Sunday, January 25, 2026
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वोट की ताकत हमारा संवैधानिक अधिकार है

लेखक – डॉ अशोक कुमार भार्गव

25 जनवरी 1950 अर्थात भारत निर्वाचन आयोग के स्थापना दिवस को पूरे देश में राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाते हैं। इसका उद्देश्य भारतीय नागरिकों को मतदाता के रूप में उनके अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागृत करना है। यह परंपरा वर्ष 2011 से प्रारंभ हुई है। निर्वाचनआयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ एवं राज्य निर्वाचन प्रक्रियाओं का संचालन करने के लिए उत्तरदायी है। यह निकाय ही भारत में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, देश में राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों का संचालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।
हमें गर्व है कि हम दुनिया के सबसे सशक्त, सफल, परिपक्व लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिक हैं। लोकतंत्र न केवल सर्वोत्तम शासन पद्धति है वरन एक शैली है जीवन यापन की, एक विधि और दर्शन है। इस व्यवस्था में स्वतंत्र निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव लोक आस्था, लोक निष्ठा के प्रतीक होते हैं। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा है और मतदाता ही लोकतंत्र के भाग्य विधाता है। चुनाव के बिना लोकतंत्र और लोकतंत्र के बिना चुनाव दोनों अर्थहीन हो जाते हैं ।
भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. अंबेडकर ने प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करते हुए मतदान के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विलक्षणता ही यह है कि वह देश के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के न केवल वोट देने की ताकत देता है वरन प्रत्येक वोट का मूल्यांकन भी समान करता है। यह ताकत प्रत्येक मतदाता का न केवल संवैधानिक अधिकार है वरन उसकी जिम्मेदारी भी और जिम्मेदारी सिर्फ ओढ़ने के लिए नहीं होती वरन निभाने के लिए होती है। जो मतदाता अपने इस मूल्यवान अधिकार का उपयोग नहीं करते वे न केवल लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करते हैं वरन राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी करते हैं।
भारत में सन 1952 से निरंतर एक निश्चित समय अंतराल पर लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन संपन्न हो रहे हैं । चुनाव में मतदान का प्रतिशत है यद्यपि अपेक्षाकृत बड़ा है किंतु फिर भी एक बहुत बड़ा तबका अर्थात 30 से 35% मतदाता आज भी ‘कोउ नृप होय हमें का हानी’की दूषित मानसिकता के चलते मतदान के प्रति निष्क्रिय, उदासीन और विमुख है। वोट देने की ताकत राष्ट्र के विकास या विनाश की निर्णायक शक्ति होती है। अक्सर वोट न देने वाले मतदाता सरकार की नाकामी पर गरियाते रहते हैं, तर्क कुतर्क वितर्क करते रहते हैं। ऐसे ही एक याचिकाकर्ता को आढे हाथों लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई थी कि अगर आप वोट नहीं देते हैं तो किसी काम के लिए आपके पास सरकार पर तोहमत लगाने का अधिकार भी नहीं है।
इसलिए समावेशी और सहभागी लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करने के लिए नए मतदाताओं को प्रोत्साहित करना, उन्हें सुविधाएं देना, उनका नामांकन बढ़ाना , उन्हें सशक्त, सतर्क, सुरक्षित और वोट देने के अधिकार के प्रति जागरूक करना अपरिहार्य होता है। भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं को सुव्यवस्थित शिक्षण हेतु कई सामान्य और लक्षित हस्तक्षेपों पर आधारित 360 डिग्री संचार का राष्ट्रव्यापी ‘स्वीप कार्यक्रम’ वर्ष 2009 से प्रारंभ कियाहै। फल स्वरुप मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, जेंडर गैप कम हुआ है, मतदान केंद्र पर हिंसा लूट और मतदान के बहिष्कार जैसी घटनाएं कम हुई है, नए युवा मतदाता शतप्रतिशत जुड़ रहे हैं, नामांकन बढ़ रहा है और सूचित, नैतिक, स्वतंत्र प्रोत्साहित वोटिंग प्रत्येक मतदान केंद्र पर बढ़ रही है।
यह एक कटु सत्य है कि चुनाव का लोकतांत्रिक अनुष्ठान मतदाताओं के मतों की आहुतियों के बिना फलीभूत नहीं हो सकता क्योंकि लोकतंत्र का स्वरूप वैसा ही होता है जैसे उसके नियंता होते हैं और लोकतंत्र में मतदाता ही लोकतंत्र के असली मालिक और नियंता होते हैं। वे अपनी सरकार, अपने लिए, अपने ही द्वारा चुनते हैं। अतः लोकतंत्र में एक मतदाता का अज्ञान भी सबकी सुरक्षा को संकट में डालने के लिए पर्याप्त होता है। क्योंकि ‘जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बंदों को तोला नहीं गिना करते हैं ‘ अर्थात एक-एक वोट महत्वपूर्ण होता है। एक एक वोट से हार जीत होती है। यों तो लोकतंत्र में हम लोक कहलाना पसंद करते हैं किंतु तंत्र का हिस्सा नहीं बनते। अतः संविधान प्रदत्त वोट डालने के अपने मूल्यवान अधिकार का हर संभव परिस्थितियों में उपयोग करना चाहिए।
‘हम भारत के लोग’ परम सौभाग्यशाली हैं कि हमें 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होते ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की अनुपम सौगात बिना किसी संघर्ष के प्राप्त हो गई जबकि वैश्विक स्तर पर इसे प्राप्त करने का इतिहास आंदोलनों, प्रदर्शनों और संघर्षपूर्ण अभियानों का रहा है।19वीं सदी के प्रारंभ में लोकतंत्र के लिए होने वाले संघर्ष प्रायः राजनीतिक समानता, आजादी और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों को लेकर ही होते थे किंतु सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की मांग प्रमुख होती होती थी। यूरोप के अधिकांश देश जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाते जा रहे थे वह भी सभी लोगों को वोट देने की अनुमति नहीं देते थे। कुछ देशों में केवल उन्हीं लोगों को वोट देने का अधिकार था जिनके पास संपत्ति थी या वे बड़े जमींदार, सामंत अथवा पादरी थे। महिलाओं के साथ भेदभाव होता था और वोट देने का अधिकार मिलता ही नहीं था। संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेतों को 1965 तक मतदान का अधिकार नहीं मिला। कई देशों में मताधिकार को प्राप्त करने के लिए साक्षरता की परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होता था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महिलाओं ने कारखाने और अन्य क्षेत्रों में अपनी निर्णायक भूमिका से राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और युद्ध के प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान दिया था जिससे यह धारणा विकसित हुई कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिलना ही चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र ने भी महिलाओं के मताधिकार को प्रोत्साहित किया।1950 के बाद धीरे-धीरे अर्जेंटीना, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, यूनान, स्पेन आदि देशों के नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्राप्त हुए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव संबंधी बड़े रोचक तथ्य भी ‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंट’ के प्रतिवेदन में मिलते हैं। विश्व के अनेक देशों जैसे बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और बोलिविया आदि देशों में मतदान करना अनिवार्य है। भारत सहित फिलिपींस थाईलैंड जैसे देशों में मतदान करना केवल नागरिक कर्त्तव्य है बाध्यता नहीं। जबकि कई देश ऐसे हैं जहां इस कर्त्तव्य के पालन न करने पर सजा का प्रावधान है। मतदान की अनिवार्यता लागू करने वाले देशों में से 19 ऐसे देश हैं जहां इस नियम को तोड़ने पर सजा भी दी जाती है। जिन देशों में मतदान अनिवार्य है वहां 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए यह बाध्यता नहीं है। आस्ट्रेलिया, ब्राजील जैसे देशों में मतदान न करने पर अनुपस्थिति का कारण सहित औचित्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होता है।अर्जेंटीना में तो पुलिस के पास इस बात का प्रमाण पत्र जमा करना होता है कि मतदान के दिन आप वास्तव में कहां थे। पेरू और ग्रीस जैसे देशों में मतदान न करने वाले व्यक्ति को सार्वजनिक सेवाओं से वंचित कर दिया जाता है।बोलिविया में वोट न देने वाले का तीन माह का वेतन तक रोक दिया जाता है। भारत में यद्यपि मतदान संवैधानिक कर्तव्य है बाध्यता नहीं किंतु फिर भी यह हमारा मूल्यवान लोकतांत्रिक कर्तव्य है। वैसे तो चुनाव की चुनौती व्यक्ति के जीवन मैं हर क्षण उपस्थिति रहती है। बाजार से फल, गहने, कपड़े, अन्य वस्तु,सब्जी भाजी या मिट्टी का घड़ा ही क्यों ना खरीदना हो अथवा वैवाहिक रिश्ता तय करना हो तब हम बहुत ठोक बजाकर सम्यक चुनाव करते हैं।जब हम अपने जीवन के निर्णय बहुत सोच समझ कर लेते हैं तब हमें इतने बड़े राष्ट्र की बागडोर जिन्हें सौंप रहे हैं उन्हें चुनते वक्त बिना किसी जाति धर्म भेद किए, वोटों के महाठगों के मायावी वादों,लालच, प्रलोभन आदि से निर्लिप्त रहकर दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए विवेक सम्मत मतदान करना चाहिए। हमें ऐसे श्रेष्ठ जन प्रतिनिधि चुनने चाहिए जो वास्तव में नैतिक मूल्यों राष्ट्रीय आदर्शों, सदाचार, ईमानदारी, राष्ट्र प्रेम, राष्ट्रभक्ति की उदात्त चेतना के पोषक हों क्योंकि
भारतीय चुनावों का महात्म्य किसी महाकुंभ से कम नहीं होता। ये केवल बहुरंगी, बहुआयामी, भव्य और विराट ही नहीं होते वरन चुनौती पूर्ण भी होते हैं जिसकी इंद्रधनुषी छटाओं में हमारी जीवटता, उम्मीदें और उत्साह के साथ ही हमारी भौगोलिक, सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषायी,जातिगत विविधता और जन-जन की आकांक्षाओं का स्वर्णिम भविष्य भी दिखाई देता है। इसलिए सारे काम छोड़ दो सबसे पहले वोट दो। राष्ट्रीय मतदाता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

संपर्क : 9425427525

(लेखक राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा नेशनल अवार्ड से सम्मानित हैं)

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