अशोक अग्रवाल
आज का समय तकनीक का समय है। मोबाइल, इंटरनेट और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसी तकनीक का एक डरावना चेहरा भी सामने आ रहा है। हाल ही में गाज़ियाबाद से आई एक हृदयविदारक घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। 12, 14 और 16 वर्ष की तीन मासूम बच्चियाँ—जो सगी बहनें थीं—ने अपनी जान गंवा दी। यह घटना न किसी हिंसा का परिणाम थी, न ही गरीबी या भूख की वजह से हुई। इसकी जड़ में थी मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग की जानलेवा लत।
बताया गया कि ये बच्चियाँ एक कोरियन टास्क-आधारित ऑनलाइन गेम की आदी हो गई थीं। कोविड महामारी के दौरान, जब स्कूल बंद थे और बच्चे घरों में कैद थे, तभी यह लत धीरे-धीरे उनके जीवन में प्रवेश कर गई। शुरुआत में यह एक साधारण खेल जैसा लगा, लेकिन समय के साथ यह उनके पूरे जीवन पर हावी हो गया। गेम के टास्क पूरे करने का दबाव इतना बढ़ गया कि अंततः उन्होंने अपने ही मकान के नौवें तल्ले से कूदकर जान दे दी। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
कोविड के बाद बदलता बचपन: कोविड महामारी ने बच्चों की दुनिया पूरी तरह बदल दी। स्कूल, खेल के मैदान, दोस्तों से मिलना-जुलना—सब अचानक बंद हो गया। ऐसे में मोबाइल और इंटरनेट बच्चों का मुख्य सहारा बन गए। ऑनलाइन क्लास के नाम पर मोबाइल बच्चों के हाथ में आया और धीरे-धीरे वही उनका दोस्त, शिक्षक और मनोरंजन का साधन बन गया।
माता-पिता, जो खुद महामारी की चिंताओं से जूझ रहे थे, यह समझ ही नहीं पाए कि कब मोबाइल बच्चों की ज़रूरत से ज़्यादा आदत बन गया। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया ने बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया। ब्लू व्हेल जैसे कई खतरनाक गेम ऐसे हैं जो बच्चों को लगातार टास्क पूरे करने, समय सीमा में लक्ष्य हासिल करने और असफल होने पर सजा जैसे डर दिखाते हैं। इससे बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ता है।
मोबाइल की लत और मानसिक स्वास्थ्य : बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। वे कल्पना और वास्तविकता के बीच का अंतर पूरी तरह समझ नहीं पाते। ऑनलाइन गेम्स में मिलने वाले निर्देश, धमकियाँ और चुनौतियाँ उनके दिमाग पर गहरा असर डालती हैं। धीरे-धीरे वे अपने आसपास की दुनिया से कटने लगते हैं।
मोबाइल की लत से बच्चों की दिनचर्या बिगड़ जाती है। वे देर रात तक जागते हैं, ठीक से खाना नहीं खाते, पढ़ाई में मन नहीं लगता और परिवार से बातचीत कम हो जाती है। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन और डर उनके स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है। कई बार बच्चे अपने मन की बात किसी से कह भी नहीं पाते।
गाज़ियाबाद की घटना में भी यही हुआ। बच्चियाँ मानसिक दबाव में थीं, लेकिन शायद उन्हें यह समझाने वाला कोई नहीं था कि यह सब एक खेल से ज़्यादा कुछ नहीं है।
16 वर्ष से पहले सीमाएं ज़रूरी : आज यह सवाल बहुत ज़रूरी हो गया है कि क्या बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर कोई सख़्त सीमा नहीं होनी चाहिए ? शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग ज़रूरी है, लेकिन मनोरंजन के नाम पर बच्चों को अनियंत्रित डिजिटल दुनिया में छोड़ देना खतरनाक साबित हो रहा है।
16 वर्ष की उम्र तक बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग को सीमित किया जाना चाहिए। यह कोई रोक-टोक नहीं, बल्कि सुरक्षा का कदम है। जैसे हम बच्चों को बिना देखरेख के सड़क पर नहीं छोड़ते, वैसे ही उन्हें बिना मार्गदर्शन के डिजिटल दुनिया में भी नहीं छोड़ा जा सकता।
माता-पिता की अहम भूमिका: इस पूरी स्थिति में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चों को मोबाइल देना आसान है, लेकिन उनके इस्तेमाल पर नज़र रखना ज़रूरी है। यह समझना होगा कि मोबाइल बच्चों को चुप कराने का साधन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ है।
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से रोज़ बातचीत करें, बच्चों को आउटडोर गेम्स में व्यस्त रखें, बच्चों के समय को अन्य सामाजिक कार्यों में जोड़ें, माता पिता खुद भी मोबाइल कम चलाएं, खाना खिलाने के लिए या खुद की स्वतंत्रता के लिए मोबाइल न दें, उनके दोस्तों, रुचियों और ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में जानें। बच्चों को यह भरोसा देना ज़रूरी है कि वे बिना डर के अपनी बात कह सकते हैं। अगर बच्चा चुप रहने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए या अकेला रहने लगे, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है।
बचपन को मोबाइल नहीं, मार्गदर्शन चाहिए: बचपन सीखने, खेलने और सपने देखने का समय होता है। इसे लगातार स्क्रीन के सामने बैठकर बिताने के लिए नहीं बनाया गया है। बच्चों को मोबाइल नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन चाहिए। उन्हें खेल के मैदान, किताबें, कला, संगीत और परिवार के साथ समय चाहिए।
एल्गोरिद्म बच्चों की भावनाओं को नहीं समझते, लेकिन माता-पिता, शिक्षक और समाज समझ सकता है। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि असफलता जीवन का हिस्सा है और किसी खेल या टास्क के लिए अपनी जान देना कभी समाधान नहीं हो सकता। इन बातों के लिए माता पिता को भी बच्चों के साथ समय बिताना होगा I
अब कार्रवाई का समय है: गाज़ियाबाद की यह घटना हमें झकझोरती है और सोचने पर मजबूर करती है। अगर अब भी हम नहीं जागे, तो ऐसी घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। सरकार, स्कूल, समाज और परिवार—सभी को मिलकर कदम उठाने होंगे।
स्कूलों में डिजिटल जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा होनी चाहिए। माता-पिता को भी तकनीक के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखना और ज़रूरत पड़ने पर मदद लेना कोई शर्म की बात नहीं है।
एक अपील: इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बच्चों की सुरक्षा कीजिए। इसे एक और खबर न बनने दें। हर बच्चे का बचपन अनमोल है। उसे मोबाइल की लत से नहीं, प्यार, समय और समझ से संवारिए। अब कार्रवाई करने का समय है—आज, अभी।चिंतक एवं लेखक, सिलीगुड़ी
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