दुनिया पहले ही कई युद्ध चल रहे हैं और इस बीच एक और युद्ध शुरू हो गया है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने मिलकर हमला कर दिया है और उसके जवाब में ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। मिसाइलें अब सीमाओं का लिहाज नहीं कर रहीं, इजरायल, ईरान, यूएई, बहरीन, कतर और सऊदी अरब तक तनाव की आंच पहुंच चुकी है। इस बीच दुनिया कई देश अमेरिका एवं इजरायल के समर्थन में खड़े दिख रहे हैं, तो कई ईरान के साथ देने को तैयार खड़े हैं, इससे एक फिर विश्व युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के विरुद्ध की गई संयुक्त सैन्य कार्रवाई जिसे ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ का नाम दिया है, यह क्षेत्रीय टकराव अब व्यापक युद्ध में बदल सकता है। प्रत्यक्ष हवाई हमले, जवाबी मिसाइल प्रहार, खाड़ी देशों में तनाव और वैश्विक शक्तियों की तीखी प्रतिक्रियाएं यह संकेत दे रही हैं कि यह संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध कितने दिनों तक चलेगा, बल्कि यह है कि इसका दायरा कितना विस्तृत होगा और इसका असर विश्व व्यवस्था पर कितना गहरा पड़ेगा। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच अविश्वास का इतिहास लंबा और जटिल रहा है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव, प्रतिबंधों की राजनीति और प्रॉक्सी संघर्षों ने दशकों से इस रिश्ते को तनावपूर्ण बनाए रखा है, किंतु हालिया घटनाओं ने इस संघर्ष को ‘छाया युद्ध’ से निकालकर खुली जंग में बदल दिया है। जब किसी देश की राजधानी और रणनीतिक ठिकानों पर सीधा हमला होता है और जवाब में क्षेत्रीय सैन्य अड्डों को निशाना बनाया जाता है, तो यह स्पष्ट संकेत होता है कि कूटनीति पीछे छूट चुकी है। इस टकराव का एक मानवीय पक्ष भी है, जो सबसे अधिक चिंताजनक है। युद्ध की आग में आम नागरिक ही सबसे पहले झुलसते हैं। किसी भी स्कूल, अस्पताल या आवासीय क्षेत्र पर हमला केवल सामरिक घटना नहीं होता, बल्कि मानवता की विफलता का प्रतीक बन जाता है। युद्ध में ‘कोलैटरल डैमेज’ शब्द का प्रयोग भले ही तकनीकी हो, पर उसके पीछे टूटते परिवार, भयभीत बच्चे और असुरक्षित भविष्य की कहानियां छिपी होती हैं। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो शरणार्थियों का संकट, खाद्य और दवाओं की कमी तथा क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ेगी। वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रियाएं इस संकट को और जटिल बना रही हैं। रूस ने इस सैन्य कार्रवाई को नई आक्रामकता बताया है, जबकि चीन ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए खतरा करार दिया है। यूरोप का रुख विभाजित है, कुछ देश संयम और संवाद की अपील कर रहे हैं, तो कुछ सुरक्षा चिंताओं के आधार पर अमेरिकी कदम का समर्थन कर रहे हैं। यह विभाजन दर्शाता है कि विश्व राजनीति बहुध्रुवीय हो चुकी है, जहां कोई एक शक्ति सर्वमान्य नैरेटिव स्थापित नहीं कर सकती। खाड़ी क्षेत्र का सामरिक महत्व इस संकट को वैश्विक आयाम देता है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो ऊर्जा कीमतों में उछाल आना लगभग तय है। कच्चे तेल की कीमतें यदि 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं, तो उसका असर केवल तेल आयात करने वाले देशों पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक महंगाई पर भी पड़ेगा। माल ढुलाई महंगी होगी, खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ेंगे और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव आएगा। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से न केवल पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे, बल्कि परिवहन लागत बढऩे से रोजमर्रा की वस्तुओं पर भी असर पड़ेगा। शेयर बाजार में अस्थिरता, विदेशी निवेश की निकासी और रुपये पर दबाव जैसे प्रभाव भी दिखाई दे सकते हैं। हालांकि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और नीतिगत साधन मौजूद हैं, फिर भी दीर्घकालिक अस्थिरता आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती है। इस संघर्ष का परमाणु आयाम सबसे अधिक चिंताजनक है। यदि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर यह टकराव बढ़ता है, तो सैन्य दबाव स्थिति को और उग्र बना सकता है। इतिहास गवाह है कि जब किसी देश को अस्तित्वगत खतरा महसूस होता है, तो वह अपनी सुरक्षा रणनीति को और आक्रामक बना सकता है। ऐसे में क्षेत्रीय हथियारों की होड़ और तेज हो सकती है, जिससे वैश्विक अप्रसार व्यवस्था कमजोर पड़ेगी। इजरायल और अमेरिका का तर्क है कि यह कार्रवाई भविष्य के खतरे को रोकने के लिए आवश्यक थी। उनके अनुसार, यदि संभावित परमाणु या मिसाइल खतरे को समय रहते निष्क्रिय नहीं किया गया, तो भविष्य में बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है। दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ‘पूर्व-निवारक हमला’ तभी उचित ठहराया जा सकता है जब तत्काल खतरे के स्पष्ट प्रमाण हों। संयुक्त राष्टï्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की व्याया को लेकर यही बहस इस समय वैश्विक मंचों पर जारी है। मुस्लिम देशों की स्थिति भी दुविधापूर्ण है। कुछ खाड़ी देश ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव से असहज रहे हैं, पर वे व्यापक युद्ध से भी बचना चाहते हैं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग स्थिरता पर निर्भर हैं। यदि संघर्ष उनके भूभाग तक फैलता है, तो निवेश और व्यापार पर गहरा असर पड़ेगा। यही कारण है कि कई देश सार्वजनिक रूप से संयम की अपील कर रहे हैं, भले ही परदे के पीछे रणनीतिक गणनाएं जारी हों। इतिहास के संदर्भ में देखें तो क्षेत्रीय संघर्ष कई बार वैश्विक युद्ध का रूप ले चुके हैं। प्रथम विश्व युद्ध बाल्कन क्षेत्र की चिंगारी से शुरू हुआ था, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध यूरोप में आक्रामक विस्तार से भड़का। आज मध्य पूर्व ऊर्जा, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक टकराव का संगम है। यदि महाशक्तियां प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आती हैं, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है। फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि हर बड़ा संघर्ष विश्व युद्ध में बदल ही जाएगा। आधुनिक विश्व में आर्थिक परस्पर निर्भरता, वैश्विक संस्थाएं और परमाणु प्रतिरोध जैसे कारक युद्ध को सीमित रखने में भूमिका निभाते हैं। वैश्विक बाजारों की अस्थिरता स्वयं महाशक्तियों पर दबाव डालती है कि वे स्थिति को नियंत्रित करें। ऊर्जा संकट और वित्तीय उथल-पुथल किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं। इस समय सबसे बड़ी आवश्यकता है कूटनीति की वापसी। युद्ध की भाषा से अधिक प्रभावी संवाद की भाषा होती है। क्षेत्रीय मध्यस्थ, संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ या अन्य बहुपक्षीय मंच यदि सक्रिय भूमिका निभाएं, तो तनाव कम करने का रास्ता निकल सकता है। विश्वास बहाली के उपाय, युद्धविराम की पहल और मानवीय गलियारों की स्थापना जैसे कदम तत्काल प्राथमिकता होने चाहिए। भारत सहित अन्य जिक्वमेदार देशों को संतुलित रुख अपनाते हुए शांति की वकालत करनी चाहिए। लेकिन इसमें कोई कोई दोमत नहीं है कि आज दुनिया विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है। यदि रूस,चीन और मुस्लिम देश खुलकर ईरान के समर्थन में आते हैं, तो दुनिया दो गुटों में बंट जायेगी। आने वाले सप्ताह और महीने तय करेंगे कि यह संघर्ष सीमित रहेगा या वैश्विक उथल-पुथल का कारण बनेगा। लेकिन अभी भी विकल्प मौजूद हैं। यदि संवाद और संयम को प्राथमिकता दी जाए, तो यह संकट सीमित रह सकता है। अन्यथा इतिहास एक बार फिर हमें यह याद दिला सकता है कि युद्ध की कीमत अंतत: पूरी मानवता को चुकानी पड़ती है।


