-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वैश्विक अर्थव्यवस्था के मौजूदा दौर में एक बड़ा विरोधाभास साफ दिखाई देता है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन दरअसल आज भारत की औद्योगिक प्रोत्साहन नीतियों पर सवाल उठा रही हैं, जबकि स्वयं उनकी आर्थिक रणनीतियां लंबे समय से भारी सब्सिडी और संरक्षणवाद पर आधारित रही हैं। भारत की “प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव” यानी पीएलआई योजनाओं और “मेक इन इंडिया अभियान” को लेकर जिस तरह का अंतरराष्ट्रीय दबाव आज बनाया जा रहा है, उससे साफ है कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन की बदलती दिशा का सीधा संकेत है।
भारत इस समय दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए अपना लक्ष्य तय कर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को सकल घरेलू उत्पाद में लगभग सत्रह प्रतिशत से बढ़ाकर पच्चीस प्रतिशत तक ले जाने की रणनीति बनाई गई है। वर्ष 2020 में कोविड महामारी के बाद जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं चरमरा गई थीं, तब भारत ने इसे अवसर के रूप में देखा और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना शुरू की। लगभग एक लाख इक्यानवे हजार करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ लागू की गई यह योजना इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, सोलर मॉड्यूल, ऑटोमोबाइल, मेडिकल डिवाइस और दूरसंचार उपकरण सहित चौदह क्षेत्रों को कवर करती है।
इन योजनाओं के अंतर्गत कंपनियों को वास्तविक उत्पादन और बिक्री के आधार पर प्रोत्साहन मिलता है, जिससे भारत में निवेश बढ़ा है। सोलर क्षेत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड, अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और वॉरी एनर्जीज लिमिटेड जैसी कंपनियों ने क्षमता विस्तार किया है। मोबाइल निर्माण में भारत वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत में स्थानांतरित कर रही हैं।
अमेरिका अपनी कंपनियों को दे रहा सब्सिडी, पर भारत के लिए रोक का दबाव :
इसी बीच अमेरिका ने भारत से आयातित सोलर उपकरणों पर एक सौ छब्बीस प्रतिशत तक का प्रारंभिक टैरिफ लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि भारतीय उद्योग को सरकारी सहायता के कारण अनुचित लाभ मिला है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और चीन जैसे व्यापारिक साझेदारों का कहना है कि इन प्रोत्साहनों से भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों पर अनुचित बढ़त मिलती है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या यह तर्क पूरी तरह निष्पक्ष है?
अमेरिका स्वयं 2022 में पारित अपने ‘इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट’ के तहत हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर उद्योग को भारी कर प्रोत्साहन और सब्सिडी दे रहा है। इसके अलावा चिप्स एंड साइंस एक्ट के माध्यम से घरेलू सेमीकंडक्टर निर्माण को अरबों डॉलर का समर्थन दिया जा रहा है। इन नीतियों में स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता देने की शर्तें भी शामिल हैं।
चीन भी हो रहा भारत की आर्थिक ग्रोथ से परेशान
चीन ने भी 2024 में ‘अमेरिकी इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट’ को विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी थी और आरोप लगाया था कि यह विदेशी उत्पादों के साथ भेदभाव करता है। दूसरी ओर चीन स्वयं लंबे समय से इलेक्ट्रिक वाहन और सोलर उद्योग में व्यापक सरकारी समर्थन देता रहा है। यूरोपीय संघ ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर एंटी सब्सिडी जांच शुरू की और आरोप लगाया कि सरकारी प्रोत्साहनों के कारण चीनी कंपनियों ने वैश्विक बाजार में असंतुलित बढ़त हासिल की। चीन की मेड इन चाइना 2025 जैसी औद्योगिक रणनीति का उद्देश्य भी रणनीतिक क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित करना रहा है।
ऐसे परिदृश्य में भारत की ‘पीएलआई’ योजनाओं को लेकर उठाई जा रही आपत्तियां स्वाभाविक रूप से दोहरे मानदंड का आभास कराती हैं। चीन ने डब्ल्यूटीओ में भारत की ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की योजनाओं को चुनौती दी है और आरोप लगाया है कि ये योजनाएं स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देती हैं और आयातित सामान को नुकसान पहुंचाती हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के विवाद निपटान निकाय ने इस पर पैनल गठित किया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि योजनाएं डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुरूप हैं क्योंकि इनमें निर्यात अनिवार्यता नहीं है बल्कि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन है। सरकार अपनी योजनाओं का डब्ल्यूटीओ में मजबूती से बचाव करेगी और उनका मानना है कि ये योजनाएं डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुरूप हैं।
ये औद्योगिक राष्ट्रवाद का दौर है
आर्थिक नीति के जानकारों में देश की राजधानी में रह रहे रवि रंजन सिंह का मानना है कि “वैश्विक स्तर पर औद्योगिक राष्ट्रवाद का दौर लौट आया है। विकसित देश दशकों तक अपनी औद्योगिक नींव को सब्सिडी और संरक्षण के सहारे मजबूत करते रहे, लेकिन जब कोई विकासशील देश उसी मॉडल को अपनाता है तो उसे नियमों की याद दिलाई जाती है।” उनके अनुसार भारत की योजनाएं प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और रोजगार सृजन के लिए हैं, न कि व्यापार विकृति के लिए।
रवि रंजन सिंह कहते हैं, “मेक इन इंडिया अभियान ने पिछले कुछ वर्षों में ठोस परिणाम दिए हैं। मोबाइल फोन निर्माण में भारत ने उल्लेखनीय छलांग लगाई है। रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। सोलर ऊर्जा क्षमता में तेजी से विस्तार हुआ है और भारत वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा निवेश का महत्वपूर्ण गंतव्य बन रहा है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। आपूर्ति श्रृंखला में अब भी कुछ महत्वपूर्ण कच्चे माल और घटकों के लिए चीन पर निर्भरता बनी हुई है। फिर भी हम आश्वस्ती के साथ कह सकते हैं कि भारत इन सभी क्षेत्रों में इन दिनों बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।”
इस विवाद का हल भारत के पक्ष में आने की उम्मीद
ऐसे में यह विवाद अंततः एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है। क्या वैश्विक व्यापार व्यवस्था उभरती अर्थव्यवस्थाओं को उतनी ही नीति स्वतंत्रता देगी जितनी विकसित देशों ने अपने विकास काल में ली थी। यह आज की वास्तविकता है कि भारत की औद्योगिक यात्रा अभी अपने निर्णायक चरण में है। यदि वह संतुलित रणनीति अपनाते हुए पारदर्शिता और दीर्घकालिक सुधारों पर जोर दे रहा है, तब मौजूदा चुनौतियां उसके लिए अवसर में बदलती हुई दिखती है। जैसे की अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत पर थोपे गए अतिरिक्त टैरिफ ने हाल ही में भारत के लिए व्यापार के नए रास्ते खोल दिए। अब उम्मीद करें कि इस विवाद का हल भी भारत के पक्ष में ही आएगा।
फिलहाल यहां जो स्पष्ट दिखता है वह यही है कि ये सिर्फ सब्सिडी का विवाद नहीं है, यह तो वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में अपने को आगे रखने के लिए अमेरिका और चीन द्वारा स्वयं के हित के चलते भारत पर दबाव बनाने का प्रयास है। क्योंकि भारत अब सिर्फ बाजार नहीं रहा, वह निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ चुका है और यही बदलाव स्थापित शक्तियों को आज असहज कर रहा है।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत की उभरती औद्योगिक शक्ति से घबराई विश्व की महाशक्तियां


