Wednesday, March 11, 2026
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महात्मा गांधी के आर्थिक मॉडल को न अपनाना हमारी बड़ी भूल : हरिवंश

नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने शनिवार को कहा कि महात्मा गांधी ने बहुत पहले स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की अवधारणा देश के सामने रखी थी, लेकिन उसे समय रहते न अपनाना हमारी बड़ी भूल रही। उन्होंने कहा कि गांधी का आर्थिक मॉडल आज के दौर में भी पूरी तरह प्रासंगिक है। हरिवंश गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक ‘गांधी: अहिंसा के योद्धा की सचित्र जीवन यात्रा’ के विमोचन के अवसर पर गांधी स्मृति में आयोजित कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस पुस्तक के लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष विजय गोयल हैं। कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षाविद् मुकुल कानिटकर और इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि आज़ादी के अमृतकाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से देश ने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण किया है। स्वतंत्रता संग्राम में अनेक महापुरुषों का योगदान रहा, जिनमें महात्मा गांधी प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और देश के बेहतर भविष्य के लिए उनके विचारों को बच्चों और युवाओं तक पहुंचाना आवश्यक है। हरिवंश ने गांधी पर आधारित इस चित्रात्मक और तथ्यात्मक पुस्तक के प्रकाशन के लिए लेखक विजय गोयल और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति को बधाई दी। इस अवसर पर विजय गोयल ने कहा कि महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, सेवा, त्याग और स्वच्छता जैसे मूल्यों को न केवल उपदेश के रूप में दिया, बल्कि स्वयं अपने जीवन में उतारा। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को गांधी के विचारों से सीख लेने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से यह पुस्तक तैयार की गई है। गोयल ने कहा कि गांधी को केवल पढ़ना ही नहीं बल्कि उन्हें जीवन में उतारना ही इस पुस्तक की सार्थकता है। अपने संबोधन में मुकुल कानिटकर ने कहा कि लोग गांधी को समझे बिना ही उनके बारे में धारणाएं बना लेते हैं। ऐसे में गांधी को प्रमाणिक रूप से जानने के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। प्रो. के. जी. सुरेश ने कहा कि गांधीजी का मानना था कि शांति कायरों का नहीं, बल्कि शक्तिशालियों का अस्त्र है। भारतीय परंपरा सदैव विश्व शांति की पक्षधर रही है और गांधी इस परंपरा के प्रमुख ध्वजवाहक थे।

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