Friday, February 20, 2026
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वैश्विक सिलिका समूह में भारत

अमेरिका की अगुवाई वाले रणनीतिक गठबंधन यानि पैक्स सिलिका में भारत का शामिल होना कई मायनो में काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल एक कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भविष्य में तकनीक पर नियंत्रण की तैयारी है। पैक्स सिलिका गठबंधन में शामिल होकर भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन का सबसे मजबूत विकल्प बनने की ओर आगे बढ़ रहा है। हमसभी जानते हैं कि बीसवीं सदी में वैश्विक वर्चस्व का आधार तेल, कोयला और इस्पात हुआ करते थे। औद्योगिक क्रांतियों की धुरी भारी उद्योग थे और महाशक्तियों की पहचान उनकी ऊर्जा-संपदा से तय होती थी। लेकिन इक्कीसवीं सदी में शक्ति की परिभाषा बदल चुकी है। अब दुनिया पर प्रभाव जमाने के लिए किसी देश के पास तेल के कुंए नहीं, बल्कि सिलिकॉन की सूक्ष्म चिप्स होनी चाहिए। वही चिप्स जो हमारे मोबाइल, कार, मिसाइल, उपग्रह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को संचालित करती हैं। इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य में ‘पैक्स सिलिका’ का उदय हुआ है, एक ऐसा रणनीतिक गठबंधन, जो सेमीकंडक्टर और एआई की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और संतुलित करने के नाम पर विश्व-राजनीति की नई बिसात बिछा रहा है। इसलिए भारत का इस एलीट समूह में औपचारिक प्रवेश केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक निर्णायक मोड़ है। यह कदम भारत को महज एक तकनीकी आयातक राष्ट्र से निकालकर भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सक्रिय निर्माता और नियंता बनाने की दिशा में अग्रसर करता है। पिछले कुछ महीनों में दुनिया ने देखा कि कैसे क्रिटिकल मिनरल्स और परमानेंट मैग्नेट की सप्लाई चेन बाधित होते ही टेक्नोलॉजी उद्योग में हलचल मच गई। सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रिक व्हीकल तक हर क्षेत्र प्रभावित हुआ। चीन जैसे देशों पर अत्यधिक निर्भरता ने यह सिखा दिया कि आर्थिक परस्परता यदि असंतुलित हो, तो वह हथियार भी बन सकती है। भारत पहले ही अपने क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर में चीन की मौजूदगी को लेकर चिंता जता चुका है, खासकर टेलीकॉम नेटवर्क के संदर्भ में। ऐसे में पैक्स सिलिका में शामिल होना एक रणनीतिक संतुलन साधने का प्रयास है। यह गठबंधन अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, इजराइल, यूएई, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाई देगा। सेमीकंडक्टर, एआई, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग और क्रिटिकल मिनरल्स इन चार स्तंभों पर आधारित यह पहल भारत के लिए कई दरवाजे खोलती है। भारत के पास विशाल तकनीकी प्रतिभा है। सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर महत्वाकांक्षी योजनाएं पहले से चल रही हैं। लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर-अर्थ तत्वों की खोज और आपूर्ति को लेकर भी देश ने कदम बढ़ाए हैं। अब वैश्विक साझेदारी से इन प्रयासों को गति और स्थिरता मिलेगी। आज ताइवान दुनिया का लगभग 50 प्रतिशत सेमीकंडक्टर और 90 प्रतिशत उन्नत चिप्स का निर्माण करता है। वहीं, चीन एक प्रमुख निर्यातक है। अमेरिकी टैरिफ और व्यापारिक तनावों के बीच जब सप्लाई चेन में व्यवधान आया, तो पूरी दुनिया को इसका असर झेलना पड़ा। पैक्स सिलिका का उदय इसी अस्थिरता की पृष्ठभूमि में हुआ है। भारत का इसमें शामिल होना यह संकेत देता है कि वह केवल आयातक या उपभोक्ता की भूमिका से संतुष्ट नहीं है। वह वैश्विक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में भरोसेमंद निर्माता और आपूर्तिकर्ता बनना चाहता है। दअरसल बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब चीन पर पूर्ण निर्भरता से हटकर वैकल्पिक उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं। भारत अपने विशाल बाजार, स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और बढ़ते डिजिटल बुनियादी ढांचे के कारण एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में उभरा है। दूसरा, भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी भंडार है। ये खनिज आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा तकनीक के लिए अनिवार्य हैं। इसके अलावा भारत में पहले से ही दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत सेमीकंडक्टर डिजाइनर कार्यरत हैं। यह आंकड़ा बताता है कि भारत केवल उत्पादन स्थल नहीं, बल्कि बौद्धिक नवाचार का केंद्र भी बन सकता है। ‘सेमीकॉन इंडिया’ जैसी पहल और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने पहले ही वैश्विक कंपनियों का ध्यान आकर्षित किया है। माइक्रोन जैसी कंपनियों का निवेश और टाटा समूह की सक्रियता इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हैं। पैक्स सिलिका की सदस्यता से विदेशी निवेश को और गति मिल सकती है, विशेषकर असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (एटीएमपी) के क्षेत्र में। इसलिए भारत के लिए यह गठबंधन कई अवसर लेकर आया है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम। अभी तक भारत चिप्स का प्रमुख आयातक रहा है। लेकिन यदि वह डिजाइन से लेकर पैकेजिंग तक की शृंखला में सक्रिय भागीदारी करता है, तो वह वैश्विक मूल्य शृंखला का अहम हिस्सा बन सकता है। दूसरी बात है कि सेमीकंडक्टर उद्योग उच्च कौशल की मांग करता है। इससे इंजीनियरिंग और अनुसंधान के क्षेत्र में लाखों रोजगार सृजित हो सकते हैं। साथ ही रक्षा और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में स्वदेशी चिप निर्माण भारत की सामरिक क्षमता को मजबूत करेगा। 1.45 अरब नागरिकों का डेटा और तेजी से बढ़ता डिजिटल उपयोग भारत को एआई नवाचार का विशाल प्रयोगशाला बना सकता है। हालांकि इस पहल के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पहली चुनौती निवेश और तकनीकी हस्तांतरण की वास्तविक गति को लेकर होगी। केवल घोषणाओं से सप्लाई चेन विविध नहीं हो जाती, इसके लिए दीर्घकालिक पूंजी निवेश, खनिज संसाधनों की खोज और प्रसंस्करण क्षमता का विकास आवश्यक है। दूसरी चुनौती पर्यावरणीय और सामाजिक मानकों की है। दुर्लभ खनिजों का खनन अक्सर पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डालता है। यदि यह गठबंधन लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, तो उसे टिकाऊ और जिमेदार खनन प्रथाओं को भी सुनिश्चित करना होगा। साथ ही चीन इस पहल को अपने आर्थिक प्रभाव को चुनौती देने वाले कदम के रूप में देख सकता है। ऐसे में भारत को संतुलित कूटनीति अपनानी होगी, ताकि वह बहुपक्षीय संबंधों को संतुलित रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो पैक्स सिलिका में भारत की भागीदारी केवल एक रणनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा का संकेत है। यह दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक तकनीकी व्यवस्था के हाशिये पर नहीं, बल्कि केंद्र में खड़ा है। भारत का लोकतांत्रिक ढांचा और विशाल युवा आबादी उसे इस संघर्ष में एक विशिष्ट पहचान देती है। यदि भारत अपने नीतिगत ढांचे को लचीला बनाए, बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाए और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करे, तो वह न केवल इस गठबंधन का लाभार्थी बनेगा, बल्कि उसकी दिशा तय करने वाला भी बन सकता है। सिलिकॉन की इस नई शताब्दी में भारत की उड़ान अभी शुरू हुई है। यह उड़ान कितनी ऊंची जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अवसरों को कितनी तेजी और संतुलन के साथ साधता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वैश्विक तकनीकी महायुद्ध में भारत अब दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है।

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