-रोहित माहेश्वरी, स्वतंत्र पत्रकार
जिस तरीके से पूरे देश में नक्सली के खिलाफ अभियान चलाया गया है, उससे एक बात है कि केंद्र की मोदी सरकार पूर्ण दृढ़ संकल्प और शपथ के जिस पथ को लेकर चल रही थी, उसमें एक मजबूत रणनीति जीत अब दिखने लगी है। केंद्र सरकार ने इस साल 31 मार्च तक लाल आतंक को खत्म करने की समय सीमा तय कर रखी है। जो पूरी होती दिखने लगी है। देश का 90 प्रतिशत क्षेत्र पहले ही नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है।
1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई नक्सलवाद की समस्या ने दशकों तक लाखों निर्दोष लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान ली और कई क्षेत्रों को विकास से वंचित रखा। 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ एक ठोस और प्रभावी रणनीति अपनाई। पिछले 11 वर्षों में, केंद्र सरकार की समन्वित, बहुआयामी रणनीति, जिसमें सुनियोजित सुरक्षा अभियान, अभूतपूर्व अवसंरचना विकास, वित्तीय दबाव, तीव्र विकास और एक आकर्षक आत्मसमर्पण नीति शामिल है, ने वामपंथी उग्रवाद को 2014 में 126 जिलों से घटाकर 2025 में मात्र 11 जिलों तक सीमित कर दिया है, जिनमें से केवल तीन ही “सबसे अधिक प्रभावित” बचे हैं, जो लाल गलियारे के लगभग खात्मे का संकेत है।
अकेले साल 2025 में, 317 नक्सलियों शीर्ष नेतृत्व सहित को मार गिराया गया, 800 से अधिक को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2,000 ने आत्मसमर्पण किया, जिससे नक्सलियों को अब तक की सबसे बड़ी क्षति मिली और मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त भारत की ओर तेज़ी से प्रगति हुई।
छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा बस्तर संभाग नक्सल प्रभावित है। इसमें सात जिले शामिल हैं। ये जिले महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के साथ सीमा साझा करते हैं, और लंबे समय से इसे माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियान तेज हुए हैं, जिससे नक्सलवाद पर तगड़ा प्रहार हुआ है।
छत्तीसगढ़ में साल 2024 से अब तक सीपीआई माओवादी के महासचिव नंबाला केशवा राव उर्फ बसवराजू जैसे टॉप नक्सल लीडर सहित 500 से अधिक नक्सलियों को फोर्स ने एनकाउंटर में मार गिराया है। इस साल अब तक छत्तीसगढ़ में अलग-अलग मुठभेड़ में 23 माओवादी मारे जा चुके हैं। तीन जनवरी को, बस्तर क्षेत्र में दो मुठभेड़ में कुल 14 माओवादी मारे गए थे।
नक्सलियों की आत्मसमर्पण को लेकर के जिस तरह से संख्या बढ़ी है, उससे एक बात साफ है कि नक्सलियों के भीतर इस बात का भय बैठ गया है, कि 31 मार्च तक आत्मसमर्पण नहीं किया गया तो सरकार किसी तरह के समझौते के मूड में अब नहीं है। इसका परिणाम भी दिखा है। छत्तीसगढ़ में नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहे माओवादी कमांडर जो यहां रहे वे सभी मारे गए हैं। हिड़मा से लेकर जिन लोगों को भी छत्तीसगढ़ में कमान दी गई थी, या तो वह राज्य छोड़कर चले गए या फिर न्यूट्रलाइज हुए हैं। बचे हुए कैडर के पास अब इतनी क्षमता नहीं बची है, कि वो नक्सल अभियान को आगे लेकर चल सकें।
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के लिए नेशनल पार्क का 2799 वर्ग किलोमीटर का इलाका सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता था। छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र और तेलंगाना का बॉर्डर इलाका घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा है। माओवादी इसे अपने कॉरिडोर के रूप में उपयोग करते थे, यह भी कहा जा सकता है, कि यह इलाका नक्सलियों का सबसे अभेद दुर्ग वाला इलाका रहा है। कभी नक्सलियों के अभेद किले के रूप में जाने जाने वाला नेशनल पार्क पहले एनकाउंटर जोन बनता जा रहा है। अब सुरक्षाबलों के कैंप बन जाने के बाद यहां से लाल आतंक के पैर उखड़ने लगे हैं।
साल 2025 के बाद जिस नक्सल अभियान को चलाया गया उसमें यह बात तय की गई, कि मानसून के मौसम में भी इस अभियान को नहीं रोका जाएगा। नक्सलवाद को खत्म करने को लेकर चलाए जा रहे अभियान में हेलीकॉप्टर मिल जाने के बाद सुरक्षाबलों को बहुत सहूलियत मिल गई। मानसून के मौसम में हेलीकॉप्टर के आ जाने के बाद मॉनिटरिंग भी तेज हो गई। नेशनल पार्क इलाके में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना के बॉर्डर पर फोर्स तैनात होने साथ ही सुरक्षा बलों द्वारा कैंप खोल दिए जाने के बाद फोर्स की गतिविधियां तेज हो गई।
छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली एनकाउंटर और उसमें जिस तरीके के नक्सली मारे गए, उसके बाद छत्तीसगढ़ में नक्सल अभियान को चलाने वाले बड़े नक्सली बचे ही नहीं हैं। जो भी नक्सली छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन को दिशा देते थे, उसके लिए रणनीति बनाते थे, उन तमाम नक्सलियों को या तो न्यूट्रलाइज किया गया या फिर कई ऐसे हैं जिन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। नक्सली संगठन के बचे कैडर को और संगठन को दिशा देने वाले लोगों की जगह ही नहीं बची है। अब पूरा नक्सली संगठन ही नेतृत्व विहीन हो चुका है। यह एक बड़ी वजह है कि 60 दिनों के भीतर इसे पूरे तौर पर खत्म कर दिया जाएगा।
केंद्र सरकार ने एनआईए में एक समर्पित विभाग बनाकर नक्सलियों के वित्तपोषण पर प्रभावी ढंग से लगाम लगा दी है। इस विभाग ने 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है, जबकि राज्यों ने भी 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है और प्रवर्तन निदेशालय ने 12 करोड़ रुपये कुर्क किए हैं। इस एक साथ की गई कार्रवाई से शहरी नक्सलियों को गंभीर नैतिक और मनोवैज्ञानिक क्षति पहुंची है और उनके सूचना युद्ध नेटवर्क पर नियंत्रण और भी कड़ा हो गया है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के नक्सल मुक्त करने को लेकर बनी रणनीति में राज्यों के बीच समन्वय एक एक बहुत मजबूत आधार बना। राज्यों के बीच आपसी तालमेल नहीं होना नक्सल के सफल होने का एक कारण होता था। नक्सल को समाप्त करने को लेकर जब रणनीति तैयार होनी शुरू हुई, तो उसके लिए पहली लाइन समन्वय की बनाई गई, ताकि इस अभियान को बल मिले। बीती 8 फरवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में आयोजित एक विशेष कॉन्क्लेव के दौरान शाह ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की पुरजोर अपील की।
भारत सरकार ने वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क और मोबाइल कनेक्टिविटी का विस्तार करके बुनियादी ढांचे को काफी मजबूत किया है, जिससे पहुंच, सुरक्षा प्रतिक्रिया और सामाजिक-आर्थिक एकीकरण में सुधार हुआ है। मई 2014 से अगस्त 2025 तक, केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में 12,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है, जबकि कुल 17,589 किलोमीटर की परियोजनाओं को 20,815 करोड़ रुपए की लागत से स्वीकृत किया गया है।
इन सबके बीच नक्सलवाद के खत्म होने के बाद विकास की जिस बुनियाद को जमीन पर उतरना है, वह बहुत बड़ी चुनौती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण वैसे सरेंडर नक्सलियों की है जो सरेंडर पॉलिसी के तहत आत्मसमर्पण किए हैं। उनको समाज की मुख्यधारा से जोड़े रखना बड़ी चुनौती है। इस जगह पर शासकीय कमजोरी या प्रशासनिक ढांचे की लचर व्यवस्था का कोई भी छाप दिखा तो यह इस अभियान को फेल करने की बड़ी वजह बन सकता है। इसमें सबसे जरूरी है आम सुविधाओं का विस्तार और जो लोग सरकार की व्यवस्था पर भरोसा करके आए हैं, उसे भरोसे पर कायम रहने के सरकार के वैसे निर्णय जो सिर्फ विकास के लिए जाने जाते हैं, सबसे बड़ी चुनौती हैं। वास्तव में, देश से नक्सलवाद का खत्म होना विकासवाद की उस अवधारणा की पहली कुंजी है, जिससे भारत पूरे विश्व के फलक पर एकजुट होकर सिर्फ विकास की लड़ाई लड़ेगा।
लाल आतंक से मुक्ति की ओर बढ़ रहा देश



