वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 9वीं बार केंद्रीय बजट पेश करने जा रही हैं और प्रत्येक बार की तरह इस बार भी आम बजट को लेकर हर वर्ग के लोगों की काफी कुछ उम्मीद और अपेक्षाएं हैं। यही कारण है कि आम जनता से लेकर उद्योग जगत, महिलाएं, युवा, व्यापारी और राजनीतिक दल, सभी की निगाहें वित्त मंत्री के पिटारे पर टिकी हुई हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही माहौल है कि हर वर्ग को इंतजार है कि आखिर किसके हिस्से में क्या आएगा। मिडिल क्लास जहां टैक्स स्लैब में राहत और सस्ता होम लोन की उम्मीद कर रहा है, वहीं युवा, स्किलिंग और डिजिटल नौकरियों के नए अवसर की तलाश कर रहे हैं। इस बजट से महिलाएं, लखपति दीदी योजना का विस्तार और महिलाओं के लिए विशेष बैंक स्कीम की उम्मीदें लगाए बैठी हैं। दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार बजट में रक्षा, बुनियादी ढांचा, पूंजीगत खर्च, बिजली क्षेत्र और किफायती आवास विकास पर खास ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही सामाजिक कल्याण और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने की भी कोशिश होगी। साफ है कि बजट केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि ऐसे समय में भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाला दस्तावेज होगा, जब देश अवसरों और चुनौतियों के चौराहे पर खड़ा है। एक ओर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक अनिश्चितताएं, महंगाई का दबाव, रोजगार सृजन की चुनौती और क्षेत्रीय असमानताएं नीति-निर्माताओं के सामने कड़ी परीक्षा पेश कर रही हैं। ऐसे में यह बजट जितना आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, उतना ही सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी निर्णायक माना जा रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह लगातार नौवां बजट होगा, जो अपने-आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे अपेक्षा इसलिए भी अधिक है क्योंकि विîा वर्ष 2027 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। सवाल यह नहीं कि अर्थव्यवस्था बढ़ेगी या नहीं, बल्कि यह है कि यह वृद्धि कितनी समावेशी, टिकाऊ और रोजगारोन्मुखी होगी। हर बजट की तरह इस बार भी मिडिल क्लास की निगाहें टैक्स स्लैब में राहत, बढ़ी हुई छूट और सस्ते होम लोन पर टिकी हैं। महंगाई के दौर में आय पर बढ़ता बोझ इस वर्ग की क्रय शक्ति को सीमित कर रहा है, ऐसे में कर व्यवस्था में थोड़ी राहत न केवल उपभोग को बढ़ावा देगी, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी गति दे सकती है। बजट 2026 से उम्मीद है कि सरकार सप्लाई चेन, कोल्ड स्टोरेज, एग्री-लॉजिस्टिक्स और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाएगी। केवल सब्सिडी या आयात-निर्यात के तात्कालिक फैसलों से काम नहीं चलेगा, दीर्घकालिक समाधान ही खाद्य महंगाई को स्थिर कर सकते हैं। यदि सरकार यहां ठोस रोडमैप देती है, तो यह बजट का सबसे भरोसेमंद पक्ष बन सकता है। युवा वर्ग की अपेक्षाएं कौशल विकास, स्टार्ट-अप्स और डिजिटल नौकरियों से जुड़ी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए बड़े अवसर हैं। बजट से उम्मीद है कि वह स्किलिंग और इंडस्ट्री-एकेडेमिया साझेदारी के जरिए शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटने का ठोस रोडमैप पेश करेगा। महिलाओं के लिए ‘लखपति दीदी’ योजना का विस्तार, महिला-विशेष बैंकिंग उत्पाद और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली स्कीमें सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में अहम कदम हो सकती हैं। महिला श्रम भागीदारी बढ़ाना न केवल सामाजिक न्याय का सवाल है, बल्कि आर्थिक वृद्धि के लिए भी अनिवार्य है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व आज भी केंद्रीय है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी वृद्धि दर कुल जीडीपी से पीछे रही है। ऐसे में बजट 2026-27 से अपेक्षा है कि वह केवल सब्सिडी आधारित राहत तक सीमित न रहकर उत्पादकता और क्लाइमेट रेजिलिएंस पर जोर दे। डिजिटल खेती, क्लाइमेट-स्मार्ट टेक्नोलॉजी, बेहतर बीज और रिसर्च में निवेश खेती को भविष्य के लिए तैयार कर सकता है। कोल्ड-चेन, आधुनिक भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण पर फोकस से न केवल बर्बादी कम होगी, बल्कि किसानों की आय में भी स्थिरता आएगी। किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करना और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना भारतीय कृषि को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बना सकता है। नई शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक लचीला, व्यावहारिक और कौशल-आधारित बनाने की दिशा तय की है। अब जरूरत इसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। मेडिकल और रिसर्च संस्थानों में सीटों की संख्या बढ़ाना, डिजिटल लर्निंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना और शिक्षक प्रशिक्षण में निवेश मानव संसाधन विकास की कुंजी है। उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाकर इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और संयुक्त शोध को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इससे शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर कम होगा और युवाओं को वास्तविक अवसर मिलेंगे। इंफ्रास्ट्रक्चर में बढ़ता पूंजीगत व्यय भारत की विकास रणनीति का मुक्चय आधार रहा है। सडक़, रेलवे, शहरी यातायात, लॉजिस्टिक्स पार्क और डिजिटल नेटवर्क में निवेश से न केवल रोजगार सृजन होता है, बल्कि अर्थव्यवस्था की उत्पादकता भी बढ़ती है। रेलवे में कवच जैसी सुरक्षा प्रणालियों और हाईवे नेटवर्क पर रिकॉर्ड खर्च की उम्मीद इसी सोच का विस्तार है। स्वास्थ्य क्षेत्र में महामारी के बाद निवेश की जरूरत और स्पष्ट हो गई है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, टेली-मेडिसिन और डिजिटल हेल्थ पर जोर, तथा दवा और मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना स्वास्थ्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों के लिए जरूरी है। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तभी हासिल होगा जब रिसर्च और इनोवेशन को केंद्र में रखा जाए। एआई, बायोटेक, स्पेस और ग्रीन टेक्नोलॉजी में निवेश भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता तय करेगा। वहीं एमएसएमई क्षेत्र, जो रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है, सस्ती पूंजी, सरल कर अनुपालन और तकनीकी उन्नयन की अपेक्षा कर रहा है। कर व्यवस्था में स्थिरता,जीएसटी का सरलीकरण और स्टार्ट-अप्स के लिए स्पष्ट नियम निवेश माहौल को बेहतर बना सकते हैं। उद्योग जगत चाहता है कि कर ढांचा विकासोन्मुखी और पारदर्शी हो। अमेरिकी टैरिफ दबाव से प्रभावित निर्यात सेक्टरों को राहत देना जरूरी है, लेकिन यह राहत प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने से जुड़ी होनी चाहिए, न कि केवल अस्थायी सहारे तक सीमित। वहीं, इंडिया-ईयू एफटीए केबाद ऑटो सेक्टर के लिए बजट की घोषणाएं बाजार की दिशा तय कर सकती हैं। घरेलू खपत बढ़ाने के लिए जीएसटी रेशनलाइजेशन और लक्षित प्रोत्साहन अहम होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार अगर घरेलू मांग को मजबूत करती है, तो बाहरी झटकों का असर अपने आप कम हो जाएगा। कुल मिलाकर, बजट 2026 से अपेक्षा केवल आंकड़ों के संतुलन की नहीं, बल्कि दूरदर्शी दृष्टिकोण की है। यह बजट कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना और नवाचार में लक्षित निवेश के जरिए समावेशी और रोजगारोन्मुखी विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यदि यह बजट अल्पकालिक राजनीतिक जरूरतों और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन साधने में सफल होता है, तो यह सच अर्थों में भारत के विकास पथ का रोडमैप साबित होगा।



