लोकतंत्र में चुनाव जनमत का उत्सव होते हैं, लेकिन जब यह उत्सव ‘मुफ्त की रेवडिय़ों’ की प्रतिस्पर्धा में बदलने लगे, तो उसकी शुचिता और गंभीरता दोनों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। पिछले कुछ वर्षों में देश की राजनीति में मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और चुनावी वादों की बाढ़ ने आर्थिक अनुशासन और दीर्घकालिक विकास की दिशा पर गंभीर बहस छेड़ दी है। देश में चुनावी मौसम आते ही राजनीतिक दलों की घोषणाओं की झड़ी लग जाती है। मुफ्त बिजली, पानी, नकद हस्तांतरण, लैपटॉप, स्कूटी, गैस सिलेंडर, यात्रा सुविधा आदि की सूची लंबी होती जाती है। इन वादों को सत्ताधारी दल ‘जनकल्याणकारी योजना’ बताते हैं, तो विपक्ष उन्हें ‘रेवड़ी संस्कृति’ या ‘फ्रीबीज’ कहकर कटघरे में खड़ा करता है। विडंबना यह है कि सत्ता और विपक्ष की अदला-बदली के साथ शब्द बदल जाते हैं, लेकिन तरीका वही रहता है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में मतदाता को लुभाने की यह प्रवृत्ति राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्वाभाविक हिस्सा है, या फिर यह देश की अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए दीर्घकालिक खतरा बनती जा रही है? सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर मुफ्त योजनाओं के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने पूछा कि बिना ठोस आकलन के जनता का पैसा इस तरह बांटना कब तक जारी रहेगा? जरूरतमंदों को सहायता देना राज्य का दायित्व है, परंतु सक्षम और असक्षम के बीच अंतर किए बिना सबको लाभ देना क्या तुष्टीकरण की नीति नहीं है? यह टिप्पणी केवल कानूनी नहीं, बल्कि आर्थिक और नैतिक विमर्श का भी केंद्र बन गई है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर मुफ्त योजनाओं का विस्तार हुआ है। प्रति व्यक्ति कर्ज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कर्ज-जीडीपी अनुपात 2016 के लगभग 67 प्रतिशत से बढक़र 2021 में 89 प्रतिशत तक पहुंचा और अब भी 80-82 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। सरकार का तर्क है कि यह कर्ज बुनियादी ढांचे के निर्माण सडक़, रेलवे, बंदरगाह के लिए लिया गया है। लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं का बढ़ता बोझ भी कर्ज वृद्धि का एक बड़ा कारण है। 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगरिया और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन.के. सिंह जैसे विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि बिना राजस्व संतुलन के मुफ्त सहायता वित्तीय अनुशासन को कमजोर करती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में भी नीति आयोग, वित्त आयोग, रिजर्व बैंक और राजनीतिक दलों से इस पर विचार-विमर्श करने को कहा था, परंतु ठोस समाधान अब तक सामने नहीं आया। बीमारी की पहचान तो हुई, इलाज अब भी अधूरा है। कर्ज का बोझ केवल आंकड़ों की बहस नहीं है। भारत सरकार अपने कुल राजस्व का लगभग 25-30 प्रतिशत हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में खर्च कर देती है। इसका अर्थ है कि हर 100 रुपये की आमदनी में से 25 से 30 रुपये पुराने कर्ज चुकाने में चले जाते हैं। इसके बाद यदि बड़े पैमाने पर मुफ्त योजनाओं का खर्च जोड़ा जाए, तो अस्पताल, स्कूल, शोध, रक्षा और आधारभूत ढांचे के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं। दीर्घकाल में यह विकास की गति को प्रभावित कर सकता है। रिजर्व बैंक की ‘स्टेट फाइनेंस’ रिपोर्ट (2025-26) में भी संकेत दिया गया है कि कई राज्यों में मुफ्त योजनाओं के कारण बजट पर दबाव बढ़ रहा है। कुछ राज्यों में बुनियादी ढांचे पर खर्च कुल बजट के 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है। राज्यों का सामूहिक राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो निर्धारित सीमा से अधिक है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में कर्ज जुटाना भी कठिन हो सकता है। हालांकि, यह भी सच है कि सभी नकद हस्तांतरण या सब्सिडी को ‘रेवड़ी’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने की योजना महामारी और आर्थिक संकट के दौर में राहत का बड़ा साधन बनी। किसान सम्मान निधि या महिलाओं को लक्षित सहायता जैसी योजनाएं सामाजिक सुरक्षा के दायरे को मजबूत करती हैं। सवाल यह नहीं कि सहायता दी जाए या नहीं, बल्कि यह कि किसे, कितनी और किस आधार पर दी जाए। लोकतंत्र में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा नकारात्मक नहीं है। लेकिन जब योजनाएं चुनावी गणित का साधन बन जाती हैं, तब नीति और राजनीति की रेखा धुंधली हो जाती है। चुनाव के ठीक पहले नई योजनाओं की घोषणा, बिना वित्तीय स्रोत स्पष्ट किए, मतदाता को तात्कालिक लाभ तो दे सकती है, पर दीर्घकालिक वित्तीय संकट को जन्म दे सकती है। कर्ज तभी सार्थक है जब वह उत्पादक निवेश में लगे। ऐसा निवेश जो भविष्य में आय बढ़ाए और रोजगार सृजित करे। यदि कर्ज उपभोग आधारित योजनाओं में ही खर्च हो जाए, तो वह विकास का इंजन नहीं, बल्कि बोझ बन जाता है। अर्थशास्त्र का मूल सिद्धांत है कि संसाधन सीमित हैं और जरूरतें असीमित। इसलिए प्राथमिकता और संतुलन अनिवार्य है। रेवड़ी राजनीति का एक नैतिक पहलू भी है। क्या मतदाता को केवल लाभार्थी मान लेना उचित है? लोकतंत्र में नागरिक केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि भागीदार होते हैं। जब राजनीतिक विमर्श ‘कितना मिलेगा’ पर सिमट जाता है, तो ‘कैसा विकास चाहिए’ का प्रश्न पीछे छूट जाता है। इससे नीति-निर्माण का स्तर भी प्रभावित होता है। लगभग हर दल सार्वजनिक रूप से इस प्रवृत्ति की आलोचना करता है, पर सत्ता में आते ही वही रास्ता अपनाता है। परिणामस्वरूप, लोकतंत्र में नीतिगत बहस की जगह तात्कालिक लाभ का आकर्षण हावी होता जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान बड़े-बड़े वादे करना आसान होता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें पूरा करना किसी भी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि राज्य सरकारों को रोजगार सृजन, उद्योगों के विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान देना चाहिए। यदि सरकारें लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय लगातार मुफ्त सहायता देती रहेंगी, तो इससे उत्पादकता और कार्यसंस्कृति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि यदि राजकोषीय अनुशासन की अनदेखी की गई, तो आर्थिक विकास की गति रुक सकती है। यह चेतावनी है कि लोकतंत्र को केवल चुनावी लाभ तक सीमित न किया जाए। भारत को एक ऐसे मॉडल की जरूरत है, जहां कमजोर वर्गों को सुरक्षा मिले, लेकिन साथ ही रोजगार, उद्योग और बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़े। मुफ्त योजनाएं अल्पकालिक राहत दे सकती हैं, लेकिन स्थायी समृद्धि केवल उत्पादक निवेश और रोजगार सृजन से ही संभव है। अब समय है कि राजनीतिक दल, नीति निर्माता और नागरिक सभी मिलकर यह तय करें कि देश को किस दिशा में ले जाना है। क्या हम तात्कालिक लोकप्रियता की राह चुनेंगे, या दीर्घकालिक विकास की? देशहित में तो यही अच्छा होगा कि मुफ्त सुविधाओं की होड़ से बाहर निकलकर नीति आधारित प्रतिस्पर्धा शुरू हो, ताकि लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों सुदृढ़ हो सकें। यही समय की मांग है और यही राष्ट्रहित में है।


