भारत ने सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान के साथ गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। यह कदम न केवल पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देने जैसा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत अब किसी भी तरह के बाहरी दबाव में झुकने वाला नहीं है। हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने संधि के तहत नई सुनवाई और दस्तावेजों के आदेश जारी किए हैं, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह इन कार्यवाहियों की वैधता को नहीं मानता और इसमें भाग नहीं लेगा। अगर देखा जाए तो हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत और भारत के बीच टकराव अब केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों, संप्रभुता की व्याक्चया और आतंकवाद के खिलाफ भारत की नई नीति का प्रतीक बन चुका है। सिंधु जल संधि, जिसे दशकों तक भारत-पाकिस्तान संबंधों की सबसे स्थिर कड़ी माना जाता था, आज रणनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। सिंधु जल संधि पर भारत का ताजा रुख सिर्फ एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि दशकों पुरानी नीति में आया एक निर्णायक मोड़ है। भारत ने साफ शब्दों में कह दिया है कि जब उसने स्वयं सिंधु जल संधि को स्थगित कर रखा है, तो उस संधि के तहत बनी किसी भी संस्था चाहे वह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ही क्यों न हो, की वैधता को वह नहीं मानता। यह संदेश न सिर्फ पाकिस्तान के लिए है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी कि भारत अब आधे-अधूरे समझौतों और एकतरफा दबाव की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगा। कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन द्वारा नीदरलैंड्स के पीस पैलेस में सुनवाई तय करना और भारत से बगलिहार व किशनगंगा परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेज मांगना, भारत की संप्रभुता के दायरे में सीधा हस्तक्षेप है। भारत का यह कहना पूरी तरह तार्किक है कि जब मूल संधि ही स्थगित है, तो उससे निकली किसी प्रक्रिया में भाग लेने की बाध्यता कैसे हो सकती है। संधि को निलंबित करने का अर्थ यही है कि उससे जुड़ी सभी संस्थागत व्यवस्थाएं भी फिलहाल अप्रासंगिक हो जाती हैं। अगर देखा जाए तो भारत का रुख केवल कानूनी नहीं, बल्कि सिद्धांतों पर आधारित है। सिंधु जल संधि में यह स्पष्ट प्रावधान है कि तकनीकी विवादों के समाधान के लिए ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ की व्यवस्था होगी, न कि किसी तरह की न्यायिक अदालत। न्यूट्रल एक्सपर्ट कोई कोर्ट नहीं होता, बल्कि एक स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ होता है, जो पानी के बहाव, भंडारण, डिजाइन और संचालन जैसे सवालों पर राय देता है। बगलिहार और किशनगंगा जैसे प्रोजेक्ट्स से जुड़े विवाद मूलत: तकनीकी हैं, जिन्हें अदालत के मंच पर ले जाना संधि की मूल भावना के खिलाफ है। पाकिस्तान की रणनीति शुरू से ही इस संधि को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की रही है। जब भी भारत जक्वमू-कश्मीर में कोई जलविद्युत परियोजना आगे बढ़ाता है, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाने लगता है। जबकि हकीकत यह है कि भारत ने अब तक संधि के प्रावधानों का बेहद संयमित और जिक्वमेदार तरीके से पालन किया है। भारत ने कभी भी पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने या मोडऩे की कोशिश नहीं की, बावजूद इसके पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। हकिकत यही है कि पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जो भारत के विरुद्ध षड्यंत्र रचने से कतई बाज नहीं आता है। दरअसल इस इस विवाद की जड़ें 23 अप्रैल 2025 के उस ऐतिहासिक फैसले में हैं, जब पहलगाम में पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादियों द्वारा 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या के ठीक एक दिन बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया। 1960 के बाद यह पहला मौका था जब भारत ने जल सहयोग को सीधे तौर पर पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थित नीति से जोड़ा। ऑपरेशन सिंदूर के साथ लिया गया यह निर्णय भारत की पाकिस्तान नीति में एक निर्णायक बदलाव का संकेत था, यह संदेश साफ था कि निरंतर शत्रुता के माहौल में सहयोग सामान्य रूप से जारी नहीं रह सकता। पाकिस्तान के लिए यह झटका केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत है। उसकी लगभग 80 से 90 प्रतिशत कृषि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। देश की जल भंडारण क्षमता बेहद सीमित है और प्रमुख जलाशय तरबेला और मंगला कथित तौर पर लगभग निष्क्रिय अवस्था में हैं। ऐसे में सिंधु जल संधि, जो कभी एक तकनीकी और अपेक्षाकृत निष्पक्ष व्यवस्था मानी जाती थी, अब पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा और भारत के लिए एक रणनीतिक दबाव बिंदु बन चुकी है। 23 अप्रैल 2025 को भारत ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद का हवाला देते हुए सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से सस्पेंड करने की घोषणा की थी। यह एक असाधारण कदम था, क्योंकि संधि में औपचारिक ‘निलंबन’ का प्रावधान स्पष्ट रूप से नहीं है। भारत का तर्क था कि जब संधि का मूल आधार, आपसी भरोसा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व लगातार आतंकवादी हमलों से कमजोर किया जा रहा हो, तब संधि को यथावत लागू रखना व्यावहारिक और नैतिक दोनों दृष्टि से कठिन हो जाता है। सीमापार आतंकवाद ने न केवल नागरिकों और सुरक्षाबलों की जान ली है, बल्कि किसी भी तरह के दीर्घकालिक भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय केवल जल के तकनीकी पहलुओं पर चर्चा कर सकता है और उस व्यापक सुरक्षा संदर्भ को नजरअंदाज कर सकता है, जिसमें यह विवाद पनप रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब पानी की मात्रा, डैम के डिजाइन या लॉगबुक तक सीमित नहीं रहा। यह भारत-पाकिस्तान संबंधों में भरोसे के क्षरण, क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की सीमाओं का प्रतीक बन गया है। भारत यह संकेत दे रहा है कि वह अब पुराने ढांचों को यांत्रिक रूप से स्वीकार करने के बजाय, उन्हें राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के चश्मे से परखेगा। हालांकि आगे का रास्ता आसान नहीं है। न तो पूर्ण टकराव किसी के हित में है और न ही बिना शर्त यथास्थिति। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के सवाल पर समझौता किए बिना, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझा सके कि उसका रुख नियम-विरोधी नहीं, बल्कि परिस्थितियों से प्रेरित है। वहीं पाकिस्तान के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है कि क्या वह वास्तव में जल जैसे जीवन-मरण के मुद्दे को आतंकवाद से अलग रख सकता है, जबकि उसकी नीतियां भरोसे को लगातार कमजोर कर रही हैं। अंतत: सिंधु जल संधि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या दोनों देश केवल कानूनी दावों से आगे बढक़र, व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। पानी जीवन का स्रोत है, लेकिन भरोसा उसका आधार। और जब आधार ही हिल जाए, तो सबसे मजबूत संधि भी दरारें दिखाने लगती है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करता है, लेकिन अपनी सुरक्षा, विकास और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। अगर पाकिस्तान को पानी चाहिए, तो उसे पहले खून बहाना बंद करना होगा। सिंधु का पानी बहता रहेगा, लेकिन अब भारत की शर्तों और उसके आत्मसम्मान के साथ।



