Thursday, February 12, 2026
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वन्दे मातरम्: राष्ट्र चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण

“वन्दे मातरम्” ये दो शब्द सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की आत्मा का गूढ़ और दिव्य उद्गार हैं। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक जड़ है, जो भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान इन चारों को मातृभाव में एक सूत्र में पिरोता है। जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है तो वह केवल मातृभूमि को प्रणाम नहीं करता बल्कि उस चेतना, परंपरा और जीवन दर्शन को नमन करता है जिसने इस देश को हजारों वर्षों से जीवित और गतिशील बनाए रखा है। आज, जब इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के 2026 के नए दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय अपील सामने आई है, तब यह गीत एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित होता दिखाई दे रहा है।
भारतीय सभ्यता में भूमि को केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संसाधनों का समूह नहीं माना गया है। यहां धरती को “माता” कहा गया है, एक ऐसी माता जो जीवन देती है, पोषण करती है और संस्कार प्रदान करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” भारतीय चिंतन की इसी भावना को प्रकट करता है। यह वाक्य बताता है कि मनुष्य और भूमि का संबंध केवल उपयोग का नहीं बल्कि आत्मीयता और मातृत्व का है। यही वैदिक आधार “वन्दे मातरम्” की आत्मा में समाहित है।
जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं था बल्कि एक जीवित मातृशक्ति थी, जो लक्ष्मी के रूप में समृद्धि देती है, सरस्वती के रूप में ज्ञान प्रदान करती है और दुर्गा के रूप में शक्ति का संचार करती है। इसीलिए इस गीत की हर पंक्ति में प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
सन् 1875 का वह काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश शासन का दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव का संकट समाज में गहराई तक समा चुका था। भारतीयों के भीतर अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बचाने की तीव्र आकांक्षा जन्म ले रही थी। इसी समय बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था बल्कि एक जागरण का मंत्र बनकर उभरा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, तब यह गीत पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन गया।
धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण मंत्र बन गया। साल 1905 के बंग भंग आंदोलन के समय “वन्दे मातरम्” हर गली, हर सभा और हर आंदोलन की धड़कन बन गया। विद्यार्थी जुलूसों में यह गूंजता था, महिलाओं की सभाओं में यह प्रेरणा देता था, क्रांतिकारियों के शपथ पत्रों में यह आत्मबल जगाता था और राष्ट्रीय आंदोलनों में यह एकजुटता का स्वर बन जाता था। यह केवल गीत नहीं रहा, यह आत्मगौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा का घोष बन गया।
श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्य भारती, लाला हरदयाल और भीकाजी कामा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी पत्रिकाओं और पत्रों के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” को स्थान दिया। महात्मा गांधी भी अपने कई पत्रों का समापन इसी मंत्र के साथ करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस गीत के प्रभाव को समझा और इसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन जितना दमन हुआ, उतनी ही इसकी शक्ति और बढ़ती गई। यह जनता के हृदय में बस चुका था और वहां से इसे कोई नहीं हटा सकता था।
समय के साथ यह गीत केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति बनकर नहीं रह गया बल्कि भारतीय पहचान का स्थायी प्रतीक बन गया। 30 से 31 अक्टूबर तथा 1 नवम्बर 2025 को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसे राष्ट्र चेतना का मूल स्वरबद्ध गीत बताया। उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्र चेतना को जागृत करता है और समाज को जोड़ने वाली अद्भुत डोर है।” उनके अनुसार यह गीत सभी प्रांतों, भाषाओं और समुदायों के बीच समान रूप से स्वीकार्य है और यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और आत्मस्वत्व का आधार है। संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस 150 वर्ष के पावन काल में “वन्दे मातरम्” की ज्योति हर हृदय में प्रज्ज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया जाए।
इसी संदर्भ में 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार द्वारा घोषित नए दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। इन निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले “वन्दे मातरम्” के सभी छह अंतरों का गायन किया जाएगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड होगी। राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज समारोह, पद्म पुरस्कार और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में इसे गाना अनिवार्य किया गया है। विद्यालयों में भी प्रार्थना की शुरुआत “वन्दे मातरम्” से करने का सुझाव दिया गया है। हालांकि इस संबंध में किसी प्रकार की कानूनी सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है। यह एक दंडात्मक आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में है।
आज के समय में “वन्दे मातरम्” अक्सर केवल दो शब्दों तक सीमित होकर रह जाता है। लोग इसे एक नारे के रूप में बोलते हैं किंतु इसकी वास्तविक महत्ता पूरे गीत में निहित है। ये दो शब्द भावना जगाते हैं, लेकिन पूरा गीत चेतना जगाता है। इसकी संपूर्ण रचना में राष्ट्र चेतना को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करने की क्षमता है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य है, संस्कृति का गौरव है, ज्ञान का प्रकाश है और शक्ति का तेज है। ये चारों तत्व मिलकर इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन दर्शन बना देते हैं।
“वन्दे मातरम्” हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं होता, यह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता होता है। इसकी सेवा कर्तव्य से बढ़कर है, यह तप और साधना है। मातृभूमि सिर्फ भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी चेतना, पहचान और अस्तित्व का आधार है। जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं तो हम उस परंपरा को नमन करते हैं जिसने हमें जन्म दिया, पाला और संस्कारित किया।
इस आधार पर आप यह अवश्‍य अनुभूत करें कि 150 वर्षों के बाद भी यह गीत भारत के भविष्य का मार्गदर्शक है। यह हमें अपने भीतर झांकने, अपनी जड़ों को पहचानने और अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को फिर से जागृत करने का आह्वान करता है। आज जब इसका पूर्ण स्वरूप सम्मानित किया जा रहा है, तब अवश्‍य ही यह केवल इतिहास का सम्मान नहीं है, यह तो भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का संकेत है।
वास्तव में “वन्दे मातरम्” भारत की मूल चिति का शाश्वत लयबद्ध संगीत है। यह उस भाव का प्रतीक है जिसमें विविधता के बीच एकता का दर्शन होता है। यह हमें बताता है कि भारत एक राष्ट्र के साथ ही एक परिवार है, एक ऐसी माता का परिवार जो अपने सभी संतानों को प्रेम, शक्ति, ज्ञान और संस्कार प्रदान करती है। यही भावना इस गीत को अमर बनाती है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्‍तम्‍भकार हैं।)

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