Wednesday, February 18, 2026
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नफरती भाषणों पर ‘सुप्रीम’ नसीहत

भारत जैसे बहुलतावादी और विविधताओं से भरे देश में सामाजिक सद्भाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है, किंतु पिछले कुछ वर्षों में नफरत फैलाने वाले भाषणों जिसे प्रचलित भाषा में ‘हेट स्पीच’ कहा जाता है की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर धार्मिक आयोजनों और सोशल मीडिया मंचों तक, कटु और विभाजनकारी भाषा का प्रयोग सामान्य होता जा रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल समाज में अविश्वास और विद्वेष को बढ़ाती है, बल्कि संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की मूल भावना को भी आहत करती है। समय-समय पर सुप्रिम कोर्ट देश के राजनीतिक पार्टियों, नेताओं और केंद्र व राज्य सरकारों को सर्तक करता आ रहा है कि वे नफरती भाषणों पर अंकुश लगाए, लेकिन दु:खद पहलू यह है कि यह नफरती भाषणों का दौर बढ़ता ही जा रहा है। एक बार फिर से देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रिम कोर्ट ने हेट स्पीच पर सख्त टिप्पणी करते हुए नेताओं राजनीतिक पार्टियों और सरकारों को फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का अभाव चिंताजनक है। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा है कि नेताओं को देश में भाईचारा बढ़ाना होगा। नफरत भरे भाषणों को रोकने के लिए पहले सोच को सुधारने की आवश्यकता है, क्योंकि भाषण से पहले विचार आते हैं। सीजेआई ने कहा है कि सभी राजनीतिक दलों से हमारी अपील है कि आप संवैधानिक नैतिकता, मूल्यों, आपसी सक्वमान और आत्मसम्मान के सिद्धांतों का पालन कीजिए। ये ठीक है कि आप वैचारिक सिद्धांतों के आधार पर चुनाव लड़ते हैं, लेकिन एक -दूसरे का सम्मान करना भी जरूरी है। आप लोगों से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर सकते। सीजेआई की यह टिप्पणी केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक चेतावनी है। भारतीय राजनीति में भाषणों का महत्व सदैव रहा है, किंतु जब भाषण जनभावनाओं को भडक़ाने और समुदायों को बांटने का माध्यम बन जाए, तो वह लोकतंत्र के लिए घातक हो जाता है। वोट बैंक की राजनीति के कारण कई बार नेताओं द्वारा ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो किसी विशेष समुदाय को लक्षित करती है। चुनावी लाभ की आकांक्षा में नफरती शब्दों का इस्तेमाल कर समाज को ध्रुवीकृत करना एक खतरनाक प्रवृत्ति बन चुकी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, नफरत फैलाने वाले अधिकांश भाषण अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाते हैं। कई मामलों में हिंसा के लिए खुला आह्वान भी किया गया है। ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘वोट जिहाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग एक सुनियोजित राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। इससे सामाजिक विभाजन और गहरा होता है तथा आपसी विश्वास कमजोर पड़ता है। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नफरती सामग्री के प्रसार का सबसे तेज माध्यम बन गए हैं। एक भाषण जो पहले किसी सीमित सभा तक सीमित रहता था, अब कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। फेसबुक, यूट्यूब और अन्य मंचों पर भडक़ाऊ वीडियो तेजी से अपलोड और साझा किए जाते हैं। चिंता की बात यह है कि केवल भाषण देने वाले ही नहीं, बल्कि उसे ‘लाइक’ और ‘शेयर’ करने वाले भी अनजाने में नफरत के प्रसार में भागीदार बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान ने अवश्य दिया है, किंतु यह अधिकार पूर्णत: निरंकुश नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राष्ट्र की अखंडता के अधीन है। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग किसी समुदाय के विरुद्ध हिंसा या घृणा फैलाने के लिए किया जाए, तो वह स्वतंत्रता नहीं, दुरुपयोग बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में संज्ञान लेने के लिए तथ्यात्मक आधार आवश्यक है। अदालत ने याचिकाकर्ता से उदाहरण प्रस्तुत करने को कहा और सरकारों से पूछा कि धर्म संसद जैसे आयोजनों में दिए गए भडक़ाऊ भाषणों पर क्या कार्रवाई हुई। यह संकेत है कि न्यायपालिका समस्या को गंभीरता से देख रही है। मगर प्रश्न यह है कि क्या केवल अदालत की फटकार पर्याप्त है? कानून पहले से मौजूद हैं भारतीय दंड संहिता की धाराएं 153ए, 295ए और 505 जैसे प्रावधान सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने पर दंड का प्रावधान करते हैं। बावजूद इसके, यदि समय पर प्राथमिकी दर्ज न हो या जांच निष्पक्ष न हो, तो कानून का अस्तित्व निरर्थक हो जाता है। सरकारों की यह जिक्वमेदारी है कि वे राजनीतिक दबाव या विचारधारात्मक झुकाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष कार्रवाई करें। यदि सत्ता पक्ष के नेता या समर्थक ही नफरती बयान दें और उन पर कार्रवाई न हो, तो यह संदेश जाता है कि कानून सबके लिए समान नहीं है। यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। नफरत भरे भाषणों का प्रभाव केवल तत्कालीन माहौल तक सीमित नहीं रहता। यह धीरे-धीरे सामाजिक संबंधों में जहर घोलता है। मोहल्लों में अविश्वास बढ़ता है, व्यापारिक संबंध प्रभावित होते हैं और युवाओं के मन में पूर्वाग्रह घर कर जाता है। नफरत की राजनीति पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी केवल अदालत या प्रशासन की नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की भी है। दलों के शीर्ष नेतृत्व को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि चुनावी लाभ के लिए विभाजनकारी भाषा स्वीकार्य नहीं है। यदि किसी नेता द्वारा अनुचित बयान दिया जाता है, तो पार्टी स्तर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। दुर्भाग्य से अक्सर देखा गया है कि ऐसे बयानों को या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर राजनीतिक समर्थन मिल जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। लोकतंत्र केवल सरकार और अदालतों से नहीं चलता; इसमें नागरिकों की भी समान भूमिका होती है। हमें यह समझना होगा कि नफरती सामग्री को बढ़ावा देना अंतत: समाज को ही नुकसान पहुंचाता है। सोशल मीडिया पर किसी भी भडक़ाऊ पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सत्यता और प्रभाव पर विचार करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी लोगों से अपेक्षा की है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्य को समझें और जिमेदारीपूर्वक उसका प्रयोग करें। यदि समाज स्वयं सजग हो जाए और नफरत की भाषा को अस्वीकार कर दे, तो ऐसे भाषण देने वालों की राजनीतिक जमीन स्वत: कमजोर हो जाएगी। भारत की शक्ति उसकी विविधता और सहिष्णुता में निहित है। यदि नफरत की भाषा को राजनीतिक हथियार बना दिया गया, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को आहत करेगा। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए एक नैतिक संदेश है। अब समय आ गया है कि सरकारें, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और नागरिक सभी मिलकर यह सुनिश्चित करें कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज में जहर न घोला जाए। यदि हम आज सजग नहीं हुए, तो आने वाली पीढिय़ों को विभाजित समाज की कीमत चुकानी पड़ सकती है। नफरत की राजनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, परंतु दीर्घकाल में यह राष्ट्र की एकता और लोकतंत्र की स्थिरता को खतरे में डालती है। इसलिए आवश्यक है कि कानून का भय और समाज की सजगता दोनों मिलकर इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं। यही लोकतंत्र की असली जीत होगी।

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