प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय दौरे पर इजरायल जा रहे हैं, जो कई मायनो में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह केवल एक द्विपक्षीय दौरा नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की रणनीतिक दिशा का संकेत है। इसका कारण है कि यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा नजर आता है। एक ओर गाजा युद्ध के बाद भी तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की आशंका लगातार बनी हुई है। ऐसे जटिल माहौल में यह दौरा केवल एक द्विपक्षीय कूटनीतिक यात्रा तक सीमित नहीं रहने वाला है, इसका प्रभाव काफी दूरगामी हो सकता है, जिसका असर पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और यूरोप तक महसूस किए जा सकते हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया की निगाहें इस यात्रा पर टिकी है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है और परमाणु समझौते को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इजरायल ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु गतिविधियों को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है। ऐसे माहौल में भारत के प्रधानमंत्री का इजरायल जाना कई संभावनाओं का जन्म दे रहा है। इतना तो स्पष्टï है कि इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और प्रधानमंत्री मोदी जब मिलेंगे, तो सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों को गति देने तक दोनों की वार्ता सीमित नहीं रहने वाली है। वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा होगी और देखने वाली बात होगी कि भारत का रुख क्या रहता है। हालांकि हमेशा से ही भारत की स्थिति संतुलन की रही है। एक ओर भारत के इजरायल से गहरे रक्षा संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा, चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के रणनीतिक हित जुड़े हैं। यही संतुलन भारतीय कूटनीति की परिपञ्चवता को दर्शाता है। भारत किसी ब्लॉक की राजनीति में शामिल नहीं होना चाहता, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर बहुध्रुवीय दुनिया में अपनी भूमिका तय कर रहा है। अगर देखा जाए तो पिछले एक दशक में भारत-इजरायल रक्षा संबंधों ने नई ऊंचाइयां छुई हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि 2020 से 2024 के बीच इजरायली हथियारों की कुल बिक्री का 34 प्रतिशत हिस्सा भारत का रहा। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि भारत इजरायल के लिए कितना महत्वपूर्ण रक्षा ग्राहक है। लेकिन अब संबंध केवल ‘खरीदार-विक्रेता’ तक सीमित नहीं हैं। इजरायल की बड़ी रक्षा कंपनियां भारत में अपनी सहायक इकाइयां स्थापित कर चुकी हैं। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और ज्वाइंट डेवलपमेंट पर जोर दिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, एल्बिट सिस्टम्स के हर्मीस 900 ड्रोन पर आधारित भारतीय दृष्टि-10 स्टारलाइनर का निर्माण भारत में हो रहा है। यह दिखाता है कि भारत केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि उत्पादन और अनुसंधान का साझेदार बन रहा है। इसके पहले 2017 में मोदी ने इजरायल का दौरा किया था,जो कई मायनों में ऐतिहासिक था, क्योंकि वे वहां जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। अब नौ वर्षों बाद उनका दूसरा दौरा इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के रिश्ते अब औपचारिकता से आगे बढक़र गहरी रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं। भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग सबसे मजबूत कड़ी है। कारगिल युद्ध से लेकर मुंबई आतंकी हमले के बाद तक, इजरायल ने भारत को महत्वपूर्ण सैन्य तकनीक और खुफिया सहयोग दिया। वर्तमान वार्ता में बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली, निर्देशित ऊर्जा लेजर हथियार, ड्रोन तकनीक और लंबी दूरी की स्टैंड-ऑफ मिसाइलों पर संयुक्त विकास की चर्चा संभावित है। इजरायल की ‘आयरन डोम’, ‘डेविड्स स्लिंग’ और ‘एरो’ प्रणालियां विश्व में अत्याधुनिक मानी जाती हैं। भारत अपने ‘मिशन सुदर्शन’ के तहत मजबूत मिसाइल रक्षा ढांचा विकसित करना चाहता है। ऐसे में सह-उत्पादन और सह-विकास का समझौता भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ रक्षा दृष्टिकोण को नई गति दे सकता है। नेतन्याहू द्वारा प्रस्तावित ‘हेक्सागन एलायंस’ जिसमें भारत, अरब और अफ्रीकी देश, ग्रीस, साइप्रस और अन्य एशियाई राष्ट्र शामिल हो सकते हैं। दरअसल एक व्यापक भू-राजनीतिक पहल है। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि कट्टरपंथी शक्तियों के विरुद्ध साझा सुरक्षा ढांचा तैयार करना है। यह पहल भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (आईएमईसी) से भी जुड़ी है, जो एशिया से यूरोप तक वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग विकसित करने का प्रयास है। यदि आईएमईसी पर ठोस प्रगति होती है, तो भारत को खाड़ी देशों के रास्ते यूरोप तक तेज और सस्ता व्यापारिक मार्ग मिल सकता है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। रक्षा के अलावा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक और जल प्रबंधन में सहयोग बढऩे की उक्वमीद है। इजरायल ‘स्टार्ट-अप नेशन’ के रूप में प्रसिद्ध है, जबकि भारत डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एआई समिट में इजरायली प्रतिनिधिमंडल की सक्रिय भागीदारी ने इस दिशा में बढ़ते तालमेल का संकेत दिया है। कृषि क्षेत्र में इजरायल के उत्कृष्टता केंद्रों ने भारत के कई राज्यों में उत्पादन क्षमता बढ़ाई है। जल प्रबंधन और ड्रिप सिंचाई तकनीक भी दोनों देशों के सहयोग का सफल उदाहरण है। भविष्य में जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने में यह साझेदारी और महत्वपूर्ण हो सकती है। वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 3.75 अरब डॉलर रहा। क्षेत्रीय सुरक्षा संकटों के कारण व्यापार में गिरावट आई, लेकिन दीर्घकालीन संभावनाएं व्यापक हैं। हीरे, पेट्रोलियम और रसायनों के अलावा अब इलेक्ट्रॉनिक्स, हाई-टेक उत्पाद और चिकित्सा उपकरणों में भी व्यापार बढ़ रहा है। भारत द्वारा हाइफा बंदरगाह के अधिग्रहण में भारतीय निवेश समूह की भूमिका यह दर्शाती है कि आर्थिक संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि सामरिक अवसंरचना तक विस्तारित हो चुके हैं। भारत और इजरायल दोनों आतंकवाद से प्रभावित रहे हैं। यही साझा अनुभव दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब लाता है। हालांकि भारत-इजरायल संबंधों की मजबूती स्पष्ट है, भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ भी बनाए रखनी होगी। पश्चिम एशिया में भारत के गहरे संबंध सऊदी अरब, यूएई और ईरान से भी हैं। लाखों भारतीय प्रवासी खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। ऐसे में भारत की कूटनीति का लक्ष्य किसी एक धुरी में शामिल होना नहीं, बल्कि संतुलन साधते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना है। इसलिए मोदी का यह दौरा प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत मित्रता का परिणाम नहीं, बल्कि दो लोकतांत्रिक देशों के बीच विकसित होते रणनीतिक भरोसे का संकेत है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और वैश्विक मंचों पर समन्वय इन सभी क्षेत्रों में सहयोग गहरा होने की संभावना है। आने वाले वर्षों में भारत और इजरायल का संबंध एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। मध्य पूर्व की अस्थिरता, ईरान-अमेरिका तनाव, गाजा संघर्ष और क्षेत्रीय गठबंधनों की उभरती राजनीति के बीच यह यात्रा भारत की सामरिक परिपञ्चवता की परीक्षा भी है। दुनिया की नजर इस यात्रा पर इसलिए है क्योंकि यह केवल भारत-इजरायल संबंधों का सवाल नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका का संकेत है।


