Saturday, February 21, 2026
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केरल में गाली और दिल्ली में गलबहियां

– बाल मुकुन्द ओझा
केरल विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। कम्युनिष्टों ने इसी राज्य से अपनी पार्टी की नीवं खड़ी की थी। केरल से शुरू हुई यात्रा बंगाल और त्रिपुरा तक फेल गई। कभी देश के एक दर्ज़न से अधिक राज्यों में कम्युनिष्टों की तूती बोलती थे। यहाँ तक कि केंद्र की सरकार में भी उनकी सशक्त भागीदारी रही है। आज बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिष्ट लगभग समाप्त हो गए है। हिंदी पट्टी में भी उनकी सियासी ताकत ख़त्म सी हो गई है। अब ले देकर केरल बचा है जहाँ उनका दबदबा है। केरल में शीघ्र चुनाव होने वाले है। केंद्र में कम्युनिष्ट इंडिया गठबंधन में शामिल है मगर केरल में उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस है। यहाँ गठबंधन चकनाचूर हो गया है। अब यदि केरल से भी कम्युनिष्ट विदा हो गए तो देश में उनका नाम लेवा भी नहीं रहेगा।
कम्युनिष्टों की राजनीति तीन लोक से न्यारी है। भाजपा के विरोध के चलते कम्युनिष्ट इंडिया गठबंधन में शामिल है मगर केरल और बंगाल में एक दूसरे को पछाड़ने को आतुर है। एके गोपालन, नंबूद्रीपाद, ज्योति बसु और हर किशन सिंह सुरजीत सरीखे सर्वमान्य नेता अब पार्टी में नहीं रहे है। ऐसा लगता है मौजूदा नेतृत्व दिग्भ्रमित है। अच्छा होता वामपंथी तीसरा मोर्चा बना कर चुनाव लड़ते तो उनकी इज्जत बच सकती थी। वामपंथी इस समय केरल की सत्ता पर काबिज है। मगर इस राज्य में उनका मुख्य मुकाबला इंडिया गठबंधन की मुख्य पार्टी कांग्रेस से ही है।
कभी तीन राज्यों में सरकार, संसद में 64 का आंकड़ा पार करने वाली और देश को गृह मंत्री तथा लोकसभा स्पीकर देने वाली कम्युनिष्ट पार्टिया आज एक अदद सीट के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है। कहने को वामपंथी पार्टियां इंडिया गठबंधन में शामिल है। मगर बंगाल और केरल में वामपंथियों को अपने ही साथी घटक दलों से टकराना पड़ रहा है। यह रोचक नज़ारा विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। बंगाल में 1977 से 2011 तक कुल 34 वर्षों तक कम्युनिष्टों का एकछत्र राज रहा है। 34 साल के लम्बे शासन को तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने उखाड फेंका। आज यह स्थिति है कि बंगाल की विधानसभा और देश की लोकसभा में यहाँ से एक भी सदस्य नहीं है। त्रिपुरा में 1978–1988 और 1993 to 2018 तक कम्युनिष्टों का आधिपत्य रहा है। इतनी लम्बी अवधि तक त्रिपुरा में राज करने वाली वामपंथी पार्टियों का यहां एक भी लोकसभा सदस्य नहीं है। यही स्थिति केरल की है। लोकसभा की 20 सीटों वाले केरल में वर्तमान में कम्युनिष्टों का राज है। मगर लोकसभा की एक सीट ही इनके पास है। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद केरल में कांग्रेस और कम्युनिष्ट आपस में ही एक दूसरे को चुनौती दे रहे है। इन राज्यों में वामपंथी पार्टियां इंडिया गठबंधन में होकर भी अलग थलग पड़ी है। अब यह लगभग तय है कि बंगाल और केरल में इंडिया ब्लाक की पार्टियां आपस में टकराएगी। यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि कम्युनिष्ट पार्टियां इस समय दो राह पर खड़ी है। बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिष्ट पार्टियां अपने सबसे बुरे दौर में है जहां उनके पास लोकसभा की एक भी सीट नहीं है। वहीं केरल में सत्तारूढ़ होने के बावजूद उनके पास मात्र एक लोकसभा की सीट है। पार्टियां कहने को कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में शामिल है। मगर जिन राज्यों में उनका थोड़ा बहुत जनाधार बचा है, वहां उनका सीधा चुनावी संघर्ष कांग्रेस या गठबंधन के अन्य घटक दलों से है। हम सबसे पहले बात कर रहे है बंगाल की जहां 1977 से 2011 तक निर्बाध रूप से बंगाल पर राज करने वाली कम्युनिष्ट पार्टियां आज खाली हाथ है। कम्युनिष्ट पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन के साथ है। बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने उनके हाथ से सत्ता छीन कर उन्हें सड़क पर ला दिया। इस राज्य में माकपा ने भाजपा के साथ तृणमूल कांग्रेस को अपना सामान रूप से शत्रु घोषित कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। दूसरा राज्य केरल है जहां वर्तमान में सीपीएम की अगुवाई में वामपंथी पार्टियां सत्तारूढ़ है। मगर पिछले लोकसभा चुनाव में माकपा को सिर्फ एक सीट मिली थी। यहाँ वामपंथियों का सीधा मुकाबला कांग्रेस गठबंधन से है। केरल विधानसभा चुनाव में उनकी अग्नि परीक्षा होंगी। देखना है केरल में उनकी वापसी होंगी या बंगाल की तरह खाली हाथ होंगे।
– बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 941444121

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