बजट पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की उक्वमीद भरी उज्जल तस्वीर पेश की है। आर्थिक सर्वे का सबसे बड़ा और उत्साहजनक संकेत यह है कि भारत की संभावित विकास दर अब 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है और इसे ‘न्यू नॉर्मल’ बताया गया है। वर्ष 2022-23 के सर्वे में जहां मध्यम अवधि की संभावित विकास दर 6.5 प्रतिशत आंकी गई थी, वहीं अब संरचनात्मक सुधारों, बेहतर बुनियादी ढांचे और मजबूत वित्तीय प्रणाली के चलते उत्पादन क्षमता में स्पष्ट सुधार दिखता है। यह संकेत देता है कि भारत अब तेज और स्थिर विकास के पथ पर है, न कि केवल अस्थायी उछाल पर। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा 2025-26 भारत की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और भविष्य की दिशा दोनों का साफ आईना है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और धीमी ग्रोथ से जूझ रही है। इसके बावजूद भारत का दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहना, अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) ग्रोथ 7.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह संकेत देता है कि देश की आर्थिक रफ़्तार सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि उत्पादन, सेवाओं और रोजगार के स्तर पर भी दिख रही है। सरकार की आमदनी में बढ़ोîारी एक और अहम संकेत है। वित्त वर्ष 2024-25 में केंद्र सरकार की आय बढक़र जीडीपी के 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका मतलब है कि टैक्स कलेक्शन और अन्य राजस्व स्रोतों में सुधार हुआ है, जिससे सरकार के पास विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए ज्यादा संसाधन उपलब्ध हैं। यह राजकोषीय मजबूती आने वाले बजट के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करती है। बैंकिंग सेक्टर की सेहत में आया सुधार आर्थिक स्थिरता का बड़ा संकेत है। सितंबर 2025 तक बैंकों का ग्रॉस एनपीए घटकर 2.2 प्रतिशत रह जाना कई वर्षों का सबसे निचला स्तर है। इसका सीधा मतलब है कि बैंक अब ज्यादा मजबूत बैलेंस शीट के साथ कर्ज देने की स्थिति में हैं, जिससे उद्योग और उपभोक्ता दोनों को फायदा होगा। वित्तीय समावेशन के मोर्चे पर भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत मार्च 2025 तक 55 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या ग्रामीण और छोटे शहरों की है। यह सिर्फ बैंक खाते नहीं, बल्कि गरीब और वंचित वर्ग को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोडऩे की कहानी है। इसी तरह डीमैट खातों की संया 21.6 करोड़ के पार पहुंचना बताता है कि निवेश की संस्कृति तेजी से फैल रही है, और इसमें महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। वैश्विक व्यापार में भारत की बढ़ती भूमिका आर्थिक समीक्षा का एक और मजबूत पक्ष है। साल 2005 से 2024 के बीच वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। सेवा निर्यात में तो तस्वीर और भी उत्साहजनक है, वित्त वर्ष 2024-25 में यह 13.6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ रिकॉर्ड 387.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके साथ ही विदेश से आने वाला पैसा यानी रेमिटेंस 135.4 अरब डॉलर तक पहुंचना भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को दिखाता है। एक और बात यह है कि विदेशी मुद्रा भंडार 701.4 अरब डॉलर तक पहुंचना देश को बाहरी झटकों से बचाने की मजबूत ढाल देता है। यह भंडार न सिर्फ 11 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है, बल्कि देश के बाहरी कर्ज का बड़ा हिस्सा भी कवर करता है। महंगाई का औसत स्तर 1.7 प्रतिशत रहना आम लोगों के लिए बड़ी राहत है, क्योंकि इससे रोजमर्रा की जरूरतों पर दबाव कम होता है। कृषि क्षेत्र में भी सकारात्मक तस्वीर उभरती है। अनाज उत्पादन 35.77 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो खाद्य सुरक्षा के लिहाज से अहम है। प्रधानमंत्री किसान समान निधि के तहत किसानों को 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की मदद पहुंचना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। मनरेगा से जुड़े सुधारों को 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य से जोडऩा रोजगार को दीर्घकालिक दृष्टि से मजबूत करने का प्रयास है। उद्योग और मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में आई तेजी इस समीक्षा की रीढ़ कही जा सकती है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली दो तिमाहियों में मैनुफैक्चरिंग (जीवीए) की मजबूत ग्रोथ बताती है कि मेक इन इंडिया और पीएलआई जैसी योजनाएं जमीन पर असर दिखा रही हैं। 14 सेक्टरों में 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश और लाखों नौकरियां बनना इस बात का सबूत है कि नीतिगत स्थिरता निवेशकों का भरोसा बढ़ा रही है। सेमीकंडक्टर मिशन, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, हाईवे, रेलवे और एविएशन सेक्टर में तेजी, ये सभी भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कर रहे हैं। बिजली वितरण कंपनियों का मुनाफे में आना और नवीकरणीय ऊर्जा में भारत का शीर्ष स्थान, सतत विकास की दिशा में मजबूत कदम हैं। सर्वे का शायद सबसे सकारात्मक पहलू गरीबी में आई भारी गिरावट है। मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के अनुसार 2005-06 में जहां 55.3 प्रतिशत आबादी गरीबी में थी, वहीं 2022-23 में यह आंकड़ा घटकर 11.28प्रतिशत रह गया। यह सामाजिक योजनाओं, बुनियादी सेवाओं और आर्थिक अवसरों के विस्तार का संयुक्त परिणाम है। साथ ही, इनोवेशन और रोजगार के क्षेत्र में भारत की प्रगतिग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में रैंकिंग सुधार और करोड़ों नौकरियों की मोबिलाइजेशन भविष्य के लिए उमीद जगाती है। हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण केवल उपलब्धियों का बखान नहीं करता, बल्कि चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है। सर्वे यह भी स्वीकार करता है कि वित्त वर्ष 2025-26 बाहरी मोर्चे पर चुनौतीपूर्ण रहा। वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता, संरक्षणवाद और भारी टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों और विनिर्माताओं पर दबाव डाला। इसके बावजूद सरकार का दावा है कि भारत ने इस संकट को अवसर में बदला है। सप्लाई चेन में बदलाव, ‘चीन प्लस वन’ रणनीति और स्वदेशी विनिर्माण पर जोर ने भारत को एक वैकल्पिक उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद की है। ऑनलाइन गेमिंग पर नियंत्रण को लेकर मुख्य आर्थिक सलाहकार की टिप्पणी यह दर्शाती है कि सरकार आर्थिक नीतियों को सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य के व्यापक संदर्भ में देख रही है। यह स्वीकार करना जरूरी है कि आर्थिक विकास का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब वह समाज के लिए संतुलित और टिकाऊ हो। बजट 2026 से उद्योग जगत, विशेषकर एफएमसीजी सेक्टर को बड़ी उम्मीदें हैं। टैक्स में और कटौती तथा आम आदमी की आय बढ़ाने वाले कदमों की मांग इस बात का संकेत है कि खपत आधारित विकास को अभी और प्रोत्साहन की जरूरत है। यदि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, तो मांग में सुधार होगा, जिससे उद्योग, निवेश और रोजगार तीनों को लाभ मिलेगा। इसके साथ ही, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से घरेलू कंपनियों को बचाने वाली नीतियों की जरूरत भी महसूस की जा रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो आर्थिक सर्वेक्षण 2 एक संतुलित दस्तावेज है। यह न तो अति-आत्मविश्वास में डूबा है और न ही निराशावादी। संदेश साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत नींव पर खड़ी है, लेकिन वैश्विक पूंजी प्रवाह, राज्यों की वित्तीय सेहत और सामाजिक-डिजिटल चुनौतियों पर सजग नीति की जरूरत है। अब गेंद बजट के पाले में है, जहां इस सर्वे की चेतावनियों और संभावनाओं को ठोस फैसलों में बदलना होगा।


