Tuesday, February 10, 2026
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अविश्वास प्रस्ताव का औचित्य

कांग्रेस ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की जो पहल की है, उसका कोई औचित्य दिखाई नहीं देता है, क्योंकि उसको को अच्छी तरह से यह बात मालूम है कि यह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता है, लेकिन इससे संसद की गरिमा जरूर धूमिल होगी। कांग्रेस को भी यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं, निष्पक्षता और संसदीय संतुलन का प्रतीक माना जाता है। अध्यक्ष का दायित्व है कि वह सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को समान अवसर दें, सदन की गरिमा बनाए रखें और नियमों के दायरे में रहते हुए बहस को सुचारु रूप से आगे बढ़ाएं। ऐसे में जब विपक्ष द्वारा वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है, तो यह केवल एक राजनीतिक कदम नहीं रहता, बल्कि संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकसभा स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव भारतीय संसदीय लोकतंत्र में एक असाधारण और गंभीर कदम माना जाता है। यह न केवल किसी व्यक्ति विशेष पर अविश्वास व्यक्त करता है, बल्कि संसद की कार्यप्रणाली, उसकी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इसलिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव इसी संदर्भ में व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक बहस को जन्म दे रहा है। सवाल यह नहीं है कि यह प्रस्ताव पारित होगा या नहीं, क्योंकि संख्या बल के आधार पर इसके सफल होने की संभावना नगण्य है, बल्कि बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह कदम संसदीय परंपराओं को सुदृढ़ करता है या उन्हें कमजोर करता है। स्पीकर का चुनाव बहुमत के आधार पर होता है और वह किसी न किसी दल की पृष्ठभूमि से आता है। यहीं से टकराव की संभावनाएं जन्म लेती हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि मौजूदा स्पीकर ने सदन की कार्यवाही में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है विशेषकर तब, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने की अनुमति नहीं दी गई और कुछ महिला सांसदों के साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार हुआ। विपक्ष इसे अपनी आवाज दबाने का प्रयास मानता है। अगर देखा जाए तो वर्तमान लोकसभा की संरचना स्पष्ट संकेत देती है कि यह अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। सत्तारूढ़ एनडीए के पास 293 सांसद हैं, जो बहुमत के आंकड़े 272 से अधिक हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन 234 सीटों के साथ इस आंकड़े से काफी दूर है। जब तक टीडीपी या जेडीयू जैसे प्रमुख सहयोगी पाला नहीं बदलते, जो फिलहाल असंभव प्रतीत होता है, स्पीकर की कुर्सी को कोई वास्तविक खतरा नहीं है। ऐसे में यह प्रस्ताव एक व्यावहारिक कोशिश कम और राजनीतिक संदेश अधिक लगता है। हालांकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94(सी) लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने की व्यवस्था करता है। यह प्रक्रिया महाभियोग नहीं कहलाती, लेकिन इसकी शर्तें इतनी कठोर हैं कि इसे सफल बनाना अत्यंत कठिन हो जाता है। अध्यक्ष को हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाया जाता है, जिसे लोकसभा की कुल प्रभावी सदस्यता के साधारण बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। इसका अर्थ यह है कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या पर्याप्त नहीं होती, बल्कि रिक्त सीटों को छोड़कर पूरी लोकसभा के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया कई चरणों में बंटी है। सबसे पहले, प्रस्ताव का लिखित नोटिस कम से कम 14 दिन पहले लोकसभा महासचिव को दिया जाता है, जिस पर न्यूनतम दो सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। इसके बाद नोटिस की भाषा और आरोपों की प्रारंभिक जांच होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरोप स्पष्ट, ठोस और गैर-मानहानिकारक हैं। यहां एक व्यावहारिक समस्या भी सामने आती है कि क्या अध्यक्ष स्वयं अपने खिलाफ लाए गए प्रस्ताव की जांच कर सकते हैं? परंपरागत रूप से यह जिम्मेदारी उपाध्यक्ष या पीठासीन सभापतियों की समिति के वरिष्ठ सदस्य को सौंपी जाती है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे। नोटिस स्वीकार होने के बाद भी प्रस्ताव तुरंत सदन में नहीं आ सकता। कम से कम 14 दिनों का अंतराल अनिवार्य है। इसके बाद सदन की ‘अनुमति’ यानी लीव ऑफ द हाउस ली जाती है, जिसके लिए कम से कम 50 सांसदों का खड़े होकर समर्थन जताना आवश्यक होता है। अनुमति मिलने पर प्रस्ताव पर चर्चा होती है और नियमों के अनुसार 10 दिनों के भीतर उसका निपटारा किया जाना चाहिए। अगर देखा जाए तो अविश्वास प्रस्ताव लाने के पीछे मकसद कुछ और ही है, क्योंकि विपक्ष शायद जानता है कि वह जीत नहीं सकता, पर वह यह दिखाना चाहता है कि वह चुप नहीं बैठेगा। यह प्रस्ताव सरकार और स्पीकर दोनों के खिलाफ असहमति दर्ज कराने का एक प्रतीकात्मक औजार बन गया है। दरअसल यह प्रक्रिया जानबूझकर कठिन बनाई गई है ताकि स्पीकर को राजनीतिक अस्थिरता से बचाया जा सके। इतिहास भी यही बताता है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव अत्यंत दुर्लभ रहे हैं और कभी सफल नहीं हुए। 1954 में जी.वी. मावलंकर, 1966 में हुकम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ तीनों मामलों में प्रस्ताव या तो गिर गया या अस्वीकार कर दिया गया। इसका कारण केवल संख्या बल नहीं, बल्कि यह समझ भी रही कि स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाना पूरे संसदीय ढांचे को कमजोर कर सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब ओम बिरला ने यह निर्णय लिया कि अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होने तक वह लोकसभा की अध्यक्षता नहीं करेंगे। एक दृष्टि से यह निर्णय पद की गरिमा बनाए रखने का प्रयास कहा जा सकता है कि जिस पर पक्षपात का आरोप है, वह स्वयं कार्यवाही से अलग रहे। दूसरी ओर, विपक्ष इसे इस बात का संकेत मान रहा है कि स्पीकर पर सरकार का दबाव है और वे सफाई देने को मजबूर हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या स्पीकर का इस तरह स्वयं को अलग करना एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत करेगा या भविष्य में स्पीकर के पद को और अधिक विवादास्पद बना देगा। अगर देखा जाए तो विपक्ष का दायित्व केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती सुनिश्चित करना भी है। यदि अविश्वास प्रस्ताव केवल हंगामा खड़ा करने या राजनीतिक सुर्खियां बटोरने का माध्यम बनता है, तो यह संसद की गरिमा को ठेस पहुंचा सकता है। वहीं, यदि यह वास्तव में निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लाया गया है, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए भले ही वह पारित न हो। ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम लगभग तय है, पर इसका राजनीतिक और संस्थागत प्रभाव दूरगामी हो सकता है। यह घटना एक बार फिर हमें याद दिलाती है कि संसद केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि संवाद, सहिष्णुता और संस्थागत सक्वमान का मंच है। इसलिए यह जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण को केवल राजनीतिक जीत-हार के चश्मे से नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के संदर्भ में देखा जाए। समझना होगा कि संसद किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की आवाज है। यदि यह आवाज अविश्वास, शोर और टकराव में दबने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। आज जरूरत इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों लोकतंत्र की इस कसौटी पर खरे उतरें।

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