एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय सराहनीय और स्वागतयोग्य कदम है। इसका कारण है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका प्रभाव केवल अदालतों की दीवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को ‘भ्रष्टाचार’ जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो स्वाभाविक है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। दरअसल एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी उल्लेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं। नयी पुस्तक के ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’ खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष तब आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस विषय पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। उनका कहना था कि कानूनी बिरादरी के सदस्य इस विषय को लेकर गहरे आहत हैं, क्योंकि वे स्वयं इस संस्था का हिस्सा हैं और इसकी गरिमा से उनका भावनात्मक व पेशेवर संबंध है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी इस चिंता को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से इस विवाद की जानकारी थी और कई उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों ने भी उन्हें पत्र लिखकर अपनी चिंता व्यक्त की थी। सीजेआई की यह टिप्पणी कि मैं धरती पर किसी को भी इस संस्था की गरिमा को धूमिल करने और इसे बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा, न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि न्यायपालिका अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के प्रति सजग है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि उल्लेख हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए? लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते वह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। यदि किसी पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका की भूमिका, उसकी शक्तियों, उसकी उपलब्धियों के साथ-साथ चुनौतियों का भी उल्लेख हो, तो वह संतुलित शिक्षा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि सामग्री इस प्रकार प्रस्तुत की जाए कि बच्चों के मन में यह धारणा बैठ जाए कि पूरी संस्था भ्रष्ट है या अविश्वसनीय है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। कक्षा 8 के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं। उनकी समझ विकसित हो रही होती है, लेकिन वे अभी जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं। ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है। देखा जाए तो न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा आवश्यक है, क्योंकि यही संस्था नागरिकों के मौलिक अधिकारों की अंतिम संरक्षक है। यदि जनता का विश्वास डगमगाता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। भारतीय लोकतंत्र की संरचना तीन प्रमुख स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर टिकी है। इनमें न्यायपालिका को प्राय: सबसे विश्वसनीय और निष्पक्ष संस्था माना जाता है। न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है। आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई और सरकार की प्रतिक्रिया इस बहस को नई दिशा देगी। हालांकि अच्छी बात है कि इस मामले में केंद्र ने तत्काल कदम उठाया है। सरकार के तरफ से कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन अध्याय जोड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए था। यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे को पाठ्यपुस्तक में शामिल करना ही था, तो इसे कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों अंगों से संबंधित होना चाहिए था। केंद्र के रुख के बाद उक्वमीद है कि यह विवाद जल्द खत्म हो जाएगा, लेकिन भविष्य में ध्यान रखना होगा कि न्यायपालिका की गरिमा भी सुरक्षित रहे, क्योंकि यह लोगों के विश्वास से जुड़ा है और इसको हमेशा कायम रखना होगा।


