Tuesday, February 24, 2026
spot_imgspot_img

Top 5 This Week

Related News

एआई यानि बदलनी होगी पढ़ाई

-प्रेम शर्मा
आज के बदलते दौर में, विशेषकर एआई के उदय के बाद, पारंपरिक बीए, बीकॉम, बीएससी, थिएटर आर्ट्स, फैशन डिजाइनिंग, और पत्रकारिता जैसी कई डिग्रियां, जिनमें व्यावहारिक कौशल की कमी है, बेकार साबित हो सकती हैं। ये डिग्रियां केवल कागजी साबित होती हैं, अगर इसके साथ इंटर्नशिप या व्यावहारिक ज्ञान न हो। केवल सैद्धांतिक शिक्षा नौकरी नहीं दिलाती। कई पारंपरिक नौकरियां अब एआई द्वारा की जा रही हैं। वैसे भी इस दौर में कुछ विषय अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। वैसे भी वर्तमान समय में एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग भारत में 15 लाख स्कूल, 85 लाख से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक और प्रतिवर्ष 26 करोड़ से अधिक छात्र स्कूल प्रणाली में दाखिला लेते हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, प्रतिवर्ष 1000 से अधिक विश्वविद्यालयों और 42000 कॉलेजों में 4 करोड़ से अधिक छात्र दाखिला लेते हैं। हालांकि, भारतीय शिक्षा प्रणाली में निश्चित पाठ्यक्रम, पुरातन शिक्षा वितरण मॉडल और स्थिर परीक्षा अवधारणाएं हावी हैं। इससे शिक्षा और समकालीन कार्य कौशल के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति में यादि यदि डिग्री के साथ हुनर नहीं है तो वह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है। यही कारण है कि केवल डिग्री के सहारे रोजगार खोजने वाले लगभग कई करोड़ लोग आज भी बेरोजगारों की श्रेणी में खड़े है। हमारी शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम काफी पुराना हो चुका है और इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। मौजूदा पाठ्यक्रम की बात करें तो यह तकनीकी प्रगति के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है, और यही कारण है कि यह आज के बेहद उन्नत वैश्विक उद्योग के अनुरूप नहीं है। अधिकत्तर पाठ्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों का जिक्र ही नहीं होता, बल्कि वही पुरानी बातें दोहराई जाती हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान स्नातक होने के बाद दिखता है, जब आपके पास आधुनिक कंपनियों की जरूरत के कौशल नहीं होते। यही वजह है कि रोजगार दर अभी भी इतनी कम है जबकि कार्यबल अनुपात बढ़ रहा है। कक्षा में दी गई शिक्षा और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। अपने चुने हुए क्षेत्रों में, कई भारतीय स्नातक वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को तैयार नहीं पाते हैं। जबकि तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में दुनिया भर में अभी सबसे ज्यादा जोर आधुनिक तकनीकों के विकास और इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा नवाचार के प्रयोग पर दिया जा रहा है। सभी देश अपनी विकास नीतियों में अद्यतन तकनीकों को अपना रहे हैं और पारंपरिक तरीके से होने वाले बहुत सारे कामों का स्वरूप अब बदल रहा है। खासतौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआइ के फैलते दायरे ने वैश्विक स्तर पर कामकाज के तौर-तरीकों और उसमें इंसानी भूमिका पर व्यापक असर डाला है। एआई तकनीक के चलते अमरीका और चीन ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियॉ हासिल कर ली है।                                                                                                    वर्तमान समय में तकनीक के मामले में जितनी तेज रफ्तार से नवाचार का प्रयोग हुआ है, सभी जरूरी क्षेत्रों में एआइ का दायरा फैला है, उसमें इस पर चर्चा जरूरी हो जाती है कि इसकी संभावनाओं और उम्मीदों के साथ-साथ इससे जुड़ी आशंकाओं पर भी विचार हो। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि विकास के किसी स्वरूप से अंतिम तौर पर आम लोग प्रभावित होते हैं और कोई भी तकनीक इसी कसौटी पर देखी जाएगी कि उससे मनुष्य का कितना समग्र हित सुनिश्चित हो सका और दुनिया की ज्यादातर आबादी के लिए वह कितनी उपयोगी साबित हुई।यह एक जगजाहिर तथ्य है कि दुनिया आज तकनीकी विकास के अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसका एक सबसे अहम औजार बनने जा रही है। दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया-एआइ इम्पैक्ट समिट, 2026’ में इस संदर्भ में जितने आयाम सामने आए, वे बताते हैं कि दुनिया भर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ केंद्रित बदलाव अब विकास की नई परिभाषा गढ़ने जा रहा है। इसमें भारत की एक अहम भूमिका होगी और खासतौर पर वैश्विक दक्षिण या विकासशील देशों में इसे नेतृत्वकारी भूमिका में देखा जा रहा है। एआइ का इस्तेमाल अब केवल सुरक्षा के मुद्दे तक केंद्रित नहीं रहा बल्कि आज विकास के क्षेत्र में समावेशी, पारदर्शी तथा जिम्मेदार सुशासन के तौर पर इसकी भूमिका का विस्तार हो रहा है। जहां तक दिल्ली में हुए एआइ सम्मेलन का सवाल है, इसमें स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु परिवर्तन, शासन और आर्थिक विकास के मामले में खड़ी होने वाली बाधाओं का हल निकालने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को आगे बढ़ाने की जमीन तैयार करने की कोशिश की गई। यानी सम्मेलन में एआइ के जरिए समग्र विकास के क्षेत्र में संभावनाओं की नई राह तलाशने की भूमिका बनी।पिछले कुछ वर्षों के दौरान तकनीक, चिकित्सा और अन्य उत्पादों के निर्माण तथा उपयोग में एआइ का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। विकास के लगभग सभी क्षेत्र में इसकी अहमियत जिस रूप में बनती देखी जा रही है, उसके मद्देनजर भारत ने भी अभी से प्रयास शुरू कर दिए हैं, फिलहाल इस क्षेत्र में चीन और अमेरिका की कंपनियों का वर्चस्व है।                   निश्चित तौर पर भारत जैसे विकासशील देशों के सामने यह एक बड़ी चुनौती होगी, लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी समस्या से पार तभी पाया जा सकता है, जब उसकी जटिलता को स्वीकार कर उसका सामना करने का विकल्प चुन लिया जाए। इस लिहाज से देखा जाए, तो भारत का यह रुख तकनीकी प्रतिस्पर्धा के मैदान में चुनौतियों का सामना करने की जमीन तैयार करता है कि देश एआइ से डरता नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक भलाई के लिए समृद्धि और भविष्य की संभावनाएं देखता है।इसमें कोई दोराय नहीं कि एआइ अब भविष्य की दुनिया का एक यथार्थ है और विकास की पटकथा तैयार करने में इसकी अहम भूमिका होने जा रही है। मगर इसके समांतर यह देखने की जरूरत होगी कि नए बनने वाले ढांचे में समाज के सभी वर्गों के हित को सुनिश्चित करने का उद्देश्य किस हद तक पूरा हो पाता है। इस संदर्भ में एआइ की बढ़ती भूमिका के दौर में बड़े पैमाने पर नौकरियों का दायरा सिकुड़ने और अवसर कम होने की जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, उसका हल निकालना एक बड़ी चुनौती होगी। यही नही हम वर्तमान समय में जिस दौर से गुजर रहे है उस दौर में प्रारम्भिक शिक्षा को ही कम्प्यूटर तकनीक से जोड़कर हाईस्कूल के बाद एआई तकनीक शिक्षा का मूल मंत्र मानकर पाठ्यक्रम तैयार करना होगा। यही नही ग्रामीण स्तर अभाव ग्रस्त शिक्षा व्यवस्था में भी अमूलचूल परिवर्तन की भूमिका में सरकार को अगर महत्ती भूमिका निभानी होगी तो देश के युवा वर्ग को एआई शिक्षा की चुनौती को स्वीकार करना होगा।

Popular Coverage