Monday, February 16, 2026
spot_imgspot_img

Top 5 This Week

Related News

यूपी में 2027 की लिखी जा रही पठकथा

-प्रेम शर्मा
केन्द्र में सत्तासीन भाजपा जहॉ एक ओर एसआईआर,यूजीसी और अब एपस्टीप फाइल और पूर्व सेनाध्यक्ष की अप्रकाशित आत्मकथा के मुद्दें में उलझी है वही दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल तेजी से अपना दायरा बढ़ा रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका देते हुए 37 सीटे और विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में 108 विधायकों का जनाधार लेकर चल रही समाज वादी पार्टी उत्तर प्रदेश में बहुत तेजी से भाजपा का विकल्प बनने के लिए आतूर दिख रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) 2022 विधानसभा चुनावों के बाद से लगातार अपना जनाधार बढ़ा रही है, जिसमें पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले ने प्रमुख भूमिका निभाई है। पार्टी ने पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों को जोड़ा है, जिससे भाजपा के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही है। पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एकजुट करने की रणनीति ने पार्टी को मजबूती दी है। पार्टी ने कुर्मी, राजभर, शाक्य और मौर्य जैसी पिछड़ी जातियों के नेताओं को जोड़कर अपनी पैठ बढ़ाई है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ज़मीनी स्तर पर, विशेषकर युवा और ग्रामीण मतदाताओं के बीच सक्रियता बढ़ा रही है। लोकसभा में पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव जिस तरह से आमजनमानस के मुद्दे उठा रहे है उसका सीधा प्रभाव वर्तमान युवा वोटरों पर दिखने लगा है। लेकिन इसका सीटों के इजाफे में कितना फायदा होगा यह समय बतायेगा। राजनैतिज्ञ विशेषज्ञ उत्तर प्रदेश में एम और वाई फैक्टर के पूर्व अनुमानों के आधार पर यही कह रहे है कि उत्तर प्रदेश में 2027 भी सीएम योगी के नाम रहेगा।
वैसे तो 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन ने पार्टी के मनोबल को बढ़ाया है। बसपा सरकार में कई विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी रविवार को अपने समर्थकों समेत सपा में शामिल होना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू ने भी सपा का दामन थाम लिया। यूपी की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल होने पर इसका सीधा असर जिले की राजनीतिक समीकरणों पर पड़ने की प्रबल संभावना है। बांदा जो ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र रहा है। इस नए गठजोड़ से चुनावी परिदृश्य में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी जो कभी बसपा सुप्रीमो मायावती के दाहिने हाथ माने जाते थे, का राजनीतिक अनुभव काफी लंबा और प्रभावशाली रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि आजम खान जैसे प्रमुख मुस्लिम चेहरे की अनुपस्थिति में सपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के मुसलमानों के बीच मजबूत जमीनी नेता की जरूरत थी। नसीमुद्दीन का इन क्षेत्रों में अच्छा प्रभाव है और वे कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं। सपा में उन्हें पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक एजेंडे को मजबूत करने, संगठन विस्तार और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है।
आगामी चुनाव 5 वर्ष के कार्यकाल पूरा होने के बाद 2027 की फरवरी – मार्च 2027 में होने की उम्मीद है. यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर लगभग सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी हैं। यूपी में जिस पार्टी की सरकार बनती है, उसका राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव व्यापक रूप से देखा जाता है. इसका कारण जनसंख्या, लोकसभा सीटों की संख्या और राजनीतिक नेतृत्व की राष्ट्रीय भूमिका से जुड़ा है. इसलिए सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल पहले से ही तैयारी में जुटे हैं। 2027 के चुनाव में कई दल कड़ी टक्कर में रहेंगे जिनमें भारतीय जनता पार्टी , समाजवादी पार्टी , बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल, क्षेत्रीय दल और स्थानीय गठबंधन भी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। बहरहाल आगामी चुनाव में गठबंधन एक बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद है। विपक्षी दल रणनीतिक सीट बंटवारे और संयुक्त अभियान की योजनाओं पर पहले से ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। एक बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनावी मुद्दों में रोजगार और आर्थिक विकास, कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा प्रमुख, किसानों की स्थिति और कृषि नीतियां, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं, बिजली, सड़क और बुनियादी ढांचा, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय विकास की प्रमुख रहने की संभावना है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच बढ़ती कथित दूरी को लेकर सियासी हलचल तेज है। बजट सत्र के संदेश के बाद चर्चाओं ने जोर पकड़ा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि समन्वय कमजोर पड़ा, तो 2027 विधानसभा चुनाव में इसका कुछ हद तक असर दिख सकता है। भाजपा की कार्यशैली में संगठन सर्वाेपरि माना जाता है। सरकार संगठन की नीतियों का क्रियान्वयन करती है। परंतु जब दोनों के बीच सामंजस्य की कमी का आभास होता है, तो संदेश कार्यकर्ताओं तक नकारात्मक रूप में पहुँच सकता है। प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच तालमेल केवल व्यक्तिगत संबंधों का विषय नहीं, बल्कि लाखों कार्यकर्ताओं के मनोबल से भी जुड़ा होता है। वैसे भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां पहले ही भाजपा में कथित अंतर्विरोधों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हैं। यदि यह धारणा बनी रहती है कि शीर्ष नेतृत्व में मतभेद हैं, तो विपक्ष इसे 2027 में चुनावी हथियार बना सकता है। भाजपा के आंतरिक सूत्रों की माने तो विपक्ष की यह रणनीति 2024 लोकसभा चुनाव में मिले सबक से मिली है, जहां जातीय गठजोड़ों ने कुछ सीटों पर असर डाला था, लेकिन योगी सरकार की सख्ती और विकास योजनाओं ने हिंदू वोट बैंक को मजबूत रखा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के राहुल गांधी के बीच हाल की मुलाकातों से गठबंधन की संभावना बनी हुई है, अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर ओबीसी की पार्टी की भूमिका भी इस चुनाव में सामने आएगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, यूपी की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिकी है और बिना इन्हें तोड़े विपक्ष की जीत मुश्किल है। ऐसी स्थिति में बीएस की भूमिका को नकारा नही जा सकता। वैसे भी प्रदेश की 200 सीटों पर बसपा वोटरों की संख्या सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाता है। जबकि भाजपा का वोटर 100 और सपा 70 पर ही महत्वपूर्ण भागीदारी दर्ज कराता है। अब तक लबोलुआब यह कि 2027 चुनाव से पहले यह घमासान विपक्ष की एकजुटता और भाजपा की रणनीति को परखेगा। लेकिन फिलहाल, योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व भाजपा को मजबूत स्थिति में रखता है। इसके बावजूद अगर केन्द्रीय स्तर पर एसआईआर, यूजीसी और अपस्टीन फाइल प्रकरण काफी जोर पकड़ेगा तब भी यह कहना मुश्किल होगा कि योगी के नेतृत्व को चुनौती देना विपक्ष के लिए आसान नही होगा। हालाकि 2027 के चुनाव से एक पहले से जो राजनैतिक पठकथा यूपी में लिखी जा रही है, वह पठकथा उसका परिणाम आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव का आईना होगा।

Popular Coverage