-पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
आज का युग तकनीक का युग है। मोबाइल फोन हमारी ज़िंदगी का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना जीवन की कल्पना करना कठिन हो गया है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल पर समय देखने से लेकर रात को सोने से पहले सोशल मीडिया देखने तक, हमारा पूरा दिन मोबाइल के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। मोबाइल ने हमें दुनिया से जोड़ा है, जानकारी को आसान बनाया है और काम को तेज़ किया है, लेकिन इसके साथ-साथ इसने हमारे पारिवारिक रिश्तों पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव भी डाला है। धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि हम घर में रहते हुए भी अपनों से दूर होते जा रहे हैं। एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। यही स्थिति आज के समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी बनती जा रही है।
परिवार किसी भी व्यक्ति के जीवन की पहली पाठशाला होता है, जहाँ वह प्रेम, संस्कार, सहयोग और समझदारी सीखता है। पहले घरों में शाम के समय सभी सदस्य एक साथ बैठकर दिनभर की बातें साझा करते थे। माता-पिता बच्चों से उनके स्कूल के अनुभव पूछते थे, दादा-दादी अपने जीवन के अनुभव सुनाते थे और परिवार के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता था। लेकिन आज वही समय मोबाइल ने छीन लिया है। बच्चे मोबाइल पर गेम खेलते रहते हैं, युवा सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं और बड़े लोग भी समाचार या वीडियो देखने में लगे रहते हैं। परिणामस्वरूप, आपसी बातचीत कम होती जा रही है और रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
मोबाइल की अत्यधिक उपयोगिता ने परिवार के भीतर संवाद की परंपरा को कमजोर कर दिया है। आज कई घरों में ऐसा दृश्य आम हो गया है कि सभी सदस्य एक ही कमरे में बैठे होते हैं, लेकिन कोई किसी से बात नहीं करता। सबकी निगाहें मोबाइल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं। पति-पत्नी के बीच बातचीत कम होती जा रही है, माता-पिता बच्चों की समस्याओं से अनजान रहते हैं और बच्चे भी अपने मन की बात खुलकर नहीं कह पाते। जब संवाद समाप्त होता है, तो गलतफहमियाँ बढ़ती हैं और रिश्तों में दूरी आ जाती है। यही दूरी धीरे-धीरे तनाव, विवाद और मानसिक असंतोष का कारण बन जाती है।
बच्चों पर मोबाइल का प्रभाव विशेष रूप से चिंताजनक है। आज छोटे-छोटे बच्चे भी मोबाइल के बिना रह नहीं पाते। माता-पिता उन्हें चुप कराने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं, जिससे वे कार्टून, वीडियो या गेम देखने लगते हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है। ऐसे बच्चे परिवार के सदस्यों से बातचीत करने के बजाय आभासी दुनिया में ज्यादा रुचि लेने लगते हैं। वे अपने माता-पिता से भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनमें धैर्य, सहनशीलता और सामाजिक व्यवहार की कमी देखी जाने लगती है।
युवाओं और किशोरों के जीवन में भी मोबाइल ने रिश्तों को प्रभावित किया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाली आभासी दोस्ती और लाइक्स की दुनिया उन्हें इतनी आकर्षक लगती है कि वे वास्तविक रिश्तों को महत्व देना भूल जाते हैं। वे अपने माता-पिता, भाई-बहनों और बुज़ुर्गों के साथ समय बिताने के बजाय मोबाइल में व्यस्त रहना पसंद करते हैं। कई बार परिवार के सदस्य उनकी समस्याओं को समझना चाहते हैं, लेकिन मोबाइल की वजह से संवाद की कमी के कारण यह संभव नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप युवा अकेलेपन, तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं का शिकार होने लगते हैं।
मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग पति-पत्नी के रिश्तों पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है। पहले पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ समय बिताते थे, अपने सुख-दुख साझा करते थे और एक-दूसरे का सहारा बनते थे। आज कई दंपति मोबाइल में इतने व्यस्त रहते हैं कि एक-दूसरे के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। रात के समय भी दोनों अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते हैं, जिससे भावनात्मक दूरी बढ़ती है। कई बार सोशल मीडिया पर अनावश्यक तुलना, शक और गलतफहमी रिश्तों में तनाव पैदा कर देती है। इससे वैवाहिक जीवन में असंतोष और संघर्ष बढ़ने लगता है।
बुज़ुर्गों के लिए मोबाइल का प्रभाव और भी पीड़ादायक है। आज के समय में कई बुज़ुर्ग अपने ही घर में उपेक्षित महसूस करते हैं। उनके बच्चे और पोते-पोतियाँ मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और उनके पास बैठकर बात करने का समय नहीं निकालते। वे अपनी बात कहने, अपने अनुभव साझा करने और स्नेह पाने के लिए तरस जाते हैं। यह स्थिति उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना देती है और उनमें अकेलेपन की भावना पैदा हो जाती है। परिवार में बुज़ुर्गों की उपेक्षा समाज के नैतिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय है।
मोबाइल की वजह से परिवार में समय प्रबंधन भी प्रभावित हुआ है। पहले भोजन के समय सभी सदस्य एक साथ बैठकर खाते थे और बातचीत करते थे। आज कई लोग मोबाइल देखते हुए खाना खाते हैं या जल्दी-जल्दी खाना खाकर अपने फोन में लग जाते हैं। पारिवारिक त्योहार, समारोह और विशेष अवसर भी अब मोबाइल फोटो और वीडियो तक सीमित हो गए हैं। लोग पल को जीने के बजाय उसे कैमरे में कैद करने में ज्यादा रुचि लेते हैं। इससे रिश्तों की आत्मीयता और सजीवता कम होती जा रही है।
मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से परिवार में भावनात्मक संवेदनशीलता भी घट रही है। जब कोई सदस्य दुखी होता है या किसी समस्या से जूझ रहा होता है, तब परिवार का सहयोग सबसे जरूरी होता है। लेकिन आज लोग मोबाइल में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे अपनों की भावनाओं को समझ ही नहीं पाते। धीरे-धीरे संवेदनशीलता खत्म होती जाती है और रिश्ते औपचारिक बन जाते हैं। यह स्थिति एक ऐसे समाज की ओर संकेत करती है, जहाँ लोग साथ रहते हुए भी अकेले होते जा रहे हैं।
हालाँकि यह कहना गलत होगा कि मोबाइल पूरी तरह बुरा है। मोबाइल ने हमें सूचना, शिक्षा, रोजगार और संपर्क के कई नए अवसर दिए हैं। समस्या मोबाइल में नहीं, बल्कि उसके अत्यधिक और असंतुलित उपयोग में है। यदि हम मोबाइल का सही सीमा में उपयोग करें, तो यह हमारे जीवन को आसान बना सकता है। लेकिन जब मोबाइल हमारे रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाए, तब यह चिंता का विषय बन जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए परिवार को मिलकर प्रयास करना होगा। घर में “नो मोबाइल टाइम” तय किया जा सकता है, जैसे भोजन के समय, रात के खाने के बाद या परिवार के साथ बैठने के समय मोबाइल का उपयोग न करना। माता-पिता को बच्चों के सामने अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए और स्वयं भी मोबाइल का सीमित उपयोग करना चाहिए। सप्ताह में कुछ समय ऐसा होना चाहिए, जब पूरा परिवार बिना मोबाइल के एक-दूसरे के साथ समय बिताए, बातचीत करे, खेल खेले या किसी गतिविधि में भाग ले।
शिक्षा संस्थानों और समाज को भी इस दिशा में जागरूकता फैलानी चाहिए। बच्चों और युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि तकनीक जीवन का साधन है, लक्ष्य नहीं। उन्हें वास्तविक रिश्तों की अहमियत और पारिवारिक मूल्यों का महत्व समझाना आवश्यक है। मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म को भी जिम्मेदारी से ऐसे संदेश प्रसारित करने चाहिए, जो परिवार और सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाने में सहायक हों।
अंततः यह कहा जा सकता है कि मोबाइल ने हमारी जिंदगी को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके अंधाधुंध उपयोग ने हमारे रिश्तों को कमजोर कर दिया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक और भावनाओं के बीच संतुलन बनाएँ। हमें यह समझना होगा कि मोबाइल से जुड़ना आसान है, लेकिन अपनों से जुड़ना उससे कहीं अधिक जरूरी है। यदि हमने समय रहते इस दिशा में ध्यान नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ रिश्तों की गर्माहट से वंचित हो जाएँगी।
आज के इस तेज़ रफ्तार डिजिटल युग में हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम मोबाइल को अपना सेवक बनाएँगे, स्वामी नहीं। हम अपने परिवार को समय देंगे, अपनों की बात सुनेंगे और रिश्तों को प्राथमिकता देंगे। तभी हम एक स्वस्थ, संवेदनशील और खुशहाल समाज की ओर बढ़ सकेंगे। यही इस संपादकीय का मूल संदेश है — मोबाइल का उपयोग करें, लेकिन रिश्तों की कीमत पर नहीं।
(संस्थापक-निदेशक अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन एवं न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन)



