Sunday, February 8, 2026
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भारत और यूरोपीय संघ ने रचा इतिहास

-डॉ. ओपी त्रिपाठी, चिकित्सक एवं लेखक
भारत और यूरोपीय संघ यानी ईयू ने बीती 27 जनवरी को एक बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया। राजधानी दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुए 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों पक्षों ने अपने इतिहास के सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर कर दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत के व्यापारिक इतिहास का सबसे बड़ा करार दिया। उन्होंने कहा कि यह डील सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-ईयू रिश्तों को एक नई दिशा देने वाली है। यूरोपियन यूनियन  मुख्य रूप से यूरोप में स्थित 27 सदस्य देशों का एक अद्वितीय राजनीतिक और आर्थिक संघ है। इसका उद्देश्य शांति, समृद्धि, मानवाधिकारों की रक्षा और अपने सदस्य देशों के बीच स्थिरता को बढ़ावा देना है।
लगभग दो दशक की माथापच्ची, उधेड़बुन, असमंजस, सवाल समाप्त हुए और दोनों लोकतांत्रिक शक्तियां ‘मदर डील’ पर सहमत हुईं। आपस में हस्ताक्षर कर दिए गए और दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया गया। प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर ने इस सर्वाधिक व्यापक ‘मुक्त व्यापार समझौते’ (एफटीए) की घोषणा कर नई विश्व-व्यवस्था की बुनियाद रख दी। व्यापक और विश्व व्यवस्था परिवर्तनकारी इसलिए माना जा सकता है, क्योंकि पहली बार 193 करोड़ से अधिक की आबादी एक एफटीए के दायरे में होगी।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस समझौते को 2027 में लागू किए जाने की संभावना है। इस डील के बाद भारत में इम्पोर्ट होने वाली यूरोपीय कारें जैसे कि बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज पर लगने वाले टैक्स को 110 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया जाएगा। इसके अलावा भारत में यूरोप से आने वाली शराब और वाइन पर टैक्स कम हो सकता है। यूरोपीय देशों की शराब पर अभी 150 फीसदी टैरिफ लगता है। इसे घटाकर 20–30 फीसदी किया जाएगा।
भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि ईयू दूसरी सबसे बड़ी। दोनों मिलकर वैश्विक जीडीपी का करीब 25 फीसदी और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रखते हैं। जिसे 2032 तक 40 लाख करोड़ रुपए तक ले जाने का लक्ष्य तय किया गया है। यूरोपीय संघ विश्व की दूसरी और भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लिहाजा यह ‘मदर डील’ ही है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते को सिर्फ एक व्यापारिक डील नहीं, बल्कि साझा समृद्धि का एक ब्लूप्रिंट बताया। उन्होंने कहा कि यह एग्रीमेंट ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और इनोवेशन के नए रास्ते खोलेगा। पीएम मोदी ने इसे ‘पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल गुड’ करार दिया। इस समझौते से भारत और 27 यूरोपीय देशों के बीच व्यापार, निवेश और इनोवेशन को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।
इस एफटीए से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ‘टैरिफ दादागीरी’ का बड़ा रचनात्मक और शालीन जवाब दिया गया है। इसके अलावा, चीन के समानांतर भारत को ‘इनोवेशन एंड मैन्यूफैक्चरिंग हब’ बनाने का लक्ष्य तय कर चीनी वर्चस्व को भी चुनौती दी गई है, लिहाजा वाकई यह ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ है। चीन में करीब 1700 यूरोपीय कंपनियां सक्रिय हैं। क्या अब वे भारत शिफ्ट हो सकती हैं? इसकी प्रबल संभावना बन गई है।
यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि जब 2027 में यह एफटीए यूरोप के सभी 27 देशों में लागू हो जाएगा, तब भारत के 99 फीसदी से अधिक उत्पाद, सामान या तो ‘टैरिफ-मुक्त’ होंगे अथवा रियायती शुल्क ही देना पड़ेगा। मसलन-जैतून का तेल, वनस्पति तेल, ऑप्टिकल उपकरण, मशीनरी, रासायनिक एवं सर्जिकल उपकरण, फार्मा (खासकर जेनेरिक दवाएं), वस्त्र, रत्न-आभूषण, चमड़ा एवं जूते-चप्पल, चॉकलेट, पास्ता आदि लंबी सूची है। अधिकतर उत्पादों और उपकरणों को ‘टैरिफ-मुक्त’ तय किया गया है। करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के यूरोपीय बाजार में 2030 तक भारतीय उत्पादों का निर्यात 300 अरब डॉलर तक ले जाने का भी लक्ष्य रखा गया है। इससे महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कानपुर, आगरा के सूक्ष्म एवं लघु उद्यम (एमएसएमई) का व्यापारिक लाभ काफी बढ़ सकता है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर ने खुलासा किया है कि 4 अरब यूरो से अधिक के टैक्स खत्म करने का फैसला किया गया है। इससे दो तरफा व्यापार बढ़ेगा, लाखों नौकरियां पैदा होंगी, दोनों पक्षों की प्रतिभाएं, छात्र, शोधार्थी और पेशेवर एक-दूसरे के देशों में सहजता से आ-जा सकेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, 8 लाख से अधिक भारतीय इस समय यूरोप के देशों में बसे हैं और काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस व्यापार समझौते को ‘साझा समृद्धि का ब्लू प्रिंट’ करार दिया है। गौरतलब यह भी है कि भारत की करीब 1500 कंपनियां फिलहाल यूरोप में सक्रिय हैं। एफटीए के बाद नीदरलैंड से प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण होगा, लिहाजा 2030 तक भारत विश्व के शीर्ष 5 सेमीकंडक्टर हब में आ सकता है। फ्रांस, जर्मनी, इटली सरीखे देश भारत में रक्षा-फैक्ट्रियां स्थापित कर सकेंगे। अभी यूरोपीय कारें भारत में बहुत महंगी पड़ती हैं, क्योंकि उन पर 110 फीसदी टैक्स है।
अब आगामी पांच साल में, चरणबद्ध तरीके से, यह टैक्स मात्र 10 फीसदी तक लाया जाएगा। जो लोग ऑडी, मर्सिडीज, फॉक्सवैगन, पोर्शे, बीएमडब्ल्यू सरीखी यूरोपीय कारों के शौकीन हैं, उनके लिए यह एफटीए भारी बचत की खबर लाया है। अब यूरोपीय बीयर पर टैरिफ 50 फीसदी कम किया गया है और शराब पर 40 फीसदी ही टैक्स लगेगा, जबकि अभी यह टैक्स 150 फीसदी तक है। भारत-यूरोप की यह ‘मदर डील’ बहुआयामी है, क्योंकि यह बहुपक्षीय गठबंधन की पक्षधर है। दुनिया के देश किसी एक-दो देशों की धमकियों के दबाव में कांपते और डरते न रहें, लिहाजा ऐसी डील कर जवाब दिया गया है।
भारत और ईयू के बीच मुक्त व्यापार समझौता होने से पहले ही अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मिर्ची लग गई है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि भारत के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर करके यूरोप अपने ही खिलाफ रूसी जंग को फंडिंग दे रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव (वित्त मंत्री) स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोप ने भले रूस के साथ अपने तेल खरीद को महत्वपूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है, लेकिन अब वो भारत में रिफाइन हो रहे रूसी तेल उत्पादों को खरीदने की तैयारी में है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को वित्त पोषित (फंडिंग) कर रहे हैं।
इस समझौते के बाद भारत में यूरोपीय निवेश बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय स्टार्टअप्स और कंपनियों के लिए यूरोप के बाजार के दरवाजे और आसान हो जाएंगे। आने वाले वर्षों में इस डील का असर भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार में साफ तौर पर दिखाई देगा।प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह समझौता लोकतंत्र, कानून के शासन और मल्टीलेटरलिज्म के प्रति भारत और ईयू की साझा प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार जरूरी है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से हर साल करीब 4 अरब यूरो (43 हजार करोड़ रुपए) के टैरिफ कम होंगे और भारत व यूरोप में लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए मौके बनेंगे। असल में भारत–ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट दुनिया को साफ संदेश देता है कि आज की ग्लोबल चुनौतियों का सबसे अच्छा जवाब आपसी सहयोग है, न कि अलग-थलग होकर फैसले लेना।
–चिकित्सक एवं लेखक

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