राजस्थान के झुंझुनू और भिवाड़ी स्थित खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्टरी में तेज धमाके के बाद भीषण अग्निकांड की घटना ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया है। केमिकल फैक्ट्री की आड़ में चल रही अवैध पटाखा इकाइयों में विस्फोट ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी है। सात मजदूर जिंदा जल गए है, कई गंभीर रूप से झुलस गए है। विस्फोट और अग्निकांड की घटना इतना भयावह था कि औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों में दहशत फैल गई। यह कोई पहली घटना नहीं है, न ही दुर्भाग्य से आखिरी लगती है। लगभग हर महीने देश के किसी न किसी हिस्से से अवैध पटाखा फैक्ट्री में धमाके की खबर आती है। हृदयविदारक इस फैक्ट्री दुर्घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक अवैध और असुरक्षित फैक्ट्रियों के कारण निर्दोष मजदूरों की जान जाती रहेगी? आखिर कब लगेगा इस जानलेवा अवैध कारोबार पर अंकुश? देखा जाए तो यह घटना सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, लालच और नियमों की अनदेखी का भयावह परिणाम है। शुरुआती जांच में सामने आया कि जिस फैक्ट्री में यह विस्फोट हुआ, वहां केमिकल उत्पादन की आड़ में अवैध रूप से पटाखों का निर्माण किया जा रहा था। बिना वैध लाइसेंस, बिना सुरक्षा मानकों और बिना उचित निगरानी के भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री जमा की गई थी। ऐसे में यह विस्फोट होना केवल समय की बात थी। सवाल यह है कि यदि स्थानीय प्रशासन को फैक्ट्री के पास पटाखा निर्माण का लाइसेंस न होने की जानकारी थी, तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई? देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर इसी प्रकार की घटनाएं सामने आती रही हैं। तमिलनाडु के शिवकाशी से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार के छोटे कस्बों तक, अवैध पटाखा और केमिकल फैक्ट्रियों में विस्फोट की खबरें आम हो चुकी हैं। हर बार कुछ मजदूरों की जान जाती है, मुआवजे की घोषणा होती है, जांच कमेटी बैठती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले अधिकांश मजदूर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्हें रोजी-रोटी की तलाश में किसी भी जोखिम भरे काम को स्वीकार करना पड़ता है। न तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं, न ही किसी प्रकार का बीमा या सामाजिक सुरक्षा। मालिक अधिक मुनाफा कमाने के लिए सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर देते हैं, और प्रशासन अक्सर आंखें मूंद लेता है। झुंझुनू की इस घटना में भी मजदूरों को जिंदा जलकर मरना पड़ा। विस्फोट की तीव्रता इतनी थी कि शवों के अंग दूर-दूर तक बिखर गए। बचाव कर्मियों को पॉलीथीन की थैलियों में शरीर के टुकड़े इकठ्ठा करने पड़े। यह दृश्य न केवल हृदयविदारक है, बल्कि हमारे प्रशासनिक तंत्र की विफलता का जीवंत प्रमाण भी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने पहले भी फैक्ट्री में संदिग्ध गतिविधियों की शिकायत की थी। यदि यह सच है, तो सवाल उठता है कि शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहे? क्या किसी स्तर पर मिलीभगत थी? भारत में फैक्ट्री लाइसेंसिंग और सुरक्षा निरीक्षण की प्रक्रिया अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। कई बार अधिकारी बिना वास्तविक निरीक्षण के कागजी रिपोर्ट तैयार कर देते हैं। परिणामस्वरूप, अवैध गतिविधियां वर्षों तक चलती रहती हैं और हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद खुलती है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसी फैक्ट्रियां अक्सर रिहायशी इलाकों के पास संचालित होती हैं। शहरी नियोजन और औद्योगिक क्षेत्रों के निर्धारण में स्पष्ट नियम हैं, लेकिन उनका पालन कितनी गंभीरता से किया जाता है? अवैध पटाखा फैक्ट्रियां अक्सर घनी आबादी के पास चलती हैं। एक धमाका सिर्फ मजदूरों को नहीं, बल्कि आसपास के घरों, दुकानों और स्कूलों को भी खतरे में डाल देता है। झुंझुनू और भिवाड़ी की घटनाओं में धमाके की आवाज दूर-दूर तक सुनाई दी, खिड़कियां चटक गईं, लोग दहशत में घरों से बाहर भागे। सोचिए, अगर विस्फोट और बड़ा होता तो क्या होता? स्थानीय निकायों और जिला प्रशासन की जिक्वमेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि खतरनाक उद्योग आबादी से दूर स्थापित हों। परंतु अक्सर राजस्व और राजनीतिक दबाव के चलते नियमों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। मुक्चयमंत्री द्वारा मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा निश्चित रूप से राहत का कदम है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। कुछ लाख रुपये किसी परिवार के मुखिया की भरपाई नहीं कर सकते। जरूरत है ऐसी सख्त व्यवस्था की, जिससे भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं दोहराई न जाएं। मुआवजे की घोषणा के साथ-साथ दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई जरूरी है। फैक्ट्री मालिकों के साथ-साथ उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से अवैध गतिविधियां फलती-फूलती रहीं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरत है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अवैध पटाखा इकाइयों की पहचान और बंद करने के लिए विशेष अभियान चलाए। औद्योगिक क्षेत्रों की सूची बनाकर नियमित और आकस्मिक निरीक्षण किए जाएं। बंद पड़ी फैक्ट्रियों की विशेष निगरानी हो, ताकि उन्हें अवैध गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न किया जा सके। सभी केमिकल और विस्फोटक सामग्री से जुड़ी इकाइयों का समय-समय पर वास्तविक निरीक्षण अनिवार्य किया जाए। निरीक्षण प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि किसी प्रकार की हेराफेरी न हो सके। स्थानीय निवासियों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और एक सशक्त और गोपनीय शिकायत प्रणाली विकसित की जाए, जिससे लोग बिना डर के अवैध गतिविधियों की जानकारी दे सकें। फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और बीमा अनिवार्य किया जाए और नियमों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान सक्चती से लागू हो। जिन इलाकों में अवैध या खतरनाक फैक्ट्रियां संचालित हो रही हैं, उन्हें तत्काल बंद कर औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाए। इसके साथ ही प्रवासी मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार और कौशल विकास कार्यक्रम जरूरी हैं। जब तक गरीबी और बेरोजगारी है, तब तक जोखिम भरे काम के लिए तैयार मजदूर मिलते रहेंगे। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना होगा। हर बड़े हादसे के बाद केवल जांच समिति बनाना पर्याप्त नहीं। जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो। झुंझुनू की यह घटना एक चेतावनी है। यदि अब भी प्रशासन, सरकार और समाज ने सबक नहीं लिया, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी होती रहेंगी। अवैध फैक्ट्रियों पर अंकुश लगाने के लिए केवल कागजी नियम पर्याप्त नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। हर मजदूर की जान की कीमत है। विकास और उद्योग जरूरी हैं, लेकिन मानव जीवन से बढक़र कुछ भी नहीं। यदि सुरक्षा मानकों और कानूनों का पालन नहीं किया जाएगा, तो ऐसे ‘मौत के कारखाने’ यूं ही लोगों की जिंदगी निगलते रहेंगे। अब समय आ गया है कि हम केवल शोक व्यक्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस और स्थायी समाधान की दिशा में निर्णायक कदम उठाएं। तभी इस प्रश्न का उत्तर मिल सकेगा कि कब लगेगा अवैध फैक्ट्रियों पर अंकुश?



