भारत और फ्रांस के रिश्ते दशकों पुराने हैं और दोनों ही देशों के बीच हमेशा से ही काफी मधुर संबंध रहे हैं, लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे ने इस साझेदारी को एक नए शिखर पर पहुंचा दिया है। मुंबई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मैक्रों की मौजूदगी में आयोजित भारत-फ्रांस शिखर सक्वमेलन ने द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक व्यापक और गहरे आयाम तक पहुंचाने का संकेत दिया है। रक्षा, अंतरिक्ष, शिक्षा, नवाचार, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल टेक्नोलॉजी कौशल विकास, प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में 21 से अधिक समझौतों की घोषणा केवल कागजी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत और फ्रांस की साझा रणनीतिक सोच का प्रमाण है। इन समझौतों ने दोनों देशों की साझेदारी को ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के स्तर तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया है। वर्तमान समय में जब दुनिया अनिश्चितताओं से भरी है और भू-राजनैतिक तनाव, सप्लाई चेन का संकट, ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती और तकनीकी प्रतिस्पर्धाएं देखने को मिल रही है, ऐसे समय में भारत-फ्रांस की यह नई साझेदारी वैश्विक स्थिरता के लिए एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर सकती है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि ‘दोस्ती की कोई सीमा नहीं’ केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टि का संकेत है कि गहरे समुद्र से लेकर ऊंचे पहाड़ों तक, यानी रक्षा से लेकर जलवायु और तकनीक तक सहयोग का विस्तार दोनों देश बढ़ाने जा रहे हैं। भारत और फ्रांस ने अपने रिश्तों को ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ का दर्जा दिया है। यह शब्दावली महत्वपूर्ण है। ‘स्पेशल’ भरोसे को दर्शाता है, ‘ग्लोबल’ वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण को, और ‘स्ट्रेटेजिक’ दीर्घकालिक हितों की साझेदारी को। 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा, तक दोनों देश शांति, प्रगति और स्थिरता के लिए मिलकर काम करेंगे। वार्षिक विदेश मंत्रियों का संवाद इस बात की गारंटी है कि यह साझेदारी केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी प्रगति का निरंतर मूल्यांकन होता रहे। रक्षा क्षेत्र में हुए समझौते इस साझेदारी के सबसे ठोस आयाम हैं। कर्नाटक के वेमागल में टाटा एडवांस्ड सिस्टक्वस और एयरबस की साझेदारी में एच-125 हेलीकॉप्टर की फाइनल असेंबली लाइन का उद्घाटन भारत के एयरोस्पेस इतिहास में एक मील का पत्थर है। पहली बार कोई निजी भारतीय कंपनी हेलीकॉप्टर की पूरी असेंबली लाइन संभालेगी। यह केवल तकनीकी हस्तांतरण नहीं, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को नई मजबूती देने वाला कदम है। इससे भारतीय एमएसएमई को सप्लाई चेन में अवसर मिलेंगे, कौशल विकास को गति मिलेगी और युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। थल सेनाओं के बीच अधिकारियों की ‘रेसिप्रोकल डिप्लॉयमेंट’ का निर्णय सैन्य सहयोग को नए स्तर पर ले जाएगा। इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच इंटर-ऑपरेबिलिटी बढ़ेगी, संयुक्त अभ्यासों की गुणवत्ता सुधरेगी और रणनीतिक समझ गहरी होगी। इंडो-पैसिफिक में समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी यह साझेदारी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में सहयोग भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किया गया है। सोलर, विंड, ग्रीन हाइड्रोजन और बायोमास पर संयुक्त रिसर्च भारत के ऊर्जा संक्रमण को गति दे सकती है। फ्रांस की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विशाल बाजार क्षमता मिलकर क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में बड़े अवसर पैदा कर सकती है। तकनीकी विशेषज्ञों के आदान-प्रदान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से भारतीय युवाओं को वैश्विक मानकों का अनुभव मिलेगा। यह सहयोग जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत की प्रतिबद्धता को भी मजबूत करेगा। स्टार्टअप और इनोवेशन सेक्टर में ‘ईयर ऑफ इनोवेशन’ की शुरुआत एक दूरगामी कदम है। हैदराबाद स्थित टी-हब और नॉर्ड फ्रांस के बीच समझौता भारतीय स्टार्टअप्स को यूरोपीय इनोवेशन इकोसिस्टम तक सीधी पहुंच देगा। इससे भारतीय उद्यमियों को नए निवेश, रिसर्च नेटवर्क और वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिलेगी। ‘डबल टैक्स अवॉयडेंस एग्रीमेंट’ में संशोधन निवेशकों के भरोसे को मजबूत करेगा और पूंजी प्रवाह को आसान बनाएगा। यह संदेश भी जाएगा कि भारत निवेश के लिए स्थिर और भरोसेमंद गंतव्य है। भेल और सफ्रोन के बीच हैमर मिसाइल के संयुक्त उत्पादन का निर्णय भी महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि साझेदार और सह-निर्माता बनना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा घोषित ‘इंडिया-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन’ साझेदारी को जनता से जोडऩे का प्रयास है। नवाचार तभी फलता-फूलता है जब शोध, उद्योग और युवा प्रतिभा एक साथ काम करें। डीएसटी और सीएनआरएस के बीच वैज्ञानिक सहयोग, एडवांस्ड मटेरियल्स सेंटर की स्थापना और डिजिटल साइंस व टेक्नोलॉजी इंडो-फ्रेंच सेंटर की घोषणा इस दिशा में ठोस कदम हैं। एम्स दिल्ली में हेल्थ एआई इंडो-फ्रेंच सेंटर की शुरुआत स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा देगी। संक्रामक रोगों और मेटाबोलिक हेल्थ साइंस पर संयुक्त अनुसंधान वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में योगदान देगा। कोविड-19 के बाद दुनिया समझ चुकी है कि स्वास्थ्य सहयोग केवल घरेलू मामला नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भारत और फ्रांस की साझेदारी अहम भूमिका निभा सकती है। सोलर, विंड, हाइड्रोजन और बायोमास जैसे क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान और तकनीकी सहयोग ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी सुनिश्चित करेगा। नवीकरणीय ऊर्जा पर मऊ का नवीनीकरण यह संकेत देता है कि दोनों देश ऊर्जा परिवर्तन को दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं। फ्रांस की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत का विशाल बाजार, यह संयोजन हरित विकास के लिए आदर्श है। टी-हब और नार्द फ्रांस के बीच समझौता भारतीय स्टार्टअप्स को यूरोप के इनोवेशन इकोसिस्टम तक पहुंच देगा। इससे न केवल निवेश के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि भारतीय उद्यमियों को वैश्विक नेटवर्किंग का भी लाभ मिलेगा। डबल टैक्स अवॉयडेंस एग्रीमेंट में संशोधन निवेशकों के भरोसे को मजबूत करेगा। यह कदम विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाने में सहायक होगा और व्यापारिक माहौल को अधिक पारदर्शी बनाएगा। एरोनॉटिक्स स्किलिंग के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना युवाओं को अत्याधुनिक कौशल प्रदान करेगी। यह भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ाएगा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत और फ्रांस की साझेदारी महत्वपूर्ण है। फ्रांस यूरोप का एक प्रमुख रक्षा और परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जबकि भारत उभरती वैश्विक शक्ति। दोनों का साझा दृष्टिकोण-स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग से वैश्विक नीतियों को आकार देने में दोनों देशों की भूमिका और मजबूत होगी। ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि बहुपक्षीय प्रभाव वाली साझेदारी है। यह स्पष्ट है कि यह रिश्ता अब पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़ चुका है। कुल मिलाकर, ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ भारत के लिए बहुआयामी अवसर लेकर आई है कि वह रक्षा आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार, शिक्षा विस्तार और वैश्विक मंचों तेजी से अग्रसर हो सके। यह साझेदारी बताती है कि 21वीं सदी में वैश्विक शक्ति संतुलन केवल सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि तकनीक, ऊर्जा, युवा क्षमता और रणनीतिक दूरदृष्टि से तय होगा। यदि ‘रोडमैप होराइजन 2047’ को ईमानदारी और दक्षता के साथ लागू किया गया, तो भारत-फ्रांस संबंध आने वाले दशकों में स्थिरता, समृद्धि और साझा प्रगति के स्तंभ बन सकते हैं।

