-पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
स्त्री की अस्मिता केवल एक दार्शनिक या साहित्यिक अवधारणा नहीं है; यह उसके अस्तित्व, सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्णय की संपूर्ण पहचान है। जब हम “स्त्री अस्मिता” की बात करते हैं, तो हम केवल उसके सामाजिक स्थान की चर्चा नहीं कर रहे होते, बल्कि उस संपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष को स्वीकार कर रहे होते हैं जिसके माध्यम से स्त्रियों ने स्वयं को परिभाषित किया है। वैश्विक स्तर पर बीते सौ वर्षों का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि स्त्रियों ने शिक्षा, मताधिकार, समान वेतन, संपत्ति अधिकार, प्रजनन अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर निरंतर संघर्ष किया है। यह संघर्ष केवल पुरुषों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन संरचनात्मक असमानताओं के विरुद्ध रहा है जो सदियों से समाज में जड़ें जमाए हुए थीं।
बीसवीं सदी की शुरुआत में यूरोप और अमेरिका में मताधिकार आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि स्त्री अस्मिता का पहला आधार राजनीतिक अधिकार है। 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्नीसवां संशोधन लागू हुआ, जिससे महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। इसी प्रकार कई यूरोपीय देशों में भी धीरे-धीरे महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ। भारत में स्वतंत्रता के बाद संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया, जिसने स्त्रियों को राजनीतिक रूप से समान नागरिक का दर्जा दिया। यह ऐतिहासिक परिवर्तन केवल कानून में संशोधन नहीं था; यह स्त्री अस्मिता की औपचारिक मान्यता थी।
फिर भी, अधिकारों की संवैधानिक स्वीकृति और वास्तविक सामाजिक समानता के बीच की दूरी आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। संयुक्त राष्ट्र की “जेंडर इनइक्वैलिटी इंडेक्स” रिपोर्टें लगातार यह संकेत देती हैं कि विश्व के अधिकांश देशों में लैंगिक असमानता अब भी व्यापक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसर और राजनीतिक प्रतिनिधित्व—इन सभी क्षेत्रों में स्त्रियों को बराबरी का अवसर नहीं मिला है। विश्व आर्थिक मंच की “ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट” भी बताती है कि आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अंतर अभी भी काफी है। यह आँकड़े हमें याद दिलाते हैं कि अस्मिता की लड़ाई अभी अधूरी है।
वैश्विक संघर्षों—चाहे वे युद्ध हों, आर्थिक संकट हों या जलवायु परिवर्तन—का प्रभाव स्त्रियों पर विशेष रूप से पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) की रिपोर्टें बताती हैं कि युद्ध और विस्थापन की स्थितियों में महिलाएँ और लड़कियाँ यौन हिंसा, मानव तस्करी और स्वास्थ्य संकट के जोखिम से अधिक प्रभावित होती हैं। उदाहरण के लिए, सीरिया, अफगानिस्तान और यूक्रेन जैसे संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में विस्थापित महिलाओं की संख्या लाखों में है। विस्थापन केवल भौगोलिक बदलाव नहीं होता; यह अस्मिता और सुरक्षा दोनों पर गहरा आघात करता है। जब स्त्री अपने घर, समुदाय और संसाधनों से कट जाती है, तो उसका सामाजिक आधार कमजोर पड़ जाता है।
अफगानिस्तान का उदाहरण वैश्विक विमर्श में बार-बार सामने आता है। वहाँ शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी पर लगाए गए प्रतिबंधों ने यह दिखाया कि राजनीतिक सत्ता परिवर्तन स्त्री अधिकारों को किस हद तक प्रभावित कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन प्रतिबंधों को स्त्री अस्मिता के विरुद्ध कदम बताया है। यह स्थिति केवल एक देश की नहीं, बल्कि उस वैश्विक चुनौती की प्रतीक है जिसमें राजनीतिक अस्थिरता का सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है।
आर्थिक वैश्वीकरण ने भी स्त्री अस्मिता को नई दिशा दी है। एक ओर वैश्विक बाज़ार और तकनीकी प्रगति ने महिलाओं को रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर दिए हैं; दूसरी ओर असंगठित श्रम, कम वेतन और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों की समस्या भी बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के आँकड़े बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर महिलाओं की श्रम भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में कम है और वेतन अंतर अभी भी मौजूद है। आर्थिक स्वतंत्रता स्त्री अस्मिता का महत्वपूर्ण स्तंभ है, क्योंकि बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता के निर्णय की स्वतंत्रता अधूरी रहती है।
डिजिटल युग में स्त्री अस्मिता ने एक नया आयाम प्राप्त किया है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने महिलाओं को अपनी आवाज़ वैश्विक स्तर पर पहुँचाने का माध्यम दिया है। #MeToo आंदोलन इसका एक सशक्त उदाहरण है, जिसने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मुद्दे को वैश्विक विमर्श का केंद्र बना दिया। यह आंदोलन दर्शाता है कि जब स्त्रियाँ सामूहिक रूप से अनुभव साझा करती हैं, तो सत्ता संरचनाओं को भी जवाबदेह होना पड़ता है। हालांकि डिजिटल माध्यम ने अभिव्यक्ति का अवसर दिया है, परंतु ऑनलाइन उत्पीड़न और साइबर हिंसा की समस्या भी बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें संकेत करती हैं कि ऑनलाइन हिंसा महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को सीमित कर सकती है।
जलवायु परिवर्तन भी एक वैश्विक संघर्ष है, जिसका प्रभाव लैंगिक दृष्टि से असमान है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और अन्य एजेंसियों ने यह रेखांकित किया है कि जलवायु आपदाओं के दौरान महिलाएँ और लड़कियाँ संसाधनों की कमी, खाद्य असुरक्षा और स्वास्थ्य संकट से अधिक प्रभावित होती हैं। ग्रामीण और विकासशील देशों में जल संग्रहण, कृषि और घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर होती है; इसलिए पर्यावरणीय संकट उनके श्रम और स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। यह स्थिति दिखाती है कि वैश्विक समस्याएँ लैंगिक आयाम के बिना समझी नहीं जा सकतीं।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व स्त्री अस्मिता का एक और महत्वपूर्ण आयाम है। विश्व स्तर पर संसदों में महिलाओं की औसत भागीदारी अभी भी लगभग एक-चौथाई के आसपास है, यद्यपि कई देशों ने कोटा प्रणाली या आरक्षण के माध्यम से सुधार किया है। भारत में भी हाल ही में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान पारित किया गया है, जो लागू होने पर राजनीतिक भागीदारी में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकता है। प्रतिनिधित्व केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि नीति निर्माण में स्त्री दृष्टिकोण के समावेश का प्रश्न है।
सांस्कृतिक स्तर पर भी स्त्री अस्मिता निरंतर पुनर्परिभाषित हो रही है। साहित्य, सिनेमा, कला और मीडिया में महिलाओं की छवि बदल रही है। परंपरागत रूढ़ियों से हटकर स्वतंत्र, निर्णयशील और आत्मविश्वासी स्त्री की छवि उभर रही है। फिर भी, कई समाजों में पितृसत्तात्मक मान्यताएँ गहराई से जमी हुई हैं। बाल विवाह, दहेज प्रथा, ऑनर किलिंग और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे अभी भी मौजूद हैं। ये केवल सामाजिक कुरीतियाँ नहीं, बल्कि अस्मिता के विरुद्ध हिंसा के रूप हैं।
शिक्षा स्त्री अस्मिता के संघर्ष का मूल आधार है। यूनिसेफ और यूनेस्को की रिपोर्टें दर्शाती हैं कि विश्व स्तर पर बालिकाओं की प्राथमिक शिक्षा में भागीदारी बढ़ी है, परंतु माध्यमिक और उच्च शिक्षा में अंतर अभी भी कई क्षेत्रों में बना हुआ है। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं देती; यह आत्मविश्वास, आलोचनात्मक सोच और सामाजिक भागीदारी का आधार बनाती है। जब एक लड़की शिक्षा से वंचित होती है, तो उसका आर्थिक और सामाजिक भविष्य सीमित हो जाता है।
इन सभी आयामों के बीच यह समझना आवश्यक है कि स्त्री अस्मिता का संघर्ष केवल बाहरी अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि आत्मस्वीकृति और आत्मनिर्णय के लिए भी है। अस्मिता का अर्थ है अपनी पहचान को स्वयं परिभाषित करने का अधिकार—चाहे वह करियर हो, परिवार हो, या जीवनशैली। वैश्विक संघर्षों के बीच यह अधिकार बार-बार चुनौती का सामना करता है, परंतु इतिहास यह भी दिखाता है कि स्त्रियों ने हर चुनौती के सामने प्रतिरोध और पुनर्निर्माण का मार्ग खोजा है।
आज जब विश्व बहुस्तरीय संकटों—युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और डिजिटल असमानता—से जूझ रहा है, तब स्त्री अस्मिता का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि नीतियाँ लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील हों, यदि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ समान रूप से उपलब्ध हों, यदि कार्यस्थल सुरक्षित और सम्मानजनक हों, और यदि समाज संवाद और समानता के मूल्यों को अपनाए, तो वैश्विक संघर्षों के बीच भी स्त्री की अस्मिता सशक्त रह सकती है।
अंततः, स्त्री अस्मिता का संघर्ष मानवाधिकार का संघर्ष है। यह केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता और लोकतांत्रिक परिपक्वता की कसौटी है। जब स्त्री सम्मान, सुरक्षा और निर्णय की स्वतंत्रता के साथ जीवन जीती है, तभी समाज सच्चे अर्थों में प्रगतिशील कहा जा सकता है। वैश्विक संघर्षों के इस दौर में आवश्यकता है कि हम अस्मिता को केंद्र में रखकर विकास और शांति की परिकल्पना करें। क्योंकि जब तक आधी आबादी की पहचान सुरक्षित और सशक्त नहीं होगी, तब तक वैश्विक शांति और समावेशी विकास का सपना अधूरा रहेगा।
(संस्थापक-निदेशक-अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन एवं न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन)
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