल्पनाओं को आकार देना सीखेंगे। इससे न केवल उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि वे कम उम्र में ही अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में कदम बढ़ा सकेंगे।
इस प्रकार की शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि युवाओं में पलायन की प्रवृत्ति कम होगी। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे भी अपने ही परिवेश में अवसर खोज सकेंगे। जब हुनर घर के पास ही रोज़गार देने लगे, तब महानगरों पर बोझ अपने आप कम होगा। इसके साथ ही देश में रचनात्मक उद्योगों का विस्तार होगा, जिससे सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक सशक्तिकरण एक साथ आगे बढ़ेंगे। यह केवल रोज़गार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान और स्वाभिमान से भी जुड़ा हुआ है।
विज्ञान और आकाशीय अध्ययन से जुड़ी नई संस्थाओं की स्थापना का निर्णय यह दर्शाता है कि देश केवल वर्तमान की ज़रूरतों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए जिज्ञासा और अनुसंधान की जमीन तैयार करना चाहता है। जब दूर-दराज़ के इलाकों का कोई बच्चा तारों और ग्रहों के रहस्यों को समझने का अवसर पाएगा, तो उसकी सोच की सीमाएँ अपने आप विस्तृत होंगी। इससे समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होगा, जो किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र की पहचान होती है। ऐसे केंद्र केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं होंगे, बल्कि वे सामान्य विद्यार्थियों के भीतर छिपी संभावनाओं को उजागर करने का माध्यम बनेंगे।
इस पूरे प्रयास में बेटियों की भूमिका को विशेष रूप से महत्व दिया जाना अत्यंत आवश्यक था, और यह बजट इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत देता है। लंबे समय से यह देखा गया है कि उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी आवास, सुरक्षा और सामाजिक दबावों के कारण सीमित रह जाती है। नए छात्रावासों की योजना केवल ईंट और सीमेंट का ढाँचा नहीं है, बल्कि यह भरोसे और स्वतंत्रता की नींव है। जब किसी ग्रामीण परिवार की बेटी निश्चिंत होकर पढ़ने के लिए शहर जा सकेगी, तब उसके सपनों को पंख मिलेंगे। यह केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं होगी, बल्कि पूरे समाज की सोच में बदलाव आएगा।
शिक्षा के साथ-साथ छोटे उद्योगों और युवाओं के बीच सेतु बनाने की पहल भी इस बजट का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। छोटे उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, परंतु उन्हें अक्सर मार्गदर्शन और आधुनिक प्रबंधन की कमी से जूझना पड़ता है। यदि युवा इन उद्योगों के साथ जुड़कर उन्हें नई दिशा दें, तो एक ओर उद्योग मज़बूत होंगे और दूसरी ओर युवाओं को सम्मानजनक रोज़गार मिलेगा। यह साझेदारी शहर और कस्बों के बीच की दूरी को भी कम करेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाएगी।
हालाँकि, इन सभी योजनाओं की सफलता केवल घोषणाओं से तय नहीं होगी। सबसे बड़ी चुनौती इनके क्रियान्वयन की है। प्रयोगशालाएँ बनाना आसान है, पर उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक तैयार करना कठिन है। तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ बिजली, संपर्क और पारदर्शिता जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि इन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो अच्छी नीयत भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि समाज, शिक्षा संस्थान और प्रशासन मिलकर इस परिवर्तन को ज़मीन पर उतारें।
इसके बावजूद, यह कहा जा सकता है कि यह बजट एक आशावादी दिशा की ओर संकेत करता है। यह युवाओं को यह संदेश देता है कि भविष्य उनका है, बशर्ते वे सीखने, बदलने और मेहनत करने को तैयार हों। आने वाले वर्षों में यदि इन योजनाओं को ईमानदारी से लागू किया गया, तो भारत केवल उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि सृजन, नवाचार और आत्मनिर्भरता का केंद्र बनेगा। बच्चे रचनाकार बनेंगे, युवा उद्यमी बनेंगे और देश की प्रगति एक नए रूप में सामने आएगी। यही वह रास्ता है जो भारत को आने वाले समय में सशक्त, समावेशी और आत्मविश्वासी राष्ट्र बना सकता है।
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शिक्षा से आत्मनिर्भरता की ओर


