देश की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ रची जा रही साजिशों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, जो निं:संदेह काफी चिंतनीय विषय है, मगर साथ ही जिस प्रकार से हमारी सुरक्षा एजेंसियां इन साजिशों को नाकाम कर रही हैं, ये भी काफी सुकून देने वाली बात है। एक बार फिर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के कथित इशारों पर काम कर रहे एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस के संयुक्त अभियान में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से कुल आठ संदिग्धों की गिरफ्तार किया है। आतंकियों की गिरफ्तारी से यह बात स्पष्टï हो जाती है कि आतंकवाद की चुनौती केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बहुस्तरीय, संगठित और तकनीक-संचालित खतरा बन चुका है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बांग्लादेशी आतंकी संगठनों से जुड़े नेटवर्क मिलकर देश को दहलाने की साजिश रची थी। प्रारंभिक जांच के अनुसार ये आरोपी संगठित मॉड्यूल बनाकर देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी वारदात को अंजाम देने की तैयारी में थे। यह घटना एक बार फिर यह स्पष्ट करती है कि आतंक का स्वरूप बहुआयामी और जटिल हो चुका है। आतंकवाद अब पारंपरिक हथियारों और सीमापार घुसपैठ तक सीमित नहीं रहा, यह डिजिटल नेटवर्क, सोशल मीडिया, फर्जी दस्तावेज और स्थानीय स्तर पर बने मॉड्यूल के माध्यम से भी अपना जाल बुन रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरक्रतार आरोपियों के पास से दर्जनों मोबाइल फोन और सिम कार्ड बरामद होना इस बात का संकेत है कि आतंकवादी नेटवर्क अब डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए न केवल विचारधारा का प्रसार कर रहे हैं, बल्कि भर्ती, समन्वय और षड्यंत्र की योजना भी वहीं से संचालित कर रहे हैं। फर्जी आधार कार्ड के सहारे पहचान छिपाकर कपड़ा उद्योग में काम करना यह दर्शाता है कि ये नेटवर्क स्थानीय अर्थव्यवस्था में घुल-मिलकर लंबे समय तक सक्रिय रह सकते हैं। यह सुरक्षा तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इससे यह संकेत मिलता है कि श्रमिक आव्रजन और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रियाओं को और अधिक सक्चत और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। फर्जी दस्तावेजों के जरिए देश में प्रवेश और रोजगार प्राप्त करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। राज्यों के बीच डेटा साझाकरण, आधार और अन्य पहचान प्रणालियों का प्रभावी उपयोग तथा स्थानीय प्रशासन की निगरानी को और मजबूत करना होगा। अगर देखा जाए तो दिल्ली में एआई शिखर सक्वमेलन के दौरान ‘फ्री कश्मीर’ जैसे पोस्टर लगाना केवल एक प्रतीकात्मक कृत्य नहीं था, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। ऐसी रणनीति जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को प्रभावित करने की कोशिश करती है। हालांकि यह मामला केवल कुछ पोस्टर लगाने या संदिग्ध गतिविधियों तक सीमित नहीं है। जिस प्रकार से गिरक्रतार आरोपितों के तार पाकिस्तान स्थित हैंडलरों और बांग्लादेशी आतंकी नेटवर्क से जुड़े पाए गए हैं, वे खतरनाक मनसूबे को दर्शाता है। बताया जा रहा है कि इन लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारत में प्रवेश किया और तमिलनाडु के तिरुप्पुर क्षेत्र में गारमेंट फैक्ट्रियों में काम करते हुए अपनी पहचान छिपाई। यह रणनीति नई नहीं है। पहले भी आतंकी मॉड्यूल ने आम नागरिकों के बीच घुल-मिलकर गतिविधियां संचालित करने की कोशिश की है। लेकिन हर बार सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता ने उन्हें बेनकाब किया है। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत दिल्ली में कश्मीरी गेट बस अड्डे और मेट्रो स्टेशन के पास लगाए गए देशविरोधी पोस्टरों से हुई। देखने में यह मामूली शरारत लग सकती थी, लेकिन जांच एजेंसियों ने इसे गंभीरता से लिया। इसका एक बड़ा कारण है कि कुछ महीने पहले लाल किले और चांदनी चौक क्षेत्र में संभावित आतंकी हमले की खुफिया चेतावनी ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है। यही कारण है कि सीआईएसएफ और मेट्रो पुलिस की तत्परता ने मामले को तुरंत दर्ज किया और जांच की दिशा तय की। आरोपितों के रूट, उनके संपर्क और डिजिटल साक्ष्यों की गहन पड़ताल ने एक बड़े नेटवर्क की परतें खोल दीं। यही वह बिंदु है जहां हमारी सुरक्षा प्रणाली की दक्षता सामने आती है कि छोटी से छोटी घटना को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से परखा जाना। जांच में सामने आया कि यह मॉड्यूल केवल पोस्टर लगाने तक सीमित नहीं था। यह एक तरह का ‘ड्राई रन’ था यानि एक परीक्षण, जिसके जरिए यह देखा जा रहा था कि सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया क्या होती है, किस तरह की हलचल होती है और कितनी जल्दी कार्रवाई होती है। इसके बाद भीड़भाड़ वाले इलाकों में हमले की योजना बनाई जा रही थी। आरोपितों के मोबाइल फोन से कई संवेदनशील वीडियो और रेकी के सबूत मिलने की बात कही जा रही है। यदि समय रहते यह मॉड्यूल न पकड़ा जाता, तो परिणाम गंभीर हो सकते थे। इस घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि सीमापार नेटवर्क की जटिलता। बांग्लादेश में बैठे हैंडलर और पाकिस्तान से जुड़े तत्वों के बीच समन्वय यह दर्शाता है कि भारत के खिलाफ साजिशें बहुस्तरीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए संचालित हो रही हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती भी है। ऐसे में भारत के साथ बांग्लादेश से भी सर्तक रहना होगा। इसके अलावा आतंकी कुछ गुमराह युवाओं को बहला-फुसलाकर या लालच देकर आतंकी गतिविधियों में झोंक रहे हैं, ऐसे में चुनौती काफी जटिल हो जाती है। समाज और सरकार दोनों की जिक्वमेदारी है कि युवाओं को कट्टरपंथी विचारधाराओं से दूर रखा जाए और उन्हें सकारात्मक दिशा दी जाए। हालांकि इन सबके बीच सुरक्षा एजेंसियों की इस सफलता का स्वागत किया जाना चाहिए। नौ दिनों तक कोलकाता और तमिलनाडु में छापेमारी, डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण, लोकल पुलिस के साथ समन्वय और त्वरित कार्रवाई ये सभी दर्शाते हैं कि भारत की आंतरिक सुरक्षा प्रणाली सजग और सक्षम है। लेकिन आत्मसंतोष का कोई स्थान नहीं है। आतंकवाद की प्रकृति बदलती रहती है, कभी सोशल मीडिया के जरिए, कभी फर्जी पहचान के माध्यम से, तो कभी वैचारिक प्रचार के जरिए। इसलिए जरूरी है कि सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी बढ़े। नागरिकों को संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। डिजिटल साक्षरता और साइबर सतर्कता को बढ़ावा दिया जाए। स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संवाद पर बल दिया जाए। जब समाज मजबूत होता है, तो आतंकी विचारधाराओं की जड़ें स्वत: कमजोर पड़ जाती हैं। अंतत: यह घटना हमें दो संदेश देती है। पहला कि भारत के खिलाफ साजिशें जारी हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। दूसरा कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां हर चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। यह संतुलन सतर्कता और विश्वास का ही राष्ट्र को सुरक्षित रखता है। लेकिन देश की एकता, अखंडता और शांति को बनाए रखना केवल सरकार या सुरक्षा बलों की जिक्वमेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है। लेकिन हमें एक ऐसे समाज की ओर बढऩा होगा जहां सुरक्षा सुदृढ़ हो, न्याय पारदर्शी हो और सामाजिक सौहार्द अटूट रहे। आतंकी साजिश का यह पर्दाफाश केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि सभी को सतर्क रहना होगा। पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और आम नागरिक की सर्तकता से ही आतंकी घटनों को रोका जा सकता है।


