Thursday, February 12, 2026
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नारी जीवन : तेरी यही कहानी

-ई. प्रभात किशोर
सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के हरेक पहलू पर बढ़ती हुई लिंग आधारित समस्याएं लड़कियों पर प्रभाव डालती है। एक सक्रिय, कुशल एवं आत्मविश्वासी स्त्री के रुप में विकसित होने के लिए लड़कियों का लालन-पालन ऐसे वातावरण में होना चाहिए जिसमें उन्हें मान-सम्मान, गरिमा व उचित अवसर प्राप्त हो सके । पर भारतवर्ष में अधिकांश लड़कियों में निर्धनता के कारण उत्पन्न अभाव और तकलीफें, रीति-रिवाजों व मान्यताओं के फलस्वरुप और भी बढ़ जाती है। यही मान्यताएं अक्सर महिलाओं की भुमिका परिभाषित करती हैं और पुरुषों के मुकाबले उन्हें तुच्छ ठहराती हैं ।
समाज में बालिकाओं की स्थिति से महिलाओं की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है । यह सर्वविदित तथ्य है कि हजारों लड़कियॉं अति विषम परिस्थितियों में बड़ी होती हैं । उनके लिए शिक्षा अनावश्यक समझी जाती है, कुपोषण के कारण वे अस्वस्थ रहती हैं और काफी संख्या में अकाल मौत की शिकार होती हैं । उनसे कठिन श्रम कराया जाता है तथा वे कम उम्र में ब्याह दी जाती हैं । ऐसे शारीरिक , मानसिक, एवं यौन स्तर पर वे बड़े ही भेदभावपूर्ण वातावरण में जीवनयापन करती हैं । शिक्षा ही एक ऐसा रामवाण हैं जिसके माध्यम से लड़कियॉं एवं महिलायें सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर सकती है । शिक्षा में ऐसी मध्यस्थ भूमिका निभाने की शक्ति है जिसमें लिंग भेद समाप्त कर लड़कियों व लड़को में सामाजिकता जगायी जा सकती है ।
बचपन का विकास महत्वपूर्ण – बचपन में लिंग भेद के कारण उत्पन्न विकृतियों को दृष्टि में रखते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) ने वर्ष 1990 को ‘‘ बालिका वर्ष ‘‘ तथा 1991-2000 को ‘‘ बालिका दशक ‘‘ घोषित किया था । भारत सरकार ने भी बालिका एवं किशोर युवतियों की वर्तमान स्थिति में सुधार हेतु एक राष्ट्रीय योजना विकसित की है । किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण विकास काल बचपन होता है । जिस गति से शारीरिक, मानसिक, व्यक्तिगत और सामाजिक विकास बचपन में होता है वह जीवन के बाद वर्षों में संभव नहीं है । तीव्र गति से हो रहा विकास एवं बचपन का लचीलापन इस काल को काफी हद तक असुरक्षित भी बना देता है । इस उपेक्षित स्थिति पर पक्षपात और उपेक्षा का भी प्रभाव पड़ सकता है । इसके फलस्वरुप पूरी जिन्दगी वंचन के चक्र में फॅंसी लड़की नीचे ही धॅंसती जाती है और समाज की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बन पाती । दूसरी ओर कोमलता की यही भावना जड़ों से वंचन के नाश का अद्भुत मौका देती है । बालिकाओं की स्वास्थ्य, शैक्षिक, और सामाजिक जरुरतों पर यदि ध्यान रखा जाय तो एक शिक्षित प्रगतिशील नारी की आधारशीला रखी जा सकती है । युनिसेफ ने 1994 में आयोजित ‘इन्टर रिजनल कन्सलटेशन ऑन गर्ल चाइल्ड‘ के दौरान घोषणा की थी कि जीवन-चक्र परिदृश्य महिलाओं के विकास के लिए सबसे अधिक प्रगतिशील नीति है।
भारतवर्ष देश में हरेक साल लगभग 1,20,00,000 लड़कियॉं जन्म लेती हैं । इनमें से 30,00,000 यानी 25 प्रतिशत अपनी पंद्रहवीं वर्षगॉंठ से पूर्व ही काल कलवित हो जाती हैं और इनमें से एक तिहाई की मौत तो शैशवावस्था के पहले वर्ष में ही हो जाती है । विशेष आयु पर मृत्यु दरों से पता चलता है कि 35 वर्ष की उम्र तक हर आयु स्तर पर पुरुषों से अधिक महिलाओं की मौतें होती है । बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर , कर्णाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडू और उत्तर प्रदेश में लड़को की तुलना में लड़कियों के मरने का खतरा अधिक रहता है । क्षेत्र, धर्म, जाति एवं निर्धनता मृत्यु दरों को प्रभावित करते हैं । महिलाओं की स्थिति जितनी अधिक कमजोर होगी जन्म पर मौतें भी उतनी ही अधिक होगी । उत्तर प्रदेश में जन्मी लड़की 54 वर्ष तक जीवित रहने की उम्मीद रख सकती हैं जबकि केरल में जन्मी लड़की के 74 वर्ष तक जीवित रहने की संभावना है ।
अधिकतर देशों में लिंग अनुपात महिलाओं के अनुकूल होता है, परन्तु भारतवर्ष में दशक-दर-दशक लिंग अनुपात में कमी होती रही है । केरल को छोड़ अन्य राज्यों में लिंग अनुपात दयनीय ही रहा है । सन् 2001 की जनगणना में कुल जनसंख्या में लिंग अनुपात (प्रति हजार पुरूष पर) 933, अनु0 जातियों में 922, गैर अनुसूचित जनजातियों में 923 तथा अनु0 जनजातियों में 972 है । सन 1901 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या में लिंग अनुपात (प्रति हजार पुरूष पर) 972 थी, जो सन 2011 में घटकर 940 हो गयी है ।
लिंग अनुपात की विषमता का एक मुख्य कारण है, कुपोषण से बहुत ही कम उम्र में बड़ी संख्या में मौतें होना । सन् 1974 में लेविनसन द्वारा पंजाब में कुपोषण के शिकार बच्चों के अध्ययन से भी यह बात सामने आयी कि पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी देखभाल में लिंग आधारित पक्षपात होता है । पोषण के कारण हुए रुद्ध विकास और कुपोषण के फलस्वरुप व्यस्क होने पर शरीर का ढॉंचा पूरी तरह विकसित नहीं होता है । दोनों ही स्थितियों में कम वजन के बच्चे पैदा होने की संभावना बनी रहती है । कुपोषित लड़कियॉं बड़ी होकर कुपोषित औरतें बन जाती हैं तथा अल्पपोषण के इस चक्र को पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रखती हैं । लड़को के मुकाबले लड़कियों को कम समय के लिए स्तनपान कराया जाता है । साथ ही अल्प क्रय-क्षमता के कारण लड़कियों को कम कैलोरीयुक्त आहार के साथ-साथ कम पूरक और ठोस भोजन दिया जा रहा है जिसका परिणाम हैं कि लड़कियों की मृत्यु-दर 196 प्रति 1000 जन्म है , वहीं लड़को की 125 प्रति 1000 जन्म ।
एक अध्ययन के अनुसार लड़को के मुकाबले कुपोषित लड़कियों की संख्या 2 से 3 गुणा रहती है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई महानगरों की दो एवं तीन श्रेणी में लड़कों के मुकाबले लड़कियों का कुपोषण अधिक था । जब कहीं खाद्यान्न सामग्री की बहुत अधिक कमी हो जाती है तो लड़कियों की स्थिति पर ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।

(लेखक अभियंता एवं शिक्षाशास्त्री हैं)

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