भारत क्वों न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव कोई नयी बात नहीं है, क्योंकि समय-समय पर यह बहस सामने आती रही है कि न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों में किसकी भूमिका कितनी होनी चाहिए। एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणियों ने इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। कॉलेजियम प्रणाली में ‘कार्यपालिका के प्रभाव’ को लेकर उनकी खुली और तीखी आलोचना न केवल न्यायपालिका की चिंता को रेखांकित करती है, बल्कि संवैधानिक संतुलन पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अगर देखा जाए तो कॉलेजियम प्रणाली का जन्म इसलिए हुआ था ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों में सरकार का दखल न्यूनतम रहे। यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाई गई, ताकि न्यायपालिका बिना भय, दबाव या राजनीतिक प्रभाव के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। सुप्रीम कोट ने जब नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (एनजेएसी) असंवैधानिक ठहराया था, तब यह स्पष्ट कर दिया गया कि न्यायिक नियुक्तियों में स्वतंत्रता से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाई कोर्ट के जजों के तबादलों से जुड़े एक उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र सरकार की मांग पर कॉलेजियम प्रस्ताव में बदलाव करना सिस्टम की निष्ठा को कमजोर करता है। कॉलेजियम के रिकॉर्ड में स्वयं यह दर्ज होना कि तबादले का निर्णय सरकार के आग्रह पर बदला गया, जो इस बात का संकेत है कि प्रक्रिया पर बाहरी दबाव पड़ा। यह न केवल संस्थागत मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाता है जिस पर पूरी न्यायिक व्यवस्था टिकी है। एनजेएसी को खारिज करने के बाद न्यायपालिका पर यह जिमेदारी और बढ़ जाती है कि वह कॉलेजियम प्रणाली की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को हर हाल में बनाए रखे। न्यायाधीशों की शपथ केवल कानून की रक्षा की नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा को जीवित रखने की भी होती है। जब किसी प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत बन जाता है। जस्टिस भुइयां ने जिस संदर्भ में यह चिंता व्यक्त की, वह महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन के तबादले के प्रसंग में पूर्व मुक्चय न्यायाधीश बी. आर. गवई द्वारा यह कहा जाना कि यह निर्णय केंद्र सरकार के अनुरोध पर हुआ, अपने आप में एक असहज करने वाला खुलासा है। अगर यह तथ्य सही है, तो यह संवैधानिक व्यवस्था में उस अदृश्य रेखा को धुंधला करता है, जो न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच स्पष्ट रूप से खिंची होनी चाहिए।
कॉलेजियम प्रणाली का औचित्य ही यही रहा है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले न्यायिक विवेक और संस्थागत आवश्यकता के आधार पर हों, न कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार। जस्टिस भुइयां का यह सवाल है कि ‘क्या किसी जज को केवल इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट भेजा जा सकता है क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ असहज आदेश पारित किए ?’, सीधे-सीधे न्यायिक स्वतंत्रता के मूल पर चोट को रेखांकित करता है। यदि न्यायाधीश यह सोचने लगें कि किसी सक्चत या अप्रिय फैसले का नतीजा उनका तबादला हो सकता है, तो न्याय भयमुक्त कैसे रह पाएगा? भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान का संरक्षक बनाया है। इसी कारण न्यायाधीश शपथ लेते समय ‘बिना भय या पक्षपात’ के अपने कर्तव्यों का पालन करने का वचन देते हैं। यह शपथ तभी सार्थक है जब संस्थागत ढांचा उन्हें बाहरी दबावों से सुरक्षित रखे। जस्टिस भुइयां ने ठीक ही कहा है कि जब एनजेएसी को असंवैधानिक घोषित कर कॉलेजियम प्रणाली को बनाए रखा गया, तो न्यायपालिका पर यह अतिरिक्त जिक्वमेदारी आ गई कि वह इस व्यवस्था की ईमानदारी और स्वतंत्रता को हर हाल में बचाए। एनजेएसी को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का निर्णायक हस्तक्षेप न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करेगा। तब यह तर्क दिया गया कि कॉलेजियम प्रणाली में सुधार संभव हैं, लेकिन उसकी आत्मा स्वतंत्र निर्णय से समझौता नहीं किया जा सकता। आज, जस्टिस भुइयां की टिप्पणी उसी ऐतिहासिक फैसले की याद दिलाती है और यह चेतावनी भी देती है कि यदि व्यवहार में कार्यपालिका की अनुरोधात्मक भूमिका बढ़ती गई, तो कॉलेजियम का औचित्य खोखला हो जाएगा। देखा जाए तो भारतीय संविधान तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर टिका है। तीनों स्वतंत्र हैं, पर एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह भी। कार्यपालिका का दायित्व कानूनों को लागू करना है, न कि उनकी मनमानी व्याख्या करना या न्यायिक प्रशासन में दखल देना। जब कार्यपालिका न्यायिक नियुक्तियों या तबादलों में प्रभाव डालने का प्रयास करती है, तो यह शक्ति-संतुलन को बिगाड़ता है और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करता है। अक्सर यह तक दिया जाता है कि संस्थाओं के बीच समन्वय आवश्यक है। यह सही है कि पर समन्वय और हस्तक्षेप में बुनियादी अंतर है। समन्वय का अर्थ है संवाद, पारदर्शिता और परस्पर सम्मान। वहीं हस्तक्षेप का मतलब है दबाव, निर्देश और प्रभाव। न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र स्पष्ट है; उसमें कार्यपालिका की भूमिका सीमित और औपचारिक होनी चाहिए, न कि निर्णायक। इसलिए जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी कि न्यायिक स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है, आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं रहेगी, तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? यदि न्यायाधीश अपने तबादलों और नियुक्तियों को लेकर असुरक्षित महसूस करेंगे, तो निष्पक्ष फैसलों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? न्यायिक स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार की कटौती का असर तत्काल नहीं, बल्कि धीरे-धीरे दिखाई देता है। यह विश्वास के क्षरण से शुरू होता है और अंतत: लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को कमजोर कर देता है। इतिहास गवाह है कि जहां-जहां न्यायपालिका कमजोर हुई, वहां सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा और नागरिक स्वतंत्रताएं सिमटती चली गई। इस टकराव का समाधान टकराव बढ़ाने में नहीं, बल्कि स्पष्ट सीमाएं तय करने में है। जरुरत इस बात है कि कॉलेजियम की प्रक्रियाएं और अधिक पारदर्शी हों। न्यायपालिका बाहरी दबाव के प्रति ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनाए। संविधान संस्थाओं को विवेक से काम करने की स्वतंत्रता देता है, मनमर्जी से नहीं। यही विवेक, यही मर्यादा और यही आत्मसंयम लोकतंत्र की असली ताकत है।
हालांकि, इस पूरी बहस का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका को भी निरंकुश नहीं होने दिया जा सकता। कॉलेजियम सिस्टम को लेकर पारदर्शिता की कमी, भाई-भतीजावाद के आरोप और जवाबदेही का अभाव जैसी खामियां पहले भी सामने आती रही हैं। संविधान ने न्यायपालिका को विधायिका या कार्यपालिका की जगह लेने का अधिकार नहीं दिया है, ठीक उसी तरह जैसे कार्यपालिका को कानून की मनमानी व्याया करने की छूट नहीं है। भारतीय लोकतंत्र तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर टिका है। ये तीनों स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे को संतुलित और नियंत्रित करने वाली संस्थाएं हैं। संविधान विवेक से काम करने की आजादी देता है, लेकिन मनमर्जी या राजनीतिक दुराग्रह की अनुमति नहीं। ऐसे में टकराव नहीं, बल्कि समन्वय की जरूरत है। कॉलेजियम की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए उसकी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना ही इस बहस का संतुलित समाधान हो सकता है।



