बांग्लादेश में हुए आम चुनाव परिणामों से यह स्पष्टï हो गया है कि वहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार बनने जा रही है और तारिक रहमान देश के नये प्रधानमंत्री होंगे। रहमान के नेतृत्व में पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि देश की जनता परिवर्तन चाहती थी। अवामी लीग के लंबे शासन के बाद यह परिणाम केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं में संभावित बदलाव का संकेत भी है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु इस बार का बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और दक्षिण एशियाई संतुलन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। भारत के लिए यह चुनाव परिणाम इसलिए विशेष मायने रखता है, क्योंकि अब उसे ऐसे नेतृत्व के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करना होगा, जिसके साथ अतीत के अनुभव मिश्रित रहे हैं। चूंकि बांग्लादेश नई दिल्ली की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का केंद्रीय स्तंभ रहा है। ऐसे में ढाका की सत्ता में बदलाव के कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक मायने गहरे हैं। इसका कारण है कि भारत और बीएनपी के रिश्तों का अतीत सहज नहीं रहा है। 2001-06 के दौरान खालिदा जिया के नेतृत्व में बीएनपी सरकार के समय दोनों देशों के बीच तनाव देखा गया। भारत ने उस दौर में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश की भूमि का इस्तेमाल पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों द्वारा किया जा रहा है। साथ ही बीएनपी का ‘जमात-ई-इस्लामी बांग्लादेश’ के साथ गठबंधन भारत के लिए चिंता का विषय है। इसके साथ ही सीमावर्ती इलाकों में कट्टरपंथ और घुसपैठ की आशंकाओं ने विश्वास के संकट को जन्म दिया है। लेकिन 2026 का परिदृश्य 2001 जैसा नहीं है। वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आर्थिक यथार्थ, भू-राजनीतिक दबाव और घरेलू चुनौतियां बीएनपी को अधिक व्यावहारिक नीति अपनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं। इतिहास की स्मृतियां महत्त्वपूर्ण हैं, पर वे भविष्य को अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं करतीं। इस चुनाव का सबसे बड़ा संकेत यह है कि जमात-ए-इस्लामी सत्ता से दूर रही। यदि कट्टर वैचारिक ताकतों को निर्णायक शक्ति मिलती, तो भारत की सुरक्षा चिंताएं कई गुना बढ़ सकती थीं। जमात का राजनीतिक इतिहास पाकिस्तान समर्थक झुकाव और धार्मिक ध्रुवीकरण से जुड़ा रहा है। अतीत में भारत-विरोधी भावनाओं को भडक़ाने के आरोप भी उस पर लगे हैं। ऐसे में उसका सत्ता से दूर रहना भारत के लिए तत्काल रणनीतिक राहत का संकेत है। बीएनपी, भले ही राष्ट्रवादी राजनीति करती हो, पर वह शासन की जटिलताओं और आर्थिक मजबूरियों से परिचित है। इसलिए वैचारिक टकराव की बजाय व्यावहारिक संतुलन की संभावना अधिक है। यही कारण है कि राजनयिक स्तर पर संतुलित संदेशों और संपर्क सुधार की पहल ने यह सुनिश्चित किया है कि सत्ता परिवर्तन से रिश्तों में अचानक तनाव न आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई देकर स्पष्ट संकेत दिया कि नई दिल्ली इस बदलाव को अवसर की तरह देख रही है, न कि संकट की तरह। यह संदेश चीन और पाकिस्तान से पहले भेजा गया यह एक प्रतीकात्मक लेकिन रणनीतिक कदम है, तो परिपक्व कूटनीति का उदाहरण है। भारत जानता है कि ढाका के साथ उसके रिश्ते केवल पड़ोसी कूटनीति तक सीमित नहीं हैं; वे राष्ट्रीय सुरक्षा, पूर्वोत्तर की स्थिरता और हिंद महासागर क्षेत्र के संतुलन से जुड़े हैं। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में उल्लेखनीय स्थिरता रही। व्यापार, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और संपर्क परियोजनाओं में प्रगति हुई। लेकिन पिछले डेढ़ वर्ष की उथल-पुथल चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क तथा हिंदू अल्पसंक्चयकों पर हमलों ने नई दिल्ली को सतर्क कर दिया है। भारत की पहली चिंता संभावित त्रिकोणीय समीकरण है-पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश। यदि नई सरकार की विदेश नीति भारत के प्रति कम झुकाव वाली हुई, तो दक्षिण एशिया का सामरिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। चीन पहले ही बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में गहरी पैठ बना चुका है, जिसमें मोंगला पोर्ट का आधुनिकीकरण, सडक़ और ऊर्जा परियोजनाएं इसका उदाहरण हैं। श्रीलंका और पाकिस्तान में चीन की रणनीतिक मौजूदगी को देखते हुए भारत किसी नए समुद्री ‘घेरे’ को हल्के में नहीं ले सकता। हाल में पाकिस्तान के साथ जेएफ-17 लड़ाकू विमानों को लेकर बातचीत की खबरें भी चर्चा में रहीं। यदि रक्षा सहयोग बढ़ता है, तो यह भारत के पूर्वोत्तर के लिए नई चुनौती बन सकता है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच लंबी सीमा है, जो घनी आबादी, जटिल भूगोल और राजनीतिक संवेदनशीलता से भरी। अवैध घुसपैठ, ड्रग तस्करी और सीमा पार अपराध लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। पश्चिम बंगाल और असम की राजनीति में यह मुद्दा चुनावी विमर्श का केंद्र बन जाता है। ऐसे में रहमान सरकार सीमा प्रबंधन पर कितनी सक्चती दिखाती है, यह भारत के लिए निर्णायक होगा। अवामी लीग शासन के दौरान आतंकवाद-रोधी सहयोग और उग्रवादी समूहों पर कार्रवाई में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। यदि वह सहयोग ढीला पड़ता है, तो पूर्वोत्तर भारत में अस्थिरता बढ़ सकती है। शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरों ने भारत में भावनात्मक और राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की। विभिन्न रिपोर्टों में हजारों हमलों का उल्लेख है कि मंदिर, घर और व्यापारिक प्रतिष्ठान निशाना बने। भारत ने कम से कम 23 हिंदुओं की हत्या का मुद्दा उठाया और कठोर कार्रवाई की मांग की है। अंतरिम सरकार ने कुछ घटनाओं को भूमि विवाद या निजी दुश्मनी से जोडक़र देखा, लेकिन व्यापक असुरक्षा की भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। तारिक रहमान ने अल्पसंक्चयकों की सुरक्षा का आश्वासन दिया है, परंतु बीएनपी का पारंपरिक झुकाव रूढि़वादी तत्वों की ओर रहा है। भारत की नजर इस बात पर रहेगी कि यह आश्वासन व्यवहार में कितना उतरता है। अल्पसंक्चयकों की सुरक्षा केवल मानवाधिकार का प्रश्न नहीं, बल्कि द्विपक्षीय विश्वास का आधार है। भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 14 अरब डॉलर का वार्षिक व्यापार है, जिसमें भारत को करीब 10 अरब डॉलर का सरप्लस मिलता है। बांग्लादेश की रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और वह 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे कपास के लिए भारत पर निर्भर है। यदि नई सरकार चीन से वैकल्पिक आपूर्ति तलाशती है, तो भारतीय कपास निर्यात और किसानों पर असर पड़ सकता है। लेकिन आर्थिक यथार्थ राजनीति से अधिक व्यावहारिक होता है। बांग्लादेश की उद्योग व्यवस्था स्थिर और भरोसेमंद सप्लाई चेन चाहती है। भारत की भौगोलिक निकटता और लागत लाभ उसे स्वाभाविक साझेदार बनाते हैं। यदि नई सरकार आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देती है, तो व्यापारिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं। रहमान का कथन कि वे भारत के हितों का सम्मान करेंगे, उनकी मां की ‘बांग्लादेश फस्र्ट’ नीति से अलग संकेत देता है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि वे संबंधों को अधिक संतुलित, लेन-देन आधारित और बहुध्रुवीय बनाना चाहते हैं। भारत के लिए फिलहाल नीति ‘इंतजार और निगरानी’ की है। जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बांग्लादेश की नई सरकार को स्थिरता, आर्थिक पुनर्निर्माण और अंतरराष्ट्रीय संतुलन साधना है। भारत को संयम, संवाद और व्यावहारिक सहयोग के साथ आगे बढऩा होगा। मगर इतना तय है कि भारत के साथ रिश्ते कैसे रहेंगे यह बीएनपी सरकार और इसके प्रमुख तारिक रहमान पर ही निर्भर करेगा। देखने वाली बात होगी कि कि क्या वे इतिहास की छाया से आगे बढक़र सहयोग के नए अध्याय की रचना कर पायेंगे।


