-अशोक अग्रवाल
समाज में शुभ अवसरों पर उपहार देने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। विवाह, जन्मदिन, गृहप्रवेश, सिल्वर जुबली , गोल्डन जुबली, सम्मान समारोह – हर अवसर पर हम अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करने के लिए कुछ न कुछ भेंट करते हैं। हम खाली हाथ जाना उचित नहीं समझते। पिछले कुछ दशकों में एक प्रचलन विशेष रूप से बढ़ा है – फूलों का गुलदस्ता (Flower Bouquet) देना । आजकल किसी भी समारोह में जाएँ, तो सामान्यतः 1000 से 1500 रुपये या उससे अधिक मूल्य का गुलदस्ता लेकर पहुँचना मानो सामाजिक शिष्टाचार बन गया है। कई बार हम सामने वाले की ‘स्टेटस’ के अनुरूप महँगा गुलदस्ता चुनते हैं। मेजबान उसे हाथ में पकड़ता है, एक मुस्कान के साथ फोटो खिंचवाता है और फिर उसे किनारे रख दिया जाता है। समारोह में मंच पर गुलदस्तों की कतार लग जाती है। परंतु सच यह है कि अधिकांश लोग उन गुलदस्तों को ध्यान से देखते तक नहीं। वे मंच के एक कोने में रख दिए जाते हैं और अगले दिन प्रायः कूड़ेदान में पहुँच जाते हैं।
सोचिए, एक दिन में मुरझा जाने वाला उपहार, क्या हमारी शुभकामनाएँ भी इतनी ही अल्पकालिक होनी चाहिए ?
अधिकांश गुलदस्ते प्लास्टिक शीट, रिबन और थर्मोकोल से सजाए जाते हैं, जो पर्यावरण के लिए भी हानिकारक हैं।
उपहार की कीमत उसकी ‘प्राइस टैग’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘उपयोगिता’ और उसके पीछे छिपे ‘भाव’ से तय होनी चाहिए।
उपहार जो वर्षों तक याद दिलाएं :
उपहार का अर्थ है—एक ऐसी वस्तु जो आपकी याद दिलाए। बुके तो अगले 24 घंटों में विस्मृत हो जाता है, लेकिन कुछ विकल्प ऐसे हैं जो वर्षों तक आपके संबंधों की गर्माहट बनाए रख सकते हैं:
पुस्तकों का उपहार: पुस्तकें सबसे अच्छी मित्र होती हैं। एक अच्छी पुस्तक न केवल ज्ञान देती है, बल्कि वह घर की अलमारी में हमेशा के लिए सुरक्षित रहती है। उसे परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी पढ़ सकता है। पुस्तक एक ऐसा उपहार है जो केवल वस्तु नहीं, बल्कि विचार, ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत है। समय-समय पर परिवार का कोई न कोई सदस्य उसे पढ़ता है और अनायास ही देने वाले को स्मरण करता है। आज के डिजिटल युग में पुस्तकों की खरीद कम हो गई है। लोग मोबाइल और इंटरनेट पर अधिक समय बिताते हैं। यदि हम पुस्तकें उपहार में देंगे, तो पढ़ने की संस्कृति को भी प्रोत्साहन मिलेगा। संभव है कि वही पुस्तक किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल दे।
कलाकृतियाँ या पेंटिंग: एक सुंदर रूम पेंटिंग या दीवार पर सजने वाली कोई कलाकृति वर्षों तक घर की शोभा बढ़ाती है और जब भी उस पर नजर पड़ती है, देने वाले का चेहरा याद आता है।
पौधे: यदि आपको प्रकृति से प्रेम है, तो कटे हुए फूलों के बजाय एक ‘लाइव प्लांट’ भेंट करें। वह पौधा जैसे-जैसे बढ़ेगा, आपके संबंधों की जड़ें भी उतनी ही गहरी होंगी।
मेरे निजी अनुभव – मैंने पिछले 30 वर्षों से लगभग हर अवसर पर पुस्तकें ही भेंट की हैं। इसका एक भावुक पहलू भी है। मेरे पास आज भी मेरे पिताजी द्वारा 1945 में खरीदी गई डेल कार्नेगी की प्रसिद्ध पुस्तक “How to Win Friends & Influence People” सुरक्षित है। उस पर उनका नाम और तारीख लिखी हुई है। जब भी मैं उसे देखता हूँ, मुझे अपने पिता के विचारों और उस दौर का अहसास होता है।
शुभ अवसर पर समाज को दान की परम्परा :
एक और अनोखा और सार्थक प्रयोग किया जा सकता है। हम किसी स्थानीय गौशाला, विद्यालय, अस्पताल या सामाजिक संस्था के नाम 500 या 1000 रुपये का चेक दे सकते हैं और उसे अपने मित्र के माध्यम से उस संस्था तक पहुँचाने का अनुरोध कर सकते हैं। इससे दो कार्य होंगे—एक तो हमारा मित्र सम्मानित महसूस करेगा कि उसके अवसर पर समाज के लिए कुछ अच्छा हुआ; दूसरा, हमारी शुभकामना समाजहित में परिवर्तित हो जाएगी।
परम्पराएँ समय के साथ बदलनी चाहिए :
परम्पराएँ समय के साथ बदलती हैं। कभी स्वागत के लिए माला पहनाना ही मुख्य था, फिर गुलदस्तों का चलन आया। अब समय है कि हम अगला कदम उठाएँ। समाज में परिवर्तन तब आता है जब कोई एक व्यक्ति पहल करता है। यदि हम स्वयं गुलदस्ता देने से विनम्रतापूर्वक मना करें और उसके स्थान पर पुस्तक या दान का विकल्प प्रस्तुत करें, तो धीरे-धीरे यह एक नई परम्परा बन सकती है।
किसी समारोह में यदि आयोजक पहले से ही यह घोषणा कर दें कि “कृपया गुलदस्ते न लाएँ, इसके स्थान पर पुस्तक या दान स्वीकार्य होगा”, तो यह एक सकारात्मक संदेश देगा। कई संस्थाएँ अब इस दिशा में कदम भी उठा रही हैं।
यह लेख किसी परम्परा की आलोचना नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विनम्र प्रयास है। फूल सुंदर हैं, प्रकृति का अनुपम उपहार हैं; परंतु उन्हें केवल औपचारिक उपहार बनाकर कूड़ेदान तक सीमित कर देना शायद उचित नहीं। यदि हम सचमुच अपनी शुभकामनाओं को सार्थक बनाना चाहते हैं, तो हमें ऐसे उपहार चुनने चाहिए जो ज्ञान, उपयोगिता और समाजहित से जुड़े हों।
चिंतक एवं लेखक, सिलीगुड़ी
M: 9434045738


