-रोहित माहेश्वरी
मुफ्त की रेवड़ी पर बीती 19 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कारपोरेशन लिमिटेड से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने कहा कि, “हम किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं?” न्यायालय ने पूछा कि क्या राज्यों का काम सिर्फ वेतन देना और मुफ्त उपहार बांटना रह गया है? पीठ ने कहा कि ऐसी नीतियों से लोगों में काम करने की इच्छा खत्म हो रही है और देश का ‘वर्क कल्चर’ खराब हो रहा है।
रेवड़ी संस्कृति देश की राजनीति के केंद्र में आ चुकी है। फ्रीबीज की शुरुआत सन् 1956 से हुई मानी जा सकती है, जब मध्याह्न भोजन योजना पहली बार वर्ष 1956 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज द्वारा शुरू की गई थी। ऐसा माना जाता है कि आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की 2 रुपए किलो चावल योजना ने आज के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की नींव रखी थी। तेलंगाना की रायथु बंधु और ओडिशा की कालिया योजनाओं ने किसानों की सहायता के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अग्रदूत के रूप में कार्य किया है।
दक्षिण भारत से शुरू हुई इस प्रथा को अरविंद केजरीवाल ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। इसका बाद में दूसरे दलों ने अनुसरण किया। एक ओर अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ इस प्रथा की आलोचना करते हैं, तो दूसरी ओर कई नेता मतदाताओं के लिए मुफ्त चीजों की वकालत करते हैं। चुनाव में मुफ्त सुविधाओं के वादे और चुनाव अक्सर इस मायने में जुड़े होते हैं कि राजनीतिक दल अपने घोषणापत्रों में इसका वादा करते हैं, और सत्ताधारी दल अक्सर चुनाव से ठीक पहले उन्हें बांट देते हैं।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से यह जीवन की अच्छी गुणवत्ता से समझौता है, क्योंकि मुफ्त उपहारों की संस्कृति स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, अनुसंधान एवं विकास आदि जैसी अन्य जरूरी आवश्यकताओं पर कम पूंजीगत व्यय को दर्शाती है। साथ ही, यह बजटीय संकट को भी जन्म देती है। 2019 में, दिल्ली स्थित एक गैर-सरकारी संगठन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स द्वारा भारत के 543 संसदीय क्षेत्रों में एक सर्वेक्षण किया गया था। उस सर्वेक्षण के अनुसार, 42 फीसद से अधिक मतदाता किसी विशेष उम्मीदवार को वोट देने के पीछे उम्मीदवार की कल्याणकारी योजनाओं के बजाय नकदी, शराब और मुफ्त उपहारों के वितरण को एक महत्वपूर्ण कारण मानते हैं।
ताजा मामले में न्यायालय ने चिंता जताई कि अधिकांश राज्य पहले से ही ‘रेवेन्यू डेफिसिट’ में हैं, फिर भी वे मुफ्त बिजली, राशन और नकदी बांट रहे हैं। कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा कि इस कारण बुनियादी ढांचे यानी सड़क, स्कूल, अस्पताल के विकास के लिए “एक पैसा भी नहीं बचता”। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि “जरूरतमंदों और गरीबों की मदद करना समझ में आता है, लेकिन बिना भेदभाव के सबको मुफ्त सुविधाएं देना ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ है।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि आखिर रेवडिय़ां बांटने का बोझ टैक्स देने वाले लोगों पर ही पड़ेगा। यदि ‘रेवडिय़ां’ मिलती रहेंगी, तो काम कौन करेगा? आखिर हम यह कैसी संस्कृति बना रहे हैं? सरकारों को ‘मुफ्तखोरी’ के बजाय रोजगार-सृजन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि कोई शिक्षा और बुनियादी जिंदगी का खर्च वहन नहीं कर सकता, तो ऐसे लोगों को सुविधा देना सरकार का दायित्व है, लेकिन ‘मुफ्त रेवडिय़ां’ उनकी जेब में जा रही हैं, जो लोग मजे कर रहे हैं। क्या सरकारों को इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए?
बहरहाल सर्वोच्च अदालत ने मौखिक टिप्पणी कर दी और राजनीतिक दलों के प्रवक्ता कह रहे हैं कि वे शीर्ष अदालत की बात मानने को बाध्य नहीं हैं। ये ‘रेवडिय़ां’ नहीं हैं, बल्कि कल्याणकारी योजनाएं हैं। हम कल्याणकारी लोकतंत्र हैं और जनता की मदद करना हमारा फर्ज है। लिहाजा क्षमा के साथ सर्वोच्च अदालत से भी हमारा सवाल है कि वह मौखिक टिप्पणियां क्यों करती है? सिर्फ चिंता व्यक्त करने से क्या होगा? सर्वोच्च अदालत को संविधान ने विशेषाधिकार भी दिए हैं और उनका इस्तेमाल कर अदालत ने फैसले भी सुनाए हैं, तो मुफ्तखोरी पर आदेश क्यों नहीं दिए जा सकते? अदालत सरकारों को स्पष्ट निर्देश दे कि चुनाव से पहले योजनाओं की घोषणा कब करें? ‘रेवडिय़ों’ को भी परिभाषित करें। 11 अगस्त 2022 को रेवड़ी कल्चर पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, ‘यह मुद्दा समाज और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि फ्रीबीज की वजह से इकोनॉमी पैसे गंवा रही है। हम इस बात से सहमत हैं कि फ्रीबीज और वेलफेयर के बीच अंतर है।
सरकार के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष और परोक्ष करों से आता है, जिनसे सरकार को लिए गए ऋणों पर ब्याज, रक्षा, अनावर्ती व्यय, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, सब्सिडी और जनता के लिए स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं का भुगतान करने में मदद मिलती है। ये योजनाएं तय होती हैं और सरकार के कुल व्यय का एक हिस्सा इन पर खर्च होता है।
जमीनी हकीकत यह है कि देश के राज्यों पर कुल 104 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है। देश पर भी 200.50 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। कुछ विशेषज्ञ इसे 225 लाख करोड़ के करीब मानते हैं। इसके बावजूद रेवडिय़ां बांटी जा रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर कह चुके हैं कि आम आदमी फ्रीबीज नहीं मांगता। रेवडिय़ां देश के विकास के लिए खतरनाक हैं। ये अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकती हैं। इन कथनों के बावजूद हर दल रेवड़ियां बांटने की होड़ में शामिल है।
जिस तमिलनाडु से याचिका शीर्ष अदालत में दी गई थी, उस राज्य पर 10.42 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। बंगाल पर 7.90 लाख करोड़ और केरल पर 5.04 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इन राज्यों में इसी साल अप्रैल के बाद चुनाव होने हैं। जानकारों की मानें तो चुनाव से पहले मुफ्त वादों की घोषणा पर लगाम लगाना जरूरी है, लेकिन यह आसान नहीं है। वोटबैंक की वजह से पॉलिटिकल पार्टियां रिस्क नहीं लेना चाहती है। 4 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने रेवड़ी कल्चर पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि, चुनाव आयोग इस मामले में समय रहते कदम उठाया होता है तो शायद कोई भी राजनीतिक दल ये हिम्मत नहीं करता। लेकिन अब मुफ्त रेवड़ियां बांट कर वोट बटोरना भारत के राजनीतिक दलों का मुख्य हथियार बन गया है।
भारत के निर्वाचन आयोग को चुनावों के दौरान मुफ्त वाली घोषणाओं की प्रभावी निगरानी और उनके विनियमन को सुनिश्चित करने की जरूरत है। नागरिकों को भी अल्पकालिक लाभ से प्रभावित होने के स्थान पर राजनीतिक दलों के दीर्घकालिक विकास एजेंडे के आधार पर मतदान के समय देशहित में निर्णय लेने के लिए शिक्षित किए जाने की जरूरत है। चुनाव जीतने के लिए फ्रीबीज पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय, राजनीतिक दलों को सामाजिक सुरक्षा तंत्रों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, जैसे कि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल, सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली, रोजगार सृजन और व्यापक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, ताकि सामाजिक, आर्थिक असमानता के मूल कारणों का प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सके। रेवड़ी कल्चर एक चुनावी हथकंडा है, जो तात्कालिक लाभ देने के बावजूद दीर्घकालिक रूप से देश की आर्थिक प्रगति में बाधा डालता है। आज राजनीतिक दलों को मुफ्त की घोषणाओं से आगे बढक़र दीर्घकालिक विकास योजनाओं की दिशा में काम करने की जरूरत है।
-स्वतंत्र पत्रकार
रेवड़ी कल्चर पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी और चिंता



