– महेन्द्र तिवारी
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना के जागरण की वह दिव्य बेला है जब आकाश और पृथ्वी का मिलन होता है। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति में शिव को ‘अनादि’ और ‘अनंत’ माना गया है, जिनका न कोई आरंभ है और न ही कोई अंत। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली यह महान रात्रि उस परम शिव तत्व के साक्षात्कार का अवसर प्रदान करती है जो संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। सामान्यतः त्योहारों को उल्लास, रंग और बाहरी चमक-धमक से जोड़ा जाता है, किंतु महाशिवरात्रि एक ऐसी रात्रि है जो हमें अंतर्मुखी होने का संदेश देती है। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय नहीं, बल्कि उस गहन अंधकार की आराधना है जिससे प्रकाश का जन्म होता है। शिव का अर्थ ही ‘कल्याण’ है और रात्रि का अर्थ ‘विश्राम’ या ‘निवृत्ति’ है। इस प्रकार महाशिवरात्रि का अर्थ है वह रात्रि जो हमें आध्यात्मिक विश्राम प्रदान कर परम कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करती है। इस महापर्व की महत्ता को समझने के लिए हमें इसके पौराणिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आयामों को एक अखंड प्रवाह में देखना होगा।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार महाशिवरात्रि के साथ कई अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग जुड़े हुए हैं। सबसे प्रमुख कथा भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की है। यह विवाह केवल दो सत्ताओं का मिलन नहीं है, बल्कि यह पुरुष और प्रकृति, वैराग्य और गृहस्थ, तथा ध्यान और शक्ति के संतुलन का प्रतीक है। शिव जो परम योगी हैं, श्मशान निवासी हैं और सांसारिक मोह-माया से विरक्त हैं, वे देवी पार्वती के कठिन तप से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए संसार का त्याग आवश्यक नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी अनासक्त भाव से शिव तत्व को प्राप्त किया जा सकता है। एक अन्य कथा के अनुसार, इसी रात्रि को ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद को शांत करने के लिए शिव एक विशाल अग्नि स्तंभ यानी ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इस स्तंभ का न तो कोई छोर था और न ही कोई अंत, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर किसी सीमा या परिभाषा में बंधा हुआ नहीं है। समुद्र मंथन की कथा भी इस रात्रि से गहराई से जुड़ी है। जब समुद्र से निकले हलाहल विष से पूरी सृष्टि जलने लगी, तब करुणावतार शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की उस प्रचंड ऊष्मा को शांत करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने रात्रि भर जल और दुग्ध से उनका अभिषेक किया और उन्हें जागृत रखा। यही कारण है कि आज भी भक्त रात्रि भर जागकर शिव का जलाभिषेक करते हैं, जो वास्तव में समाज के कष्टों को स्वयं पर लेने की शिव की उदारता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है।
अध्यात्म की दृष्टि से देखा जाए तो महाशिवरात्रि का महत्व ‘जागरण’ में निहित है। मनुष्य का जीवन प्रायः अज्ञान की निद्रा में बीता जाता है, जहाँ वह अपनी देह और अहंकार को ही सत्य मान बैठता है। शिवरात्रि की रात्रि वह समय है जब प्रकृति स्वयं मनुष्य की चेतना को ऊपर उठाने में सहायक होती है। योग विज्ञान के अनुसार, इस विशिष्ट रात्रि में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है कि मनुष्य के शरीर के भीतर की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर यानी रीढ़ की हड्डी के माध्यम से मस्तिष्क (सहस्रार चक्र) की ओर प्रवाहित होने लगती है। यही कारण है कि इस रात्रि में रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठने और जागने का विधान है। जो साधक इस रात्रि में सजग रहता है, वह अपनी कुंडलिनी शक्ति के जागरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठा सकता है। यहाँ ‘जागने’ का अर्थ केवल आंखों को खुला रखना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना को विचारों और विकारों से मुक्त कर शून्य में ले जाना है। शिव स्वयं ‘शून्य’ के प्रतीक हैं—वह जो नहीं है, वही शिव है। जब हम अपनी पहचान, अपने पद, अपने धन और अपने अहंकार को पूरी तरह विसर्जित कर देते हैं, तब हमारे भीतर शिव का प्राकट्य होता है। इसीलिए कहा गया है ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ अर्थात शिव बनकर ही शिव की पूजा की जा सकती है।
महाशिवरात्रि की पूजन विधि भी अत्यंत प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक है। शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले पदार्थों का गहरा अर्थ है। जल चढ़ाना मन की चंचलता को शांत करने का प्रतीक है, जबकि दूध शुद्धता और सात्विकता का। शहद वाणी की मधुरता के लिए है और घी तेज के लिए। बिल्वपत्र के तीन दल मनुष्य के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव को ये तीनों दल अर्पित करने का अर्थ है कि हम अपने इन तीनों गुणों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहे हैं ताकि हम गुणातीत अवस्था को प्राप्त कर सकें। धतूरा और भांग जैसे पदार्थ, जिन्हें समाज सामान्यतः त्याज्य मानता है, शिव उन्हें भी स्वीकार करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि शिव की दृष्टि में कुछ भी अपवित्र नहीं है। वे उन सभी को शरण देते हैं जिन्हें दुनिया ठुकरा देती है। महाशिवरात्रि पर चार प्रहर की पूजा का विधान है, जो मनुष्य के जीवन की चार अवस्थाओं और पुरुषार्थों को शुद्ध करने की प्रक्रिया है। प्रत्येक प्रहर में किए जाने वाले विशिष्ट अभिषेक और मंत्रोच्चार भक्त के चित्त की परतों को साफ करते हैं, जिससे सूर्योदय तक वह एक नई ऊर्जा और स्पष्टता के साथ आत्मसात होता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर महाशिवरात्रि भारत की अखंडता और विविधता का जीवंत उदाहरण है। उत्तर में केदारनाथ और काशी विश्वनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक, और पश्चिम में सोमनाथ से लेकर पूर्व में पशुपतिनाथ (नेपाल) तक, पूरा भारतीय उपमहाद्वीप शिवमय हो जाता है। अलग-अलग राज्यों में इस पर्व को मनाने की अपनी विशिष्ट परंपराएँ हैं। कहीं शिव की बारात निकाली जाती है जिसमें लोग भूत-पिशाचों का वेश धारण कर नाचते हैं, जो इस बात का संदेश है कि शिव की छाया में हर प्रकार की विषमता और विचित्रता के लिए स्थान है। कहीं मंदिरों में शास्त्रीय संगीत और नृत्य के माध्यम से भगवान नटराज की स्तुति की जाती है। शिव केवल संहारक नहीं हैं, वे नृत्य, संगीत, व्याकरण और योग के आदि गुरु भी हैं। उनके डमरू से निकले चौदह महेश्वर सूत्रों से ही संस्कृत व्याकरण का जन्म हुआ। अतः यह रात्रि कला और ज्ञान के साधकों के लिए भी अत्यंत फलदायी मानी जाती है। आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव और अवसाद एक बड़ी चुनौती बन गए हैं, तब महाशिवरात्रि का व्रत और ध्यान एक औषधि के समान कार्य करता है। उपवास शरीर को विषमुक्त (डिटॉक्स) करता है, जबकि निरंतर मंत्र जप मन के बिखराव को रोकता है। ‘ॐ नमः शिवाय’ यह पंचाक्षरी मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह पंचतत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को संतुलित करने की एक ध्वनि तरंग है।
महाशिवरात्रि का दर्शन हमें वैराग्य और दायित्व के बीच संतुलन बनाना सिखाता है। शिव अपनी जटाओं में गंगा को धारण करते हैं जो पवित्रता का प्रतीक है, मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं जो शीतलता और समय का प्रतीक है, और कंठ में विष धारण करते हैं जो सहनशीलता का प्रतीक है। उनके हाथ में त्रिशूल है जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों के संतुलन का परिचायक है। यह स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि एक आदर्श मनुष्य वही है जो विकट परिस्थितियों में भी अपना धैर्य न खोए और लोक कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहे। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ गलाकाट प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की प्रधानता है, महाशिवरात्रि हमें ‘सर्वजन हिताय’ का मार्ग दिखाती है। शिव ने कभी महलों की कामना नहीं की, वे खुले आकाश के नीचे बाघंबर ओढ़े हिमालय की चोटियों पर या श्मशान की राख में प्रसन्न रहते हैं। यह सादगी हमें सिखाती है कि सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं बल्कि आंतरिक संतोष और आत्म-साक्षात्कार में है।
अंततः महाशिवरात्रि का यह पावन अवसर हमें आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा देता है। यह वह समय है जब हमें अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी अंधकार को पहचानना चाहिए और शिव की कृपा से उसे ज्ञान की अग्नि में भस्म कर देना चाहिए। जब तक हमारे भीतर ‘स्व’ (अहंकार) जीवित है, तब तक हम शिव के वास्तविक आनंद का अनुभव नहीं कर सकते। जैसे ही हम इस अहंकार की आहुति दे देते हैं, हम स्वयं शिव स्वरूप हो जाते हैं। महाशिवरात्रि की वह गहन काली रात वास्तव में एक अनंत संभावना की सुबह की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। यह हमें यह विश्वास दिलाती है कि चाहे जीवन में कितना भी बड़ा विष क्यों न आ जाए, यदि हम शिव के प्रति समर्पित हैं, तो वह विष भी अमृत में परिवर्तित हो सकता है। यह पर्व हमें शक्ति, भक्ति और मुक्ति का अद्भुत समन्वय प्रदान करता है। ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ के इस शाश्वत मंत्र को अपने जीवन में उतारना ही इस महापर्व की सच्ची सार्थकता है। जो व्यक्ति इस रात्रि की महिमा को समझकर पूर्ण श्रद्धा के साथ इसमें डूबता है, उसे न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि उसे वह परम सत्य भी अनुभूत होने लगता है जो इस नश्वर संसार से परे है। हर हर महादेव का उद्घोष केवल कंठ से नहीं, बल्कि आत्मा के गहरे तल से होना चाहिए, तभी इस महाशिवरात्रि पर हमारा वास्तविक पुनर्जन्म संभव है।
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महाशिवरात्रि: शिव-शक्ति के मिलन और सृष्टि के संतुलन का उत्सव


