शेख हसीना की सरकार के पतन और लगभग डेढ़ वर्ष तक चली अंतरिम व्यवस्था के बाद, देश में आम चुनाव संपन्न हो चुके हैं और बांग्लादेश अब लोकतंत्र का एक नया अध्याय लिखने को तैयार है। इस देश केे13वें संसदीय चुनाव में हिंसा के बीच करीब 48 प्रतिशत मतदान हुआ है। 299 संसदीय सीटों पर 1,981 उमीदवार मैदान में थे, जबकि करीब 60 पंजीकृत राजनीतिक दलों ने चुनाव में हिस्सा लिया है। बांग्लादेश में मतदान प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही अब इस देश के साथ पूरी दुनिया और भारत की निगाहें मतगणना और अंतिम नतीजों पर टिकी हैं। विशेषकर भारत बांग्लादेश में हुए आम संसदीय चुनाव को सिर्फ एक पड़ोसी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे अपनी सामरिक, कूटनीतिक और सुरक्षा रणनीति की कसौटी के रूप में आंक रहा है। यह चुनाव ढाका की सत्ता का निर्धारण तो करेगा ही, साथ ही यह भी तय करेगा कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक दिशा किस ओर मुड़ेगी। पिछले डेढ़ दशक में भारत और बांग्लादेश के संबंधों ने जिस अभूतपूर्व ऊंचाई को छुआ, वह काफी हद तक शेख हसीना के नेतृत्व में संभव हुआ। इस बार की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना यह है कि शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग चुनावी मैदान से बाहर है। नतीजतन मुकाबला पारंपरिक द्विध्रुवीयता से हटकर त्रिकोणीय स्वरूप लेता दिख रहा है। मुख्य प्रतिस्पर्धा बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी ) और जमात-ए-इस्लामी के गठबंधन के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जबकि छात्र आंदोलनों से उभरी नई शक्तियां ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकती हैं। यह परिदृश्य केवल ढाका की राजनीति का पुनर्संरचना नहीं, बल्कि नई दिल्ली की कूटनीतिक गणना का भी पुनर्मूल्यांकन है। पिछले 16 वर्षों में शेख हसीना के शासनकाल ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को अभूतपूर्व स्थिरता दी। सीमा विवादों के समाधान, आतंकवाद-रोधी सहयोग, पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद पर लगाम और आर्थिक साझेदारी इन सभी मोर्चों पर ढाका ने भारत का साथ दिया। 2015 का भूमि सीमा समझौता हो या सुरक्षा सहयोग इन कदमों ने विश्वास की नींव मजबूत की। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के लिए बांग्लादेश एक सेतु की भूमिका में रहा है। ऊर्जा व्यापार, सडक़-रेल संपर्क , बंदरगाह उपयोग और ट्रांजिट सुविधाओं ने दोनों देशों को व्यावहारिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ाया। ऐसे में सत्ता परिवर्तन की संभावना नई दिल्ली के लिए केवल राजनीतिक नहीं, रणनीतिक चिंता का विषय है। यदि बीएनपी-जमात गठबंधन सत्ता में आता है, तो भारत को अतीत की यादें भी ध्यान में रखनी होंगी। पिछली बार जब बीएनपी-जमात शासन में थी, तब भारत-विरोधी तत्वों को संरक्षण, सीमा पार आतंकवाद और पूर्वोत्तर में उग्रवादी गतिविधियों के आरोप गंभीर रूप से उभरे थे। हालांकि वर्तमान नेतृत्व, विशेषकर बीएनपी के नेता तारीक रहमान ‘बांग्लादेश फर्स्ट ’ की बात कर रहे हैं, परंतु विदेश नीति के व्यवहारिक आयाम सत्ता में आने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। भारत को यह देखना होगा कि नई सरकार संतुलित विदेश नीति अपनाती है या वैचारिक आग्रहों से प्रेरित होकर संबंधों को नई दिशा देती है। बांग्लादेश में सरकार बनने के बाद सबसे संवेदनशील मुद्दा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का है। अगस्त 2024 के जनांदोलन के बाद हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों पर हमलों की खबरों ने अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर चिंता बढ़ाई। मंदिरों में तोडफ़ोड़, घरों पर हमले और पलायन की घटनाएं केवल बांग्लादेश का आंतरिक मामला नहीं हैं, वे भारत-बांग्लादेश संबंधों के ताने-बाने को भी प्रभावित करती हैं। भारत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों से जुड़ा है। यदि अस्थिरता बढ़ती है, तो शरणार्थी दबाव पूर्वोत्तर भारत पर पड़ सकता है। इसलिए नई दिल्ली के लिए यह विषय भावनात्मक से अधिक व्यावहारिक चिंता का कारण है। नई सरकार यदि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करती है, तो यह विश्वास निर्माण की दिशा में बड़ा कदम होगा, अन्यथा आशंकाएं गहराएंगी। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में चीन और पाकिस्तान की सक्रियता भी महत्वपूर्ण कारक है। पिछले दशक में चीन ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और रक्षा सहयोग के जरिए अपनी पैठ मजबूत की है। यदि ढाका नई दिल्ली से दूरी बनाता है, तो बीजिंग के लिए बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर होगा। पाकिस्तान के लिए भी यह चुनाव ‘रणनीतिक वापसी’ का मौका हो सकता है। जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान समर्थक माना जाता रहा है। यदि सत्ता संतुलन बदला, तो भारत को पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियों पर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। भारत और बांग्लादेश करीब 4000 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। भारत की किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी सीमा। सीमा के बड़े हिस्से में बाड़बंदी अधूरी है। घुसपैठ, पशु तस्करी, ड्रग्स और नकली करेंसी की समस्या पहले से मौजूद है। एक असहयोगी या वैचारिक रूप से भारत-विरोधी सरकार इन चुनौतियों को बढ़ा सकती है। साथ ही आतंकवादी घुसपैठ की आशंका भी बढ़ सकती है। इसलिए भारत की प्राथमिकता यह होगी कि चाहे ढाका में कोई भी सरकार बने, सुरक्षा सहयोग की मौजूदा संरचना बरकरार रहे। बांग्लादेश भारत का प्रमुख व्यापार साझेदार है। द्विपक्षीय व्यापार ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की। ऊर्जा सहयोग, बिजली आपूर्ति और संयुक्त परियोजनाएं दोनों देशों को परस्पर निर्भरता के रिश्ते में जोड़ती हैं। यदि नई सरकार कट्टर या राष्ट्रवादी रुख अपनाती है, तो इन परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति, पूर्वोत्तर का विकास और क्षेत्रीय संपर्क इन सभी की सफलता बांग्लादेश की स्थिरता से जुड़ी है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि भारत निष्पक्ष, स्वतंत्र और विश्वसनीय चुनाव का समर्थक है और परिणामों की प्रतीक्षा करेगा। यह संयमित रुख दर्शाता है कि नई दिल्ली किसी भी पूर्वाग्रह से बचते हुए जनादेश का सक्वमान करना चाहती है। भारत का यह दृष्टिकोण व्यावहारिक है। पड़ोसी देशों की राजनीति में हस्तक्षेप की छवि से बचते हुए, संवाद के दरवाजे खुले रखना ही दीर्घकालिक रणनीति का आधार होना चाहिए। भारत भी चाहता है कि बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरिता खत्म हो और एक स्थायी सरकार स्थापित हो। भारत इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जरूरत है कि देश में एक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को पालन करने वाली सरकार बने, इसका कारण है कि ढाका का जनादेश केवल बांग्लादेश की संसद की तस्वीर नहीं बदलेगा; वह दक्षिण एशिया के रणनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करेगा। यदि नई सरकार संतुलित विदेश नीति, अल्पसंक्चयक सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंध नई ऊंचाइयों पर जा सकते हैं। लेकिन यदि वैचारिक आग्रह और बाहरी प्रभाव हावी होते हैं, तो अविश्वास की खाई चौड़ी हो सकती है। भारत को नतीजों का इंतजार है, लेकिन उससे भी अधिक वह नई सरकार के पहले कदमों पर नजर गड़ाए हुए है। आने वाले दिनोंं में ढाका और नई दिल्ली के बीच बनने वाला समीकरण ही यह तय करेगा कि यह चुनाव परिणाम विश्वास की नई कहानी लिखेगा या आशंकाओं की।


