अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की पारिस्थितिकी, जलवायु संतुलन और सञ्जयतागत इतिहास की जीवित धरोहर है। अरबों वर्ष पुरानी यह पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती रही है। ऐसे समय में जब देश जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, अरावली के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सक्चती उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आई है। अदालत का यह रुख बताता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अब केवल नीति-निर्माण का विषय नहीं, बल्कि न्यायिक प्राथमिकता भी बन चुका है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और जल-संकट देश के बड़े हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं, अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाना सिर्फ एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी और दिशा दोनों ही है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालत की रोक के बावजूद अरावली क्षेत्र में अवैध खनन का जारी रहना न केवल कानून की अवहेलना है, बल्कि पर्यावरण के विरुद्ध संगठित अपराध के समान है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि ‘अगर अवैध गतिविधियां इसी तरह चलती रहीं, तो हालात ऐसे हो जाएंगे जिन्हें भविष्य में सुधारा नहीं जा सकेगा,’ न्यायपालिका की गहरी चिंता को रेखांकित करती है। यह चेतावनी उस बिंदु की ओर संकेत करती है जहां से लौटना संभव नहीं होगा एक ऐसा ‘टिपिंग पॉइंट’ जो पूरे क्षेत्र को स्थायी क्षति की ओर धकेल सकता है। अगर देखा जाए सुप्रीम कोर्ट की चिंता निराधार नहीं है। वर्षों से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण, वन क्षेत्र का क्षरण और प्रशासनिक लापरवाही के कारण इस पर्वत श्रृंखला का बड़ा हिस्सा लगभग नष्ट हो चुका है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि अवैध गतिविधियां इसी तरह चलती रहीं, तो भविष्य में ऐसे हालात पैदा होंगे जिन्हें सुधारा नहीं जा सकेगा। यह चेतावनी केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा का आह्वान भी है। अरावली की महत्ता को समझना जरूरी है। यह पर्वतमाला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली हुई है और विशेष रूप से राजस्थान में इसका लगभग 80 प्रतिशत भूभाग स्थित है। अरावली मरुस्थल के विस्तार को रोकने में अहम भूमिका निभाती है, भूजल पुनर्भरण में सहायक है और जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि अरावली कमजोर होती है, तो इसका सीधा असर दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता, जल उपलब्धता और तापमान संतुलन पर पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली और आसपास के इलाकों में बढ़ते प्रदूषण और जल संकट के पीछे अरावली के क्षरण की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि खनन और पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक जांच के लिए विषय विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए, अत्यंत महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अरावली की परिभाषा और उसके संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय को जल्दबाजी में तय नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक तथ्यों, भूगर्भीय संरचना और पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर ही कोई ठोस निर्णय लिया जाना चाहिए। यही कारण है कि अदालत ने पर्यावरण मंत्रालय की उस सिफारिश पर रोक जारी रखी है, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की बात कही गई थी। यहां 100 मीटर की परिभाषा को लेकर उठा विवाद केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नीतिगत और नैतिक भी है। यदि अरावली को केवल ऊंचाई के आधार पर परिभाषित किया जाएगा, तो हजारों हेक्टेयर क्षेत्र स्वत: ही खनन और निर्माण के लिए खुल जाएगा। इससे पर्यावरण संरक्षण के सारे प्रयास खोखले हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि यह अत्यंत संवेदनशील विषय है और इसे जल्दबाजी में तय नहीं किया जा सकता, दरअसल उस विकास मॉडल पर सवाल है जो प्रकृति को केवल संसाधन मानकर उसका दोहन करता है। राजस्थान के कई इलाकों में जारी अवैध खनन का मुद्दा सुनवाई के दौरान उठना यह दर्शाता है कि समस्या केवल कागजों तक सीमित नहीं है। अदालत ने राजस्थान सरकार को तत्काल प्रभावी कार्रवाई के निर्देश देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह संदेश केवल राजस्थान के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है, जहां खनन माफिया और अवैध गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों का भारी नुकसान हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहना कि अवैध खनन भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों पर सीधा हमला है, एक गहरे संवैधानिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह स्वीकारोक्ति है कि स्वच्छ पर्यावरण में जीने का अधिकार केवल एक नीति या नारा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है। पिछले वर्ष दिसंबर में पारित अंतरिम आदेश को अगले आदेश तक प्रभावी रखने का निर्णय भी इसी सतर्कता का प्रमाण है। हालांकि, केवल अदालत की सख्ती से ही अरावली को बचाया नहीं जा सकता। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। इसके लिए सख्त प्रवर्तन, तकनीक-आधारित निगरानी जैसे सैटेलाइट मैपिंग, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैकल्पिक आजीविका मॉडल जरूरी हैं। साथ ही, खनन माफिया और नियमों को तोड़ने वालों के खिलाफ त्वरित और उदाहरणात्मक कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है। अवैध खनन पर प्रभावी रोक, पारदर्शी निगरानी तंत्र, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और दीर्घकालिक संरक्षण नीति की आवश्यकता है। साथ ही, यह भी जरूरी है कि विकास परियोजनाओं को मंजूरी देते समय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को औपचारिकता न बनाकर गंभीरता से लागू किया जाए। नागरिक समाज, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और मीडिया की भूमिका भी यहां अहम हो जाती है। जब तक समाज खुद पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाएगा, तब तक कोई भी आदेश स्थायी समाधान नहीं दे सकता। अरावली का संरक्षण केवल अदालत या सरकार का काम नहीं, बल्कि सामूहिक जिममेदारी है। अंतत:, सुप्रीम कोर्ट की ‘सुप्रीम’ चिंता हमें यह याद दिलाती है कि विकास की अंधी दौड़ में यदि हमने प्रकृति को खो दिया, तो आर्थिक प्रगति का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। अरावली को बचाना दरअसल भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सुरक्षित करना है। यह फैसला एक चेतावनी भी है और अवसर भी, चेतावनी उन लोगों के लिए जो प्रकृति को नष्ट कर त्वरित लाभ चाहते हैं, और अवसर उन सभी के लिए जो सतत विकास और पर्यावरणीय न्याय की दिशा में एक नई शुरुआत करना चाहते हैं। अरावली की रक्षा का अर्थ है जलवायु संतुलन, जैव-विविधता और मानव भविष्य की रक्षा। सुप्रीम कोर्ट की सक्चती निसंदेह उक्वमीद जगाने वाली है अरावली में अवैध खनन अब बंद होगा।



