– महेन्द्र तिवारी
भारत का केंद्रीय बजट 2026–27 ऐसे समय में प्रस्तुत किया गया है, जब देश एक ओर तेज़ आर्थिक विकास की आकांक्षा रखता है और दूसरी ओर वैश्विक अनिश्चितताओं, जलवायु संकट तथा सामाजिक विषमताओं से जूझ रहा है। 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लोकसभा में पेश यह बजट केवल वार्षिक आय–व्यय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के संकल्प की ठोस रूपरेखा के रूप में सामने आता है। ‘विकास, समावेशिता और स्थिरता’ के त्रिस्तंभ पर आधारित यह बजट पिछले वर्षों की तुलना में अधिक व्यावहारिक, निवेशोन्मुख और रोजगार-केंद्रित दिखाई देता है। इसमें बड़े वादों के साथ-साथ उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है, जो सीधे आम नागरिक के जीवन, आजीविका और भविष्य से जुड़े हैं।
इस बजट का सबसे सशक्त पक्ष पूंजीगत व्यय में की गई उल्लेखनीय वृद्धि है। सरकार ने कैपेक्स को 11.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये कर दिया है, जो स्पष्ट संकेत देता है कि आर्थिक वृद्धि का रास्ता बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक निवेश से होकर गुजरता है। राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखना इस बात का प्रमाण है कि सरकार विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रही है। यही संतुलन इस बजट को राजनीतिक घोषणाओं से ऊपर उठाकर नीति-आधारित दस्तावेज़ बनाता है।
बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बजट 2026 ने भविष्य की भारत-कल्पना को मूर्त रूप दिया है। सात पर्यावरण-अनुकूल हाई-स्पीड रेल कॉरिडोरों की घोषणा केवल यात्रा समय कम करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह शहरीकरण, औद्योगिक विस्तार और क्षेत्रीय संतुलन को भी गति देगा। मुंबई-पुणे, दिल्ली-वाराणसी और चेन्नई-मैसूर जैसे मार्ग न केवल आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करेंगे, बल्कि पर्यटन, शिक्षा और श्रम बाजार को भी नया आयाम देंगे। शहरी परिवहन के लिए 4000 ई-बसों की योजना और 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों की घोषणा भारत को हरित और टिकाऊ परिवहन प्रणाली की ओर ले जाती है।
रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रेयर अर्थ मिनरल्स कॉरिडोर की स्थापना भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में इन खनिजों की भूमिका अहम है। इसके साथ ही रासायनिक पार्कों और परमाणु ऊर्जा मिशन की घोषणाएं यह संकेत देती हैं कि सरकार ऊर्जा aसुरक्षा और औद्योगिक विविधीकरण को दीर्घकालिक नजरिए से देख रही है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों पर जोर भारत को स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक मानचित्र पर एक मजबूत स्थान दिला सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले एमएसएमई क्षेत्र को इस बजट में विशेष प्राथमिकता दी गई है। 10,000 करोड़ रुपये का नया फंड ऑफ फंड्स, चैंपियन एमएसएमई योजना और वर्गीकरण सीमा में वृद्धि से छोटे और मध्यम उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने का अवसर मिलेगा। माइक्रो एंटरप्राइजेज के लिए क्रेडिट कार्ड योजना उस तबके के लिए राहत है, जो अब तक बैंकिंग प्रणाली से दूरी बनाए हुए था। विनिर्माण क्षेत्र के लिए टेक्सटाइल मेगा पार्क, विरासत औद्योगिक क्षेत्रों का पुनरुद्धार और पीएलआई योजना का विस्तार ‘मेक इन इंडिया’ को नई ऊर्जा देता है। सरकार का यह लक्ष्य कि 2026–27 तक विनिर्माण का योगदान जीडीपी में 25 प्रतिशत हो, महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन सही क्रियान्वयन से संभव भी।
कृषि और ग्रामीण विकास को लेकर बजट में दिखाई देने वाला दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि सरकार अब केवल सब्सिडी आधारित नीति से आगे बढ़कर उत्पादकता और बाजार-समेकन पर ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना का विस्तार, दाल आत्मनिर्भरता मिशन और किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा में वृद्धि छोटे और सीमांत किसानों के लिए राहत का संकेत है। डिजिटल कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के माध्यम से मंडियों का डिजिटलीकरण किसानों को बिचौलियों की निर्भरता से मुक्त कर सकता है। ग्रामीण भारत, जहां आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी निर्भर है, इस बजट से नई संभावनाओं की ओर बढ़ता दिखता है।
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों में बजट का रुख अपेक्षाकृत संतुलित रहा है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं पर सीमा शुल्क में कटौती आम मरीजों के लिए राहत है, खासकर तब जब इलाज की लागत लगातार बढ़ रही है। बायो-फार्मा मिशन और मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने से भारत वैश्विक स्वास्थ्य सेवा केंद्र के रूप में उभर सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में कंटेंट लैब, गर्ल्स हॉस्टल और आयुर्वेदिक संस्थानों की घोषणा सामाजिक समावेशन और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में जोड़ने का प्रयास है।
रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ा हुआ जोर भारत की रणनीतिक सोच को दर्शाता है। रक्षा बजट में वृद्धि और स्वदेशी हथियार उत्पादन पर प्राथमिकता आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है। ऊर्जा क्षेत्र में सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का विस्तार यह स्पष्ट करता है कि भारत आने वाले दशकों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना चाहता है। यह न केवल पर्यावरण के लिए आवश्यक है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में भारत की स्थिति को भी मजबूत करता है।
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