Monday, February 9, 2026
spot_imgspot_img

Top 5 This Week

Related News

सदनों में जनता के प्रति जनप्रतिनिधियों का रवैया

-प्रेम शर्मा
भारत में मुख्य जनप्रतिनिधियों में लोकसभा के 543 निर्वाचित सांसद और राज्यसभा के 245 (233 निर्वाचित $ 12 मनोनीत) सदस्य शामिल हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा, राज्यों की विधानसभाओं में कुल 4,120 विधायक होते हैं। 18वीं लोकसभा (2024-2029) में कुल 543 सांसद चुने गए हैं। यानि देश का केन्द्र एवं राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वालों की संख्या कम नही है। लेकिन सत्तापक्ष औंर विपक्ष जिस तरह से सदन में जनभावनाओं से प्रेरित, देश विकास में समर्पित मुद्दों से भटककर आरोप प्रत्यारोप में सदन का वक्त जाया करने के साथ जनता की गाढ़ी कमाई बरबाद करता है वह वाकई जनता के लिए पीड़ा कारी है। एक आकड़े के अनुसार एक घंन्टे अगर केन्द्र सरकार के सदन में हंगामा हो जाए तो 1.5 करोड़ और विधानसभाओं में लगभग 25 से 50 लाख रूपये बरबाद होते है जो जनता के टैक्स का पैसा होता है। यह स्थिति केवल संसद में नही बल्कि विधानसभाओं में भी लगातार जारी है। एक समय था कि जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन दलगत पार्टी से हटकर जनहित में निभाते थे। अब योजनाओं पर विचार करने के बजाय कुछ ऐसे मुद्दों पर बस चल रही है। अब हमें यह कहने में संकोच होता है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है। यह वही भारतीय संसद है जहां 1950 के दशक में एक नए सांसद अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना पर प्रधानमंत्री जी विचलित नहीं हुए बल्कि उस युवा सांसद के पास जाकर उसके भाषण की तारीफ की और यह कह दिया कि तुम एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री बनोगे और वही युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी जब देश का विदेश मंत्री बना तो उसने देखा कि उनके कार्यालय जो साउथ ब्लॉक में स्थित था से नेहरू जी की फोटो गायब थी जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई और पंडित नेहरू की फोटो वहां पर फिर लगवा दी गई। यह वही भारत है जब 1991 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का पक्ष रखने के लिए अपनी पार्टी से कोई नहीं मिला तो उन्होंने नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा। आज लोकसभा और राज्यसभा से लेकर विधानसभाओं तक में बहस का स्तर इतना गिर गया है की समझ में नहीं आ रहा कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली कहां जा रही है।संसद और विधानसभओं में बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बिजली और पानी की कमी, बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित मुद्दों को लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ मजबूती से उठाया जाना चाहिए।संसद में जनहित के मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन चर्चा के बजाय हंगामा और असंबंधित बातों से कार्यवाही बाधित करना पूरी तरह गलत है। सत्ता पक्ष और विपक्ष जन मुद्दों को छोड़कर एक दूसरे के चरित्र, कमजोरी लेकर जो दंगल कर रहे है वह ठीक नही है। देश की जनता सब देख रही।
आज भारत की संसद और विधानसभाओं में हंगामा है। देश को चलाने वाले नेता एक दूसरे पर लांछन लगा रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि लोकतंत्र को चलाना उनका दायित्व है. पहले संसद का, फिर लोकतंत्र का मखौल उड़ाकर, प्रतिष्ठा गिराकर उनका भी लाभ नहीं होगा।जनप्रतिनिधियों को सदन की गरिमा बनाए रखते हुए जनभावनाओं और जनता के विश्वास को याद रखना अनिवार्य है। उन्हें शोर-शराबे और नियोजित गतिरोध के बजाय सार्थक चर्चा और संवाद के माध्यम से व्यापक जनहित के मुद्दों का समाधान करना चाहिए। संसद और विधानसभा संवाद और विकास का मंच है, जहाँ जनप्रतिनिधियों का दायित्व जनभावनाओं को आवाज देना है, न कि व्यवधान डालना। सदनों की मर्यादा के अनुकूल आचरण करना और देश की अपेक्षाओं को पूरा करना प्रत्येक निर्वाचित सदस्य का प्राथमिक कर्तव्य है।जनकल्याण की प्रतिबद्धतारू जनप्रतिनिधियों को निर्वाचित क्षेत्र और संपूर्ण राष्ट्र के विकास के लिए समर्पित रहकर कर्म करना चाहिए। अगर ये नेता लोकतंत्र की रक्षा न कर सकें तो उन्हें सार्वभौम अधिकार लेने का कोई हक नहीं. लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाना उनका मकसद नहीं होना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में जाने वाली देश की प्रमुख पार्टियां हैं, जो बदल बदल कर सरकार चलाती हैं। उन्हें सदन में और सदन के बाहर अपने आचरण पर विचार करना चाहिए। देश में ही नहीं विदेशों में भी उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। वैसे तो राजनीति का अभिप्राय राजकाज चलाने वाली नीति से है। इसकामकसद समतामूलक सुसभ्य समाज का निर्माण करना और देश के चहुंमुखी विकास में योगदान देना है। लेकिन दुर्भाग्य से अपने देश में राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यह क्षरण कहां जाकर थमेगा, पुख्ता तौर पर कोई नहीं कह सकता। यह गिरावट एक दिन में नहीं आयी है। आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं और नीति नियंताओं ने काफी सोच-विचार कर समाज और देश के विकास का सपना देखा था। तब हमारी गिनती एक लुटे-पिटे गरीब देशों में होती थी। आज हम विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होने का दावा करते हैं, लेकिन नैतिक तौर पर तेजी से पाताल की ओर गिरते जा रहे हैं। सबसे खास बॉत यह कि आज का दौर डिजीटल मीडिया और सोशल मीडिया का दौर है। इस दौर में सामान्य विधायक से लेकर खास विधायक सांसद, मंत्री, नेता सदन, नेता विपक्ष, स्पीकर तथा अन्य जिम्मेदारों की बॉत, हावभाव किसी ना किसी तरीके से आम जनता को देखने,सुनने मिल जाते है। उनका पक्षपात, जनता के प्रति गैरजिम्मेदारी भरा बयान या हरकत सबकुछ रिकार्ड होती रहती है इसके बावजूद सत्तापक्ष और जिस तरह जनविरोधी आचरण सदनों में कर रहा है वह भगवान तुल्य कहे जाने वाले मतदाता और आम जनता के साथ सीधे धोखा है। यानि इतना तय है कि जनता के प्रति अपनी जबाबदेही के लिए पक्ष विपक्ष अपने आप को अलग नही बता सकता।

(स्वतंत्र पत्रकार रोहित माहेश्वरी)

Popular Coverage