Sunday, February 8, 2026
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ऐतिहासिक व्यापार समझौता

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) पर सहमति बनना केवल एक व्यापारिक करार नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक हैसियत को स्थापित करने वाला ऐतिहासिक पड़ाव है। लगभग दो दशकों की लंबी और जटिल बातचीत के बाद सामने आया यह समझौता केवल टैरिफ कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्संरेखण, निवेश प्रवाह, नवाचार और रोजगार सृजन के लिए एक व्यापक ढांचा प्रस्तुत करता है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था भारत और लगभग 45 करोड़ आबादी वाले यूरोपीय बाजार के बीच यह सीधा आर्थिक सेतु, दोनों पक्षों के लिए दीर्घकालिक लाभ की नींव रखता है। यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की रणनीतिक परिपञ्चवता का संकेत भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जाना इसके दायरे, महत्व और संभावनाओं को रेखांकित करता है। दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं भारत और यूरोपीय संघके बीच यह करार ऐसे समय हुआ है, जब वैश्विक व्यापार संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति शृंखला के पुनर्संयोजन के दौर से गुजर रहा है। यह तथ्य अपने आप में उल्लेखनीय है कि 2007 में शुरू हुई वार्ताएं 18 वर्षों तक चलीं। इस दौरान कई वैश्विक संकट आए जिसमें वैश्विक वित्तीय मंदी, ब्रेक्जिट, कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया व्यापार युद्धों की आहट शामिल है। इन सबके बीच भारत-ईयू एफटीए का पटरी पर आना बताता है कि दोनों पक्ष अब केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे की नई इबारत लिखना चाहते हैं। यह डील भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाती है और दुनिया की 25 प्रतिशत जीडीपी तथा एक-तिहाई वैश्विक व्यापार को जोडऩे वाला ढांचा तैयार करती है। इस एफटीए के तहत अगले सात वर्षों में यूरोपीय संघ 99.5 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क समाप्त करेगा, जबकि कुल 96.6 प्रतिशत व्यापारिक वस्तुओं पर तत्काल या चरणबद्ध तरीके से शुल्क में कटौती या समाप्ति होगी। इससे भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजार में अभूतपूर्व पहुंच मिलेगी। समुद्री उत्पाद, चमड़ा, रसायन, रबर, धातु, रत्न-आभूषण, वस्त्र, औषधि और कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों के लिए यह समझौता गेम-चेंजर साबित हो सकता है। शून्य या न्यूनतम शुल्क का अर्थ है कि भारतीय उत्पाद यूरोप में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर पहुंच सकेंगे, जिससे निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि और रोजगार सृजन के नए अवसर पैदा होंगे। भारत के लिए इस समझौते का एक बड़ा रणनीतिक लाभ यह है कि वह चीन के विकल्प के रूप में उभरता हुआ मैनुफैक्चरिंग हब बन सकता है। यूरोपीय कंपनियां अब ‘चीन+वन1’ रणनीति के तहत अपने उत्पादन और निवेश को विविधीकृत करना चाहती हैं। भारत की विशाल श्रमशक्ति, बढ़ता उपभोक्ता बाजार, सुधारोन्मुख नीतियां और राजनीतिक स्थिरता उसे इस भूमिका के लिए स्वाभाविक विकल्प बनाती हैं। एफटीए इस संभावनाओं को संस्थागत रूप देता है और निवेशकों के लिए स्पष्ट, अनुमानित और भरोसेमंद नियमों का ढांचा तैयार करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस समझौते को भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बताया जाना यूं ही नहीं है। यह करार केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा, सतत विकास, श्रम मानकों और विवाद निपटान जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी समाहित करता है। इससे भारत-ईयू संबंध एक व्यापक आर्थिक साझेदारी में तब्दील होते हैं, जहां सहयोग का दायरा व्यापार से आगे बढक़र रणनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर तक पहुंचता है। भारत-ईयू का संयुक्त बाजार 24 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का है, जो करीब 2 अरब लोगों को कवर करता है। 2024-25 में द्विपक्षीय वस्तु व्यापार लगभग 136.5 अरब डॉलर और सेवा व्यापार 83 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। फिर भी, दोनों अर्थव्यवस्थाओं के आकार की तुलना में यह आंकड़ा संभावनाओं का केवल एक अंश है। एफटीए इसी ‘गैप’ को स्थिर नियमों, निश्चित बाजार पहुंच और दीर्घकालिक साझेदारी के साथ भरने का साधन बनता है। खास बात यह है कि कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, चाय, कॉफी, मसाले, खेल सामान, खिलौने, रत्न-आभूषण और चुनिंदा समुद्री उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर शून्य शुल्क लागू होगा। इन क्षेत्रों पर पहले 4 प्रतिशत से 26 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता था। शुल्क समाप्ति से न केवल निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि एमएसएमई आधारित औद्योगिक क्लस्टरों में निवेश और रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। एफटीए का एक अहम आयाम कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र है। चाय, कॉफी, मसाले, टेबल अंगूर, खीरा, सूखा प्याज, ताजा फल-सब्जियां और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को वरीयता प्राप्त बाजार पहुंच मिलेगी। इससे किसानों की आय में सुधार, ग्रामीण आजीविका का सशक्तिकरण और भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग को बल मिलेगा। साथ ही, भारत ने डेयरी, अनाज, पोल्ट्री, सोयामील और कुछ संवेदनशील फसलों के लिए रणनीतिक सुरक्षा सुनिश्चित की है, ताकि घरेलू प्राथमिकताओं और खाद्य सुरक्षा पर कोई आंच न आए। इंजीनियरिंग सामानों पर अभी यूरोप में 22 प्रतिशत तक शुल्क लगता है। एफटीए से यह बाधा हटेगी, जिससे भारत का निर्यात बढ़ेगा और यूरोपीय आयात में भारत की हिस्सेदारी मजबूत होगी। यह ‘मेक इन इंडिया’ को गति देगा खासतौर पर मशीनरी, ऑटो कंपोनेंट्स और एयरोस्पेस जैसे उच्च मूल्य क्षेत्रों में। उच्च तकनीक यूरोपीय इनपुट्स के सस्ते आयात से भारतीय उद्योगों की लागत घटेगी, उत्पादकता बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की भागीदारी गहरी होगी। सेवाएं भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। एफटीए के तहत आईटी/आईटीईएस, प्रोफेशनल सेवाएं, शिक्षा और अन्य व्यापार सेवाओं सहित 144 उपक्षेत्रों में व्यापक प्रतिबद्धताएं मिली हैं। इससे भारतीय सेवा प्रदाताओं को यूरोप में स्थिर, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण माहौल मिलेगा। डिजिटल सेवाओं पर जोर और नियामकीय निश्चितता, भविष्य की अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़त को और मजबूत करेगी। राज्यवार दृष्टि से देखें तो इस समझौते के लाभ व्यापक और संतुलित हैं। महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों को मैन्युफैञ्चचरिंग और निर्यात में तेजी मिलेगी, वहीं पश्चिम बंगाल, असम और केरल को कृषि, समुद्री उत्पाद और श्रम-आधारित उद्योगों में नए अवसर प्राप्त होंगे। उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में वस्त्र, चमड़ा और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्रों को नई ऊर्जा मिलेगी। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय उद्योगों और एमएसएमई सेक्टर को भी वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जुडऩे का अवसर मिलेगा। अगर देखा जाए तो भारत-ईयू एफटीए केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि साझा मूल्यों, आपसी भरोसे और भविष्य की साझेदारी का घोषणापत्र है। इसके सफल क्रियान्वयन से भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और मजबूत स्थान मिलेगा, जबकि ईयू को एक विश्वसनीय, उभरते साझेदार का लाभ। हालांकि, असली परीक्षा नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन, घरेलू उद्योगों की तैयारी और समावेशी लाभ सुनिश्चित करने की होगी। यदि इस समझौते को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह निस्संदेह भारत-यूरोप संबंधों में एक नए युग की शुरुआत करेगाए एक ऐसा युग, जहां साझा समृद्धि, रणनीतिक भरोसा और नियम-आधारित सहयोग वैश्विक भविष्य की दिशा तय करेंगे।

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