Saturday, February 7, 2026
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संसद सत्र में बर्बाद होती जनता की गाढ़ी कमाई

-राजेश माहेश्वरी

पिछले कई वर्षों से संसद का सत्र शुरु तो बड़ी गर्मजोशी के साथ होता है मगर खत्म जनता के पैसे की बर्बादी के साथ होता है। संसद का मौजूदा बजट सत्र भी इस दिशा की ओर बढ़ चुका है। बजट सत्र का पांचवां दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और हंगामेदार अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। जहां एक ओर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव और बजट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा होनी थी, वहीं विपक्षी नेता राहुल गांधी के व्यवहार ने सदन की गरिमा और कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चीनी घुसपैठ के पुराने और विवादित मुद्दों को बिना ठोस आधार के उठाने और नियमों की अनदेखी करने के कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई।
सत्र में संसद की कार्यवाही के दौरान सदन की मर्यादा टूटने का मामला सामने आया। कुछ सांसदों ने स्पीकर के आसन की ओर कागज फेंके। इस पर सख्त कार्रवाई करते हुए संबंधित सांसदों को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। आठ सांसदों पर ये कार्रवाई हुई है। इसके बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस सदस्यों ने लोकसभा से पार्टी सदस्यों के सस्पेंशन के खिलाफ संसद भवन के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान न तो विपक्ष के नेता को बोलने दिया गया और न ही प्रधानमंत्री सदन में बोल पाए। और पीएम के जवाब के बिना ही लोकसभा से धन्यवाद प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हो गया है। 4 फरवरी को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान भारी हंगामा हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी का जवाब देने का समय शाम 5 बजे तय था, लेकिन सदन में कथित अराजकता के कारण सदन स्थगित कर दिया गया और पीएम का भाषण नहीं हो सका। स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा कि उन्हें विश्वसनीय सूचना मिली थी कि कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्य प्रधानमंत्री की कुर्सी के पास पहुंचकर कोई अप्रिय घटना को अंजाम दे सकते थे। देखा जाए तो लोकतंत्र के मंदिर में ऐसी परिस्थितियां बनना शुभ संकेत तो बिल्कुल नहीं हैं।
2004 के बाद यह पहली बार हुआ है कि लोकसभा ने बजट सत्र के दौरान संसद में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संबोधन को प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही पारित कर दिया। 2004 में, भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने से रोक दिया था। कांग्रेस के संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने सिंह के 10 मार्च, 2005 के अभिभाषण का एक वीडियो साझा किया। वीडियो में, पूर्व प्रधानमंत्री 10 जून, 2004 की उस घटना का जिक्र करते हैं जब उन्हें धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने की अनुमति नहीं दी गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।
आंकड़ों के आलोक में बात करें तो पिछले दो दशकों में संसद की उत्पादकता घटी है। बीता मानसून सत्र भी हंगामेदार रहा। कुल 21 दिनों तक सदन चला, लेकिन उत्पादकता घटी। सत्र के दौरान लोकसभा में कुल 37.1 घंटे और राज्यसभा में कुल 49.9 घंटे काम हुआ। प्रश्नकाल में लोकसभा में 4.7 घंटे और राज्यसभा में 1.2 घंटे काम हुआ। विधायकी कार्यों में लोक सभा में 2.9 घंटे और राज्यसभा में 13.4 घंटे काम हुआ। अन्य कार्यों में लोक सभा में 4.7घंटे और राज्यसभा में 9 घंटे काम हुआ। सत्र के दौरान गैर विधायकी कार्यों में लोक सभा में 24.6 घंटे और राज्यसभा में 18.3 कार्य हुआ। मानसून सत्र के दौरान लोकसभा की उत्पादकता 29 फीसदी और राज्यसभा की उत्पादकता 34 फीसदी रही। कुल 21 दिन सदन चला, प्रतिदिन 6 घंटे की औसत 21 दिन में सदन में कुल 126 घंटे काम होना चाहिए। इस तरह लोकसभा में 88.9 घंटे बर्बाद हुए और राज्यसभा में 76.1 घंटे बर्बाद हुए। बीता शीतकालीन सत्र हंगामे और शोर शराबे के बावजूद उत्पादकता के लिहाज से बेहतर रहा। जिसमें लोकसभा ने 111 फीसदी और राज्यसभा ने 121 फीसदी उत्पादकता दर्ज की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह उकसावे वाला व्यवहार एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे जानबूझकर सदन में ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिससे स्पीकर को उनके खिलाफ सख्त कदम उठाना पड़े। यदि उन्हें सदन से निलंबित किया जाता है, तो वे बाहर जाकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने यह राग अलाप सकें कि “भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया है” या “विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है।” यह विडंबना ही है कि जब देश की सेना डोकलाम जैसे मोर्चों पर बहादुरी से लड़ रही होती है, तब राहुल गांधी चीनी अधिकारियों के साथ नूडल्स खाते देखे जाते हैं, और अब सदन में चीनी एजेंडे को हवा देकर देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।
विपक्ष हो या फिर सरकार किसी को भी चिंता नहीं है कि देश की जनता का पैसा किस तरह बर्बाद किए जा रहे हैं। ऐसा नहीं है की ये पैसा सिर्फ मोदी सरकार के आने के बाद से ही बर्बाद होना शुरु हुआ है। ये तो हमारे देश के राजनीतिक दलों की परंपरा बन गई है। जब यूपीए की सरकार थी तब बीजेपी ने संसद की कार्यवाही चलने नहीं दी और अब वहीं काम कांग्रेस कर रही है। सवाल यही है कि देश की जनता का इतना फिक्र करने वाली राजनीतिक पार्टियां इतनी आसानी से जनता का पैसा कैसे बर्बाद कर देती हैं?
संसद का एक-एक मिनट देश के विकास के लिए अत्यंत कीमती होता है। सत्र के दौरान प्रति मिनट लाखों रुपये का खर्च आता है, जो सीधे तौर पर देश के करदाताओं की जेब से जाता है। 2012 में पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल के द्वारा दिए गए बयान के अनुसार, सत्र के दौरान लोकसभा को एक मिनट चलाने पर 2.5 लाख रुपये का खर्च आता है जबकि, राज्यसभा को चलाने पर प्रति मिनट 1.25 लाख रुपये का खर्च आता है। इस तरह लोकसभा में हर घंटे कुल 1.5 करोड़ और राज्यसभा में हर घंटे कुल 75 लाख रुपया का खर्च आता है।
संसद में हंगामा और लगातार स्थगन से जनता के करोड़ों रुपये के कर की बर्बादी होती है। हंगामे के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा नहीं हो पाती, जिससे देशहित के कार्यों के बजाय समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। मौजूदा सत्र में चल रहे हंगामे से न केवल संसदीय समय की बर्बादी हो रही है, बल्कि उस जनता के साथ विश्वासघात भी है जो अपने प्रतिनिधियों से विकास और नीतियों पर सार्थक चर्चा की उम्मीद करती है। गैर सरकारी संगठन फाउंडेशन फॉर रेस्टोरेशन ऑफ नेशनल वैल्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 1991 से 2014 के बीच संसद में 2,162 घंटे और 51 मिनट सांसदों द्वारा खड़े होकर किये गए हंगामे के कारण बर्बाद हुए। ब्रिटेन और अमेरिका में बाधा डालकर संसद के सत्र को रोकना स्वीकार्य नहीं है। बल्कि अमेरिका में तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।
-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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