प्रेम शर्मा
अक्सर प्रकृति के संतुलन बिगाड़ने के विनाशकारी परिणाम सामने आते हैै। बेमौसम बारिश, सूखा, बाढ़, ग्लोबल वार्मिंग और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ इसके घातक परिणाम है। इंसान के लालच और अंधाधुंध दोहन का नतीजा, प्रकृति के नियमों को तोड़ने पर होने वाले प्रलय या असंतुलन को दर्शाता है, जिसके कारण मानव जाति को भयानक परिणाम भुगतने पड़ते है।प्रकृति एक नाजुक संतुलन पर टिकी है, और इंसान जब अपने स्वार्थ के लिए इस संतुलन को बिगाड़ता है, तो प्रकृति अपना हिसाब बराबर करती है। अब हिमाचल प्रदेश में हिम अकाल एक गंभीर खतरे के रूप में हमारे सामने है। जो कम बर्फबारी, तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव के कारण बन रहा है, जिससे जल स्रोतों, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो रहा है और निकट भविष्य में पारिस्थितिक आपदा की आशंका बढ़ गई है, क्योंकि नदियाँ सूख रही हैं और ज़मीन का सुरक्षा कवच कमजोर हो रहा है, जिससे सूखा, आग और अन्य आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। ज्ञात हो कि 1990 के दशक की तुलना में शिमला में बर्फबारी लगभग 37 प्रतिशत कम हो गई है, यही नही दिसंबर 2022, 2023, 2024 पूरी तरह सूखे रहे हैं। ऊंचे पहाड़, बुग्याल (घास के मैदान) और प्रसिद्ध तीर्थ स्थल (जैसे केदारनाथ, औली) बर्फ के बजाय सूखे और वीरान दिख रहे हैं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ के बजाय हल्की कोहरे की परत जम रही है, जिससे वनस्पति और मिट्टी को नुकसान हो रहा है। नाजुक जैव-नेटवर्क और वन्यजीवों पर विपरीत असर पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें नमी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में ग्राउंडवाटर रिचार्ज नहीं हो रहा, नदियां सूख रही हैं और रबी फसलों को नमी नहीं मिल पा रही है।पर्यटन, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है, जिससे सूखे की स्थिति बन सकती है। सर्दियों में बर्फ और बारिश लाने वाले ये सिस्टम कमजोर पड़ रहे हैं।जलवायु परिवर्तन इसका मुख्य कारण है, जिससे मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। बर्फबारी और बारिश लेटलतीफी से आपदाओं को नकारा नही जा सकता। हिमाचल में प्रकृति का जो रूप दिख रहा है उसके परिणाम स्वरूप सूखे के कारण आग लगने और अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।
कुल मिलाकर, हिमाचल में कम बर्फबारी सिर्फ एक मौसम की विसंगति नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और हिम अकाल का संकेत है, जो पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। वैसे भी देश इस सर्दी एक असामान्य और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। वैसे तो दिसंबर और जनवरी के महीनों में हिमालयी राज्यों में बारिश और बर्फबारी से पहाड़ ढक जाते हैं। इस बार स्थिति इसके ठीक विपरीत है। मौसम विभाग आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में दिसंबर और जनवरी में एक बूंद बारिश नहीं हुई, हिमाचल प्रदेश में दिसंबर 1901 के बाद यानी पिछले सवा सौ सालों में छठी सबसे कम बारिश दर्ज की गई। जम्मू-कश्मीर में जनवरी में बेहद कम बारिश और बर्फबारी हुई है। इसके परिणाम स्वरूप इस सर्दी हिमालय की चोटियां असामान्य रूप से बिना बर्फ की नजर आई।यह केवल मौसमीय विचलन नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, कृषि उत्पादकता, जंगलों में आग और जलवायु अनिश्चितता से जुड़ा गंभीर संकेत हैैं। हिमालय चुपचाप चेतावनी दे रहा है, ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या पहाड़ों की वेदना सुन, समझ पा रहे हैं ?
जनवरी के पहले पखवाड़े में देश को सामान्य से चार गुना कम बारिश मिली. इस अवधि में जहां सामान्य तौर पर जितनी बारिश होनी चाहिए थी, उसका एक-चौथाई से भी कम दर्ज किया गया। सबसे गंभीर स्थिति उत्तर-पश्चिम भारत की रही। जबकि इस अवधि में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सिर्फ 8 प्रतिशत बारिश ही हो पाई। देहरादून के निदेशक सी. एस. तोमर बता चुके है कि उत्तराखंड में पिछले एक दशक से सर्दियां लगातार सूखी होती जा रही हैं। उनके अनुसार पिछले 10 वर्षों में चार बार ऐसा हुआ है जनवरी में न के बराबर बारिश हुई। उनके अनुसार यह अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है। 2024-25 की सर्दियों में उत्तर-पश्चिम भारत में 96 प्रतिशत तक बारिश की कमी बेहद चिंताजनक है। वैसे तो सामान्य तौर पर सर्दियों में उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में पश्चिमी विक्षोभ के कारण हल्की से मध्यम बारिश होती है। यही बारिश गेहूं, सरसों, चना के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। पहाड़ों में बर्फ और बारिश भूजल भंडार को रिचार्ज करती है. नदियों को गर्मियों तक पानी देने में यही बर्फ पिघलकर अहम भूमिका निभाती है। लेकिन इस बार यही प्रक्रिया कमजोर पड़ती दिख रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सर्दी पश्चिमी विक्षोभ तो आए, लेकिन असर नहीं दिखा पाए। दिसंबर में जहां सामान्य तौर पर 6 पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, इस बार 8 सिस्टम गुजरे, लेकिन बारिश नहीं करा सके। इसके पीछे कई कारण में पश्चिमी विक्षोभ में नमी की कमी, कम दबाव का क्षेत्र (ट्रफ) उथला होना शामिल है। इन्ही कारणों से नमी ऊपर नहीं उठ पाई, सिस्टम का उत्तर की ओर ऊंचे अक्षांशों में गुजरना, जिससे कश्मीर और हिमाचल में थोड़ी नमी गिरी, लेकिन उत्तराखंड तक पहुंच ही नहीं पाई और भारत पहुंचते-पहुंचते सिस्टम की गति कमजोर पड़ गई, जिससे उसका ठहराव कम हो गया। यह परिवर्तन इतना विस्तृत रहा कि भारत के साथ-साथ नेपाल में भी सूखी सर्दी देखने को मिल रही है। यह इस बात का संकेत है कि यह समस्या सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में फैली जलवायु अस्थिरता का हिस्सा है। अब तक अनुभवों के आधार पर कहा जाता है कि अगर दिसंबर में बर्फ गिरे, तो वह लंबे समय तक जमीन में नमी बनाए रखती है। पिघलाव धीमा होता है, जिससे खेतों और जंगलों को फायदा मिलता है। लेकिन जब बर्फ फरवरी में गिरती है, तब दिन और रात के तापमान में भारी अंतर कारण लंबे समय तक नमी नहीं टिक पाती और आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 1 नवंबर से अब तक 1,600 से ज्यादा फायर अलर्ट मिले जबकि हिमाचल प्रदेश में 600 और जम्मू-कश्मीर में करीब 300 आए। नंदा देवी नेशनल पार्क और वैली ऑफ फ्लावर्स जैसे संवेदनशील इलाकों में आग की घटनाएं सामने आई हैं। वनभूमि में नमी की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह रही। वैसे भी हिमालयी ग्लेशियर पहले ही लगातार सिकुड़ रहे हैैं अब अगर सर्दियों की बर्फबारी घटती है, तो संकट और गहरा सकता है। जहां बर्फ जमती और पिघलती है, उसका संतुलन बिगड़ जाएगा। जलवायु पैटर्न में आ रहे बदलाव हैं। चेतावनी साफ है, हिमालय की सूखी सर्दी सिर्फ यह संकेत है आने वाले जल संकट का, कृषि उत्पादन में गिरावट का, जंगलों और जैव विविधता पर खतरे का और भविष्य में अचानक बाढ़ और आपदाओं का कारक साबित होगा। अगर सर्दियों की बारिश और बर्फबारी इसी तरह अनिश्चित होती गई, तो इसका असर मैदानी इलाकों से लेकर महानगरों तक महसूस होगा।



