-डॉ. शैलेश शुक्ला
पिछले कुछ वर्षों में तकनीक ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल भी। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैंकिंग और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया है। लेकिन इसी प्रगति के साथ एक गंभीर चुनौती भी उभरी है—डिजिटल ठगी और डीपफेक का बढ़ता खतरा। यह विषय केवल तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति से जुड़ा है जो मोबाइल फोन का उपयोग करता है, इंटरनेट पर मौजूद है और डिजिटल दुनिया में भरोसे के साथ आगे बढ़ रहा है।
कुछ समय पहले तक ठगी का अर्थ था किसी अनजान व्यक्ति का फोन आना या संदिग्ध ईमेल मिलना। आज ठगी का स्वरूप कहीं अधिक परिष्कृत और खतरनाक हो चुका है। अब आवाज़ आपकी जान-पहचान वाले की हो सकती है, वीडियो किसी भरोसेमंद चेहरे का हो सकता है और संदेश पूरी तरह विश्वसनीय लग सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ डीपफेक और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकें आम नागरिक के लिए जोखिम बनती जा रही हैं। डीपफेक तकनीक के ज़रिये किसी व्यक्ति की आवाज़, चेहरा और हाव-भाव को इस तरह से बदला या दोहराया जा सकता है कि असली और नकली में अंतर कर पाना कठिन हो जाए। शुरुआत में इस तकनीक का उपयोग मनोरंजन और रचनात्मक उद्देश्यों के लिए किया गया, लेकिन धीरे-धीरे इसका दुरुपयोग बढ़ने लगा। आज डीपफेक का इस्तेमाल फर्जी वीडियो, झूठे बयान, आर्थिक ठगी और यहां तक कि चरित्र हनन के लिए भी किया जा रहा है।
भारत जैसे देश में, जहाँ डिजिटल लेन-देन तेजी से बढ़ा है, यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। यूपीआई, ऑनलाइन बैंकिंग और मोबाइल वॉलेट ने लेन-देन को सरल बनाया, लेकिन इसके साथ साइबर अपराधियों को नए अवसर भी मिले। प्रामाणिक आंकड़ों के अनुसार, देश में साइबर अपराध के मामलों में पिछले कुछ वर्षों में लगातार वृद्धि देखी गई है। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है, जहाँ लोगों को परिचित की आवाज़ या पहचान का उपयोग करके ठगा गया। एक आम परिदृश्य समझने की कोशिश करें। किसी व्यक्ति को अचानक अपने बच्चे, रिश्तेदार या वरिष्ठ अधिकारी की आवाज़ में कॉल आता है। आवाज़ घबराई हुई है, स्थिति आपात बताई जाती है और तुरंत पैसे भेजने का अनुरोध किया जाता है। डर और भावनात्मक दबाव में व्यक्ति बिना पुष्टि किए लेन-देन कर देता है। बाद में पता चलता है कि आवाज़ डीपफेक तकनीक से तैयार की गई थी। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि मानसिक आघात भी देता है।
महिलाओं के लिए यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग कर महिलाओं की तस्वीरों और वीडियो को आपत्तिजनक रूप में बदलकर सोशल मीडिया पर फैलाने के मामले सामने आए हैं। इससे न केवल उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार पीड़ित महिलाएँ शर्म, डर और सामाजिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं। बच्चे और किशोर भी इस डिजिटल खतरे से अछूते नहीं हैं। ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर उनकी सक्रियता उन्हें साइबर अपराधियों के लिए आसान लक्ष्य बना देती है। नकली प्रोफ़ाइल, झूठे वीडियो और भावनात्मक ब्लैकमेल के ज़रिये बच्चों को फंसाया जाता है। यह स्थिति माता-पिता और शिक्षकों के लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि बच्चे अक्सर तकनीक को जल्दी सीख लेते हैं, लेकिन उसके जोखिमों को समझने में पीछे रह जाते हैं।
सरकार और संबंधित संस्थाएँ इस चुनौती को गंभीरता से ले रही हैं। साइबर अपराध से निपटने के लिए विशेष हेल्पलाइन, साइबर सेल और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। डिजिटल साक्षरता पर ज़ोर दिया जा रहा है, ताकि आम नागरिक तकनीक का सुरक्षित उपयोग कर सके। लेकिन केवल कानून और व्यवस्था से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए समाज के हर स्तर पर जागरूकता और सतर्कता आवश्यक है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है—जानकारी। यदि कोई कॉल, संदेश या वीडियो अत्यधिक आपात, डर या लालच पैदा कर रहा है, तो उसे तुरंत सत्यापित करना चाहिए। किसी भी वित्तीय लेन-देन से पहले संबंधित व्यक्ति से वैकल्पिक माध्यम से संपर्क करना ज़रूरी है। बैंक या सरकारी संस्था कभी भी फोन पर गोपनीय जानकारी नहीं मांगती—यह बात हर नागरिक को समझनी चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है—डिजिटल व्यवहार। सोशल मीडिया पर अत्यधिक व्यक्तिगत जानकारी साझा करना हमें जोखिम में डाल सकता है। हमारी आवाज़, वीडियो और तस्वीरें जितनी अधिक सार्वजनिक होंगी, डीपफेक के लिए सामग्री उतनी ही आसानी से उपलब्ध होगी। इसलिए गोपनीयता सेटिंग्स का सही उपयोग और सोच-समझकर पोस्ट करना आज की आवश्यकता है। मीडिया की भूमिका यहाँ भी बेहद अहम हो जाती है। यदि मीडिया डीपफेक और साइबर ठगी के मामलों को केवल सनसनीखेज खबर की तरह पेश करेगा, तो डर बढ़ेगा, समाधान नहीं। ज़रूरत है तथ्यपरक, जिम्मेदार और शिक्षाप्रद रिपोर्टिंग की, जिससे लोग डरें नहीं, बल्कि सजग हों। शिक्षा प्रणाली में भी डिजिटल सुरक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। बच्चों को केवल तकनीक का उपयोग नहीं, बल्कि उसके नैतिक और सुरक्षित पहलुओं की भी जानकारी दी जानी चाहिए। अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि डिजिटल दुनिया में बच्चों पर नज़र रखना नियंत्रण नहीं, बल्कि संरक्षण है।
यह भी सच है कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है। समस्या उसके दुरुपयोग की है। वही आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जो डीपफेक बना सकती है, उसी से डीपफेक की पहचान करने वाले उपकरण भी विकसित किए जा रहे हैं। तकनीक का समाधान भी तकनीक ही है, बशर्ते उसका उपयोग सही दिशा में किया जाए। आम नागरिक के लिए सबसे बड़ा हथियार है—सतर्कता और विवेक। जल्दबाज़ी में लिया गया एक निर्णय जीवन भर की कमाई और मानसिक शांति छीन सकता है। इसलिए हर संदेश, हर कॉल और हर वीडियो पर आँख मूंदकर भरोसा करने के बजाय सवाल पूछना ज़रूरी है। आज जब दुनिया डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है, तब भरोसे की परिभाषा भी बदल रही है। अब भरोसा केवल पहचान पर नहीं, बल्कि सत्यापन पर आधारित होना चाहिए। यह बदलाव कठिन है, लेकिन आवश्यक है।
इस लेख का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि सचेत करना है। तकनीक से भागना समाधान नहीं है, बल्कि उसे समझदारी से अपनाना ही रास्ता है। यदि समाज, मीडिया, सरकार और नागरिक मिलकर जिम्मेदारी निभाएँ, तो डिजिटल ठगी और डीपफेक जैसी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। अंततः प्रश्न यही है—क्या हम तकनीक के उपभोक्ता भर रहेंगे या उसके जिम्मेदार उपयोगकर्ता बनेंगे? इस प्रश्न का उत्तर ही हमारे डिजिटल भविष्य की दिशा तय करेगा।
वैश्विक समूह संपादक
सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
ईमेल पता : PoetShailesh@gmail.com
मो. : 9312053330, 8759411563


