Friday, February 20, 2026
spot_imgspot_img

Top 5 This Week

Related News

क्या बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना समाधान है?

– महेन्द्र तिवारी
आज की दुनिया में तकनीक ने जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही जटिल भी। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने संवाद, शिक्षा और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इनके साथ ऐसे जोखिम भी जुड़े हैं जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। इसी संदर्भ में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा भारत को उस पहल में शामिल होने का प्रस्ताव, जिसमें 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है, वैश्विक विमर्श को एक नई दिशा देता है। यह प्रस्ताव केवल तकनीकी या कानूनी बहस नहीं है, बल्कि समाज, शिक्षा, अभिभावकीय जिम्मेदारी और बच्चों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। भारत जैसे युवा-प्रधान देश में यह विषय और अधिक संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि यहां डिजिटल अवसरों और सामाजिक असमानताओं का संतुलन एक साथ मौजूद है।
आज की डिजिटल दुनिया में सोशल मीडिया बच्चों के लिए अवसरों और खतरों का मिश्रण बन चुका है। इंस्टाग्राम, टिकटॉक, एक्स (पूर्व ट्विटर) और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की बाढ़ है, जिसमें हिंसा, यौन शोषण, फेक न्यूज और साइबर बुलिंग का बोलबाला है। यूनिसेफ की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में 10-19 साल के 40 प्रतिशत से अधिक युवा ऑनलाइन उत्पीड़न के शिकार होते हैं, जो डिप्रेशन, एंग्जाइटी और यहां तक कि आत्महत्या तक ले जाता है। 15 साल से कम उम्र के बच्चों का मस्तिष्क अभी विकास के दौर में होता है, और प्लेटफॉर्म्स के एडिक्टिव एल्गोरिदम उन्हें घंटों स्क्रीन से बांधे रखते हैं। इससे न केवल पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि शारीरिक गतिविधियां और सामाजिक कौशल भी पीछे छूट जाते हैं। फ्रांस जैसे देशों में यह प्रतिबंध बच्चों को इन जोखिमों से बचाएगा, अभिभावकों को मानसिक राहत देगा और शिक्षा पर फोकस बढ़ाएगा। मैक्रों का तर्क स्पष्ट है बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता देकर हम भविष्य की पीढ़ी को मजबूत बना सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही 16 साल से कम उम्र पर सख्त बैन लगा दिया है, और नॉर्वे, स्पेन जैसे देश इसी राह पर हैं। भारत में भी केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया कंपनियों से उम्र-आधारित एक्सेस कंट्रोल पर बातचीत की पुष्टि की है।
फिर भी, भारत जैसे विविध और विकासशील देश के संदर्भ में इस प्रतिबंध के सकारात्मक पक्षों के साथ नकारात्मक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा मुद्दा है डिजिटल डिवाइड। शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट प्रचुर है, लेकिन ग्रामीण भारत में पहुंच सीमित होने के बावजूद सोशल मीडिया ही शिक्षा और संचार का प्रमुख माध्यम बन चुका है। यूट्यूब पर लाखों कोचिंग ट्यूटोरियल्स उपलब्ध हैं, जिनसे सुदूर देहाती बच्चे घर बैठे पढ़ाई कर रहे हैं। खान अकादमी, बायजूज जैसे प्लेटफॉर्म्स ने लाखों छात्रों को सशक्त किया है। प्रतिबंध लगाने से ये अवसर छिन जाएंगे, खासकर जहां पारंपरिक शिक्षा संसाधन अभावग्रस्त हैं। घर में बुराइयों से बचाव के लिए दरवाजा बंद करना ठीक नहीं, क्योंकि अच्छाई के रास्ते भी अवरुद्ध हो जाएंगे। इतिहास गवाह है प्राचीन भारत में समुद्र पार करने पर धर्म भ्रष्ट होने का नियम बना, जिससे बाहरी विचारों और प्रगति से वंचित रह गए। आजादी के बाद हमने वैश्विक संपर्क को अपनाया, जिससे विज्ञान, तकनीक और संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ। सोशल मीडिया पर पूर्ण बैन इसी तरह का अलगाव पैदा कर सकता है।
लागूकरण की व्यावहारिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उम्र सत्यापन कैसे होगा? आधार या अन्य डिजिटल आईडी से लिंक करने पर गोपनीयता का जोखिम बढ़ेगा, जो डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट 2023 के प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले 13 साल से कम उम्र के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध की पीआईएल खारिज कर दी थी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) का हवाला देकर। माद्रास हाईकोर्ट ने भले ही ऑस्ट्रेलिया मॉडल की सिफारिश की हो, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनाना कठिन है। बैन से बच्चे वीपीएन या अंडरग्राउंड ऐप्स का सहारा लेंगे, जो और असुरक्षित साबित होंगे डार्क वेब कंटेंट तक पहुंच आसान हो जाएगी। आंध्र प्रदेश जैसे राज्य स्तर पर प्रयास हो रहे हैं, जहां 16 साल से कम उम्र पर बैन का प्रस्ताव है, लेकिन केंद्र में संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा है। सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश) नियम 2021 के तहत प्लेटफॉर्म्स पहले ही अवैध कंटेंट 36 घंटे (अब 3 घंटे) में हटाने को बाध्य हैं, लेकिन उम्र-विशिष्ट बैन के लिए अतिरिक्त इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए जो महंगा और जटिल होगा।
भारत की सामाजिक संरचना भी इस प्रतिबंध को जटिल बनाती है। यहां परिवार-केंद्रित समाज है, जहां माता-पिता खुद बच्चों पर नजर रखते हैं। पश्चिमी देशों में न्यूक्लियर फैमिलीज में अभिभावक व्यस्त रहते हैं, इसलिए सरकारी हस्तक्षेप जरूरी लगता है। लेकिन भारत में संयुक्त परिवार प्रथा अभी प्रासंगिक है, और सांस्कृतिक मूल्य बच्चों को नैतिक सीमाओं में बांधते हैं। पूर्ण बैन की बजाय रेगुलेटेड एक्सेस ज्यादा व्यावहारिक है। उदाहरणस्वरूप, डीपीडीपी एक्ट में बच्चों के लिए पैरेंटल कंसेंट अनिवार्य करने का प्रावधान है। प्लेटफॉर्म्स को उम्र-अनुरूप कंटेंट फिल्टरिंग, एआई-आधारित मॉनिटरिंग और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम चलाने चाहिए। सरकार ने डीपफेक पर सख्ती बढ़ाई है 2 घंटे में अश्लील कंटेंट हटाना जरूरी है, जो आईटी एक्ट की धारा 67बी के तहत बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। स्कूलों में डिजिटल एजुकेशन को बढ़ावा देकर बच्चे खुद खतरों से अवगत हो सकते हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह ट्रेंड अपरिहार्य लगता है। फ्रांस 15 साल, ऑस्ट्रेलिया 16 साल की सीमा पर है, जबकि अमेरिका में प्लेटफॉर्म्स स्वयं 13 साल की न्यूनतम उम्र रखते हैं। लेकिन भारत की 140 करोड़ आबादी में 35 करोड़ से अधिक 15 साल से कम उम्र के बच्चे हैं—इसे एकसमान लागू करना अकल्पनीय है। संसाधन-कमी वाले विकासशील देश में मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी, क्योंकि अभिभावक चुनिंदा एक्सेस की मांग करेंगे। भारतीय न्याय संहिता 2023 ऑनलाइन अश्लीलता और घृणा भाषण पर दंडित करती है, लेकिन रोकथाम के लिए नीतिगत स्मार्टनेस चाहिए। मैक्रों का न्यौता विचारणीय है, लेकिन भारत को अपना मॉडल गढ़ना होगा जैसे चाइना का फायरवॉल या यूरोप का जीडीपीआर।
संतुलन बनाना ही कुंजी है। सख्त बैन से बेहतर है उम्र-आधारित टियर सिस्टम: 13 साल तक पूर्ण प्रतिबंध, 13-15 तक पैरेंटल कंट्रोल के साथ सीमित एक्सेस, और 15-18 तक सशर्त स्वतंत्रता। एनजीओ, एजुकेटर्स और टेक कंपनियों को शामिल कर पायलट प्रोजेक्ट चलाए जा सकते हैं। अभिभावकों के लिए ऐप्स विकसित करें, जो उपयोग ट्रैक करें। शिक्षा मंत्रालय यूट्यूब एजुकेशनल चैनल्स को बढ़ावा दे। अंततः, यह पहल सफल होगी यदि हम प्रतिबंध को अवसर में बदल दें बच्चों को डिजिटल दुनिया की साक्षर नागरिक बनाएं, न कि उसे बंद करके। भारत की युवा शक्ति हमारा सबसे बड़ा संपदा है; इसे सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। मैक्रों का प्रस्ताव एक अवसर है, लेकिन इसका स्वरूप भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
मोबाइल: ९९८९७०३२४०
ईमेल: mahendratone@gmail.com

Popular Coverage